Thursday, October 31, 2013

किस्सा और बोसा

वक्‍त के सेल्‍यूलाइड पर्दे पर किस्‍सा पहले आया या बोसा? या कि दोनों इक दूजे का हाथ थामे साथ साथ चले आए थे. किसके किस्‍से में सबसे पहले बोसा आया था और किसके बोसे पर पहला किस्‍सा बना. इन सब पर किस्‍से कहे जा सकते हैं लेकिन युवा पत्रकार जे सुशील ने अपने ढंग से इनकी बात कही है.... पृथ्वी परिहार 

मेरे पास किस्से थे
उसके पास बोसे थे
मैं किस्सा सुनाता और वो बोसे देती.
जे सुशील
ऐसे ही किस्से और बोसे की दोस्ती हो गई.
जादूगरों के किस्से, जंगलों के किस्से, अय्यारों के किस्से.
बोसा बदलता नहीं वही मिठास, वही ललक और उसी प्रेम से.
बोसा वहीं रहा किस्सा बदलता गया.
किस्से को किस्सागो बनना था दास्तान लिखनी थी वो शहर आ गया.
बोसा वहीं रह गया जहां वो था. याद करता किस्सों को और यादों में ही बोसे देता.
उधर किस्सा नित नए किस्से गढ़ने लगा, सुनाने लगा, किस्मत चमकी किस्से की. दास्तान पर दास्तान लिखता चला गया
और बना बड़ा किस्सागो.
इमारतें मिलीं, चेहरे मिले, दौलत मिली पर किस्से को फिर कभी वो बोसा न मिला.
उन दीवारों के जंजाल में, किस्सों की परतों में बोसे को खोजता फिरता किस्सागो बावला हो गया.
अपने कपड़े फाड़ रोने लगा और मांगने लगा हर आने जाने वाले से एक बोसा..बस एक बोसा.
दुनिया पैसे फेंकती उसके इस किस्से पर और कहती..देखो कितना बड़ा किस्सागो और क्या उसका किस्सा है एक बोसे का.
फिर एक दिन उसने भरे बाज़ार में कपड़ों के चीथ़ड़े कर डाले और दौड़ने लगा. बोसे की तलाश में.
लोगों ने रोका. टोका, खूब मनाया कि एक बोसे की कीमत ही क्या है. पर किस्सा जानता था बोसा तो बोसा है.
लौटा अपने फिर उन्हीं दरकती सीढ़ियों में जहां वो बैठी थी किस्सा सुनने....अधखुली पलकों से उसने किस्से को देखा था और आंख मूंद ली थी ये कहते हुए...बस एक छोटा सा किस्सा सुना तो दो.
किस्से ने सुनाना शुरु किया वही किस्सा जिसका नाम था...किस्सा एक बोसे का.
किस्सा खत्म हुआ तो बोसा किस्से के गालों पर था. ढलका हुआ सा, दम तोड़ता हुआ सा...किस्सा अब भी गली गली फिरता है एक तारा लिए और गाता रहता है अकेला किस्सा एक बोसे का.
 -
जे सुशील

Friday, October 11, 2013

Hafiz Ghazal 1


Where is sensible action, & my insanity whence?
See the difference, it is from where to whence.
From the church & hypocritical vestments, I take offence
Where is the abode of the Magi, & sweet wine whence?
For dervishes, piety and sensibility make no sense
Where is sermon and hymn, & the violin's music whence.
Upon seeing our friend, our foes put up their defense
Where is a dead lantern, & the candle of the sun whence?
My eye-liner is the dust of your door and fence
Where shall I go, tell me, you command me whence?
Take your focus from your chin to the trap on the path hence,
Where to O heart, in such hurry you go whence?
May his memory of union be happy and intense
Where are your amorous gestures, & your reproach whence?
Make not restlessness & insomnia, Hafiz's sentence
What is rest, which is patience, and sleep whence?

काहे को ब्याहे बिदेस अमीर खुसरो

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले 
हमको दियो परदेस 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ 
जित हाँके हँक जैहें 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगे हैं जैहें 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

कोठे तले से पलकिया जो निकली 
बीरन में छाए पछाड़ 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ 
भोर भये उड़ जैहें 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

तारों भरी मैनें गुड़िया जो छोडी़ 
छूटा सहेली का साथ 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

डोली का पर्दा उठा के जो देखा 
आया पिया का देस 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 

अरे, लखिय बाबुल मोरे 
काहे को ब्याहे बिदेस 
अरे, लखिय बाबुल मोरे 

इस रचना के कुछ अंशो को हिन्दी फ़िल्म उमराओ जान के लिये जगजीत कौर ने ख़्य्याम के संगीत में गाया भी है
kavitakosh से 

Monday, September 30, 2013

अपने भरोसे

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब सात सौ किलोमीटर दूर सिंगरौली जिले में एक महान का जंगल है। इस जंगल को सरकार ने कोयला खदान के लिए चिह्नित कर दिया है। करीब बासठ गांवों के एक लाख से ज्यादा लोग अपनी जीविका के लिए जंगल पर निर्भर हैं। फिलहाल कंपनी (हिंडाल्को और एस्सार का संयुक्त उपक्रम महान कोल लिमिटेड) को छत्तीस शर्तों के साथ पर्यावरण मंत्रालय ने पहले चरण की इजाजत दे दी है, इसमें वनाधिकार कानून 2006 की शर्तें भी लागू होंगी।
वनाधिकार कानून कहता है कि सदियों से जंगल पर अपनी जीविका के लिए निर्भर लोगों का ही जंगल पर अधिकार है। इसलिए ग्रामसभा की अनुमति के बिना जंगल को निजी कंपनियों को नहीं दिया जा सकता है। लेकिन कंपनी और स्थानीय प्रशासन ने बिना निष्पक्ष ग्राम सभा आयोजित करवाए ही मुआवजा के नाम पर जंगल में महुआ पेड़ों की ‘मार्किंग’ करना शुरू कर दिया। ग्रामीणों द्वारा विरोध किए जाने पर प्रशासन ने पुलिस बल बुला लिया। हालात की गंभीरता को समझते ही गांव की महिलाएं आगे आ गर्इं और मोर्चा संभाल लिया।
अमिलिया गांव की निवासी कांति सिंह खैरवार उन महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने जंगल में अवैध रूप से की जा रही मार्किंग का विरोध किया। कांति अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि तहसीलदार साब लोग कहे कि कंपनी को बैठने दिए तो पांव पसार रही है। (महान कोल लिमिटेड के पास ही एस्सार पावर प्लांट भी स्थापित है)। हमलोग कहे कि हमलोग न कंपनी को बैठने दिए, न पैर पसारने देंगे। इस पर तहसीलदार बोले कि कोयला खनन होगा। तुमलोगों का जंगल नहीं है। सरकार का जंगल है और तुमलोग इसको रोक नहीं सकते। लेकिन हम पूछते हैं कि जब जनता का जंगल पर कोई अधिकार ही नहीं है, तो काहे सरकार महुआ के पेड़ का मुआवजा हमलोग को देना चाह रही है।
गांव की एक और महिला समिलिया साफ लहजे में कहती हैं कि हमारा गुजर जंगल में है। वहीं से हमलोग जी रहे हैं। हमको न तो पुलिस से मतलब है, न पटवारी और तहसीलदार से। हम अपना जंगल जानते हैं, जहां
पुरखों से हम जी रहे हैं। हम जंगल नहीं छोड़ेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए। जंगल के बिना जीने की कल्पना करने से भी डरने वाली मनकुमरी देवी सीधा हिसाब जोड़ती हैं- ‘महुआ पत्ता, तेंदु, चाड़ और नहीं कुछ मिला तो जंगली लकड़ी। इन सबसे घर-परिवार के गुजर-बसर के लिए हम पैसा कमा लेते हैं।’ मेरे नोटबुक की ओर इशारा करते हुए मनकुमरी कहती हैं कि ‘लिख दीजिए कि हमलोग लड़ेंगे। इ जंगल हमारा राजा है। बाप-माई सब इ जंगले है। नहीं छोड़ेंगे।’
मनकुमरी देवी की बात को बीच में ही काटने वाली सुकमरिया देवी की चिंता थोड़ी अलग है। उन्हें डर है कि कहीं कंपनी और जंगल विभाग के द्वारा महुआ के पेड़ों की नंबरिंग और मार्किंग के नाम पर काटने-छिलने से नुकसान न पहुंचे। वह सीधी-सी बात बताती हैं- ‘कंपनी रुपया देकर गांव के अमीर लोग को खरीद सकती है, हम गरीब अपने जंगल के कोई कीमत नहीं लगा सकते हैं। कंपनी के पैसे से हमारा गुजर-बसर नहीं हो सकता। इसलिए हमको अपना जंगल चाहिए। बस!’ इन्हीं महिलाओं में से किसी ने जाते-जाते कहा- ‘हम लड़ने जाएंगे। किसी से डरते नहीं हैं। न दलाल, न कंपनी और न प्रशासन। पुरुष जाएं या नहीं जाएं, हम लड़ने जाएंगे। जरूर!’
दिल्ली से भोपाल तक समाज में महिलाओं की स्थिति पर बहस छिड़ी हुई है। समाज में महिलाओं की कमजोर स्थिति पर बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं। साहित्य से लेकर अकादमिक बहसों तक में हर रोज स्त्री-विमर्श पर एक नया अध्याय जोड़ा जा रहा है। ठीक इसी दौर में इन विमर्शों और बहसों से दूर महान जंगल में अपने जंगल-जमीन को बचाने के लिए आंदोलन कर रही आदिवासी महिलाएं स्त्री-विमर्श को नया आयाम दे रही हैं। यह अलग बात है कि मध्यवर्ग में केंद्रित देश और राज्यों की राजधानियों में चल रहे स्त्री-विमर्श के सेमिनारों में इन आदिवासी महिलाओं की लड़ाई के लिए कोई जगह नहीं है।

( यह लेख जनसत्ता में छप चुका है- यहां पढ़ सकते हैं)

Saturday, September 28, 2013

पड़ोसी 2


आँगन के अहाते में
रस्सी पे टँगे कपड़े
अफ़साना सुनाते हैं
एहवाल बताते हैं
कुछ रोज रुठाई के,
माँ बाप के घर रह कर
फिर मेरे पड़ोसी की
बीवी लौट आयी है।

दो चार दिनों में फिर,
पहले सी फिज़ा होगी,
आकाश भरा होगा,
और रात को आँगन से
कुछ कॉमेट गुज़रेंगे।
कुछ तश्तरियां उतरेंगी।
Gulzar

Zindagi via cinema part 3

(कहानी के इस अंतिम भाग को सबसे अंत में ही पढ़े...पार्ट वन, पार्ट टू और पार्ट थ्री..)
हाईस्कूल के बाद बेगूसराय शहर के एक लॉज में ठिकाना बना। लॉज भी एक दम दीपशिखा (शहर का सबसे सस्ता सिनेमाहॉल) के पास लिया गया था। कभी घर को फोन करके तो कभी बिना बताए ही। हम सिनेमा हॉल जाते रहते। कभी ना-नु करने पर लॉज के दोस्तों का रेडिमेड तर्क तैयार रहता- दिन भर पढ़ो और रात को तो सोना ही है तो उस टाइम में फिल्म देख लो। स्पेशल, डीसी, बीसी। ज्यादातर स्पेशल ही देखते। ब्लैक में टिकट लेने की न तो हिम्मत थी न पैसे। हमेशा घंटों लाइन में खड़ा हो ही टिकट लिया है- स्पेशल वालों की लाइन में भीड़ हमेशा ज्यादा होती। एक बार स्पेशल (सबसे सस्ता) वाले लाइन  में खड़ा क्लास की एक लड़की ने देख लिया था। उसका तो नहीं पता लेकिन मैं लगभग टिकट खिड़की के पास पहुंच कर लौट आया था। एक धक्का सा लगा था स्टेट्स सिंबल पर। आजतक स्पेशल में लड़कियों का जाना खराब और असुरक्षित सा माना जाता है। हां, संडे को जरुर मॉर्निंग शो में स्टूडेंट पास लेकर बीसी टिकट पर सिनेमा देखता था। ये जिश्म, जहर, क्योंकि, हम आपके हैं कौन, ताल जैसे फिल्मों का दौर था।
सोचता हूं अगर ये पार्टनरशिप नहीं होता तो हम जैसे बिहारी लड़कों का क्या होता... कई बार पैसे न होने पर पार्टनरशिप में फिल्में भी देखी है बेगूसराय के उस विष्णु नगर वाले मोहल्ले में। दो लोग तैयार होते। एक ही टिकट पर दो लोग देखते सिनेमा। इंटरवल से पहले और बाद में बंटा था। सिनेमा के बाद दोनों आपस में बैठ एक-दूसरे को कहानी बता फिल्म पूरी करते। एकाध बार ऐसा भी हुआ कि जो दोस्त आधे पैसे लेकर फिल्म देखने गया वो इंटरवल के बाद निकला ही नहीं। कई दिनों तक आपस में तनातनी बनी रही। कई बार लॉज का कोई पैसे वाला बोरिंग फिल्म देखने चला जाता। बीच फिल्म से टिकट ले लौट आता। वो टिकट जिसके हाथ लगी वो उस दिन मुकद्दर का सिंकदर बना घूमता।
सिनेमा ने फिर जिन्दगी को मोड़ा
बेगूसराय घर के संपर्क में रहता था। चुपके से लगता है घर को बता आया मेरे फिल्म देखते जाने और बिगड़ते जाने की कहानी। घर को लगा लड़के को पटने भेजते हैं शायद सुधर जाय। बड़ा शहर आपको बड़े सपने दिखाता है घर वालों ने शायद सोचा होगा। मेरे लिए बड़ा शहर मतलब और भी ज्यादा बड़े परदे पर सिनेमा देखने का लोभ मात्र था। पटने में अशोका-राजधानी का गौरव हुआ करता था। लेकिन पहली फिल्म इमरान हाशमी की देखी थी- अक्सर, रिजेन्ट में। बोरिंग रोड से गांधी मैदान फिर वही पैडल मारते साईकिल पर सवार। नाइट शो और लॉज के गेट फांदने का चस्का तो बेगूसराय में लगा लिया था।
ब्लैक में बेचे हैं टिकट मैंने
अशोक में पच्चीस रुपये स्पेशल का रेट था। लाइन में करीब दो घंटे पहले तो लग ही जाना होता। एक बार रब ने बना दी जोड़ी के लिए लाइन में लगे हुए थे। एक आदमी को सिर्फ तीन टिकट देना अलाउ था। मेरी बारी आई तो किसी ने पीछे से कहा- भैया, आप अकेले हैं, दो मेरे लिए भी ले लीजिए। मैंने ले भी लिया लेकिन उस आदमी को टिकट दिया नहीं- हड़काया। मुझे क्या फायदा होगा। उस आदमी ने जल्दी से पच्चीस वाले टिकट के लिए पचास हाथ में थमा दिया। दो टिकट के सौ रुपये। मतलब खुद की सिनेमा फ्री तो देखो ही साथ ही, खाते-पीते रहने का इंतजाम भी। इसके बाद कई ऐसी फिल्में देखी जिसमें खुद और दोस्तों को फ्री में सिनेमा दिखला लाया। यह नयाब तरीका उन दिनों सिनेमा देखने के लिए वरदारन बनकर आया था मेरे लिए।
एक बार घर से भागने का मन हो गया। लगा इस दुनिया में जीना है तो घर से भागना ही पड़ेगा। बिना बताये निकल गया पटना के डेरा से। डेरा में भाई और मामा के साथ रहता था। दिन भर घूमता सोचता रहा। इस बीच महावीर मंदिर पर जाकर दो घंटे बैठ आया। वहीं से अशोका फिल्म देखने आ गया- चक दे इंडिया। फिल्म पूरी होते-होते भागना कायरपना लगने लगा। फिल्म देख गांधी मैदान आया सीधे। डायरी में कुछ पन्ने लिखे। कुछ मन में ठाना और शाम तक डेरा लौट गया। फिल्में हमारी जिन्दगी में कब हौले से आ बैठ जाती हैं हमें इल्म तक नहीं हो पाता।
अब पटने से निकल गया हूं। दिल्ली के दिनों में वसंत विहार प्रिया में कई बार मॉर्निंग शो देखने जाता रहा। दिल्ली में ही कई विदेशी फिल्मों का चश्का लगा। ईरानी माजिद मजीद जैसे कई बड़े फिल्मकारों से भेंट हुई वाया सिनेमा। आईआईएमसी और जेएनयू के दोस्तों की बदौलत सिनेमाई ज्ञान में अब बुद्धिजीविता आ गयी है। अब चेन्नई एक्सप्रेस अच्छी नहीं लगती। दिवाकर और अनुराग के शॉर्ट फिल्में काफी पसंद आती हैं। इधर लूटेरा और मद्रास कैफे देख मन गदगद है। कई बार बौद्धिक बनने के लिए नांनटिज की फिल्मों को कूड़ा-करकट तक कह देता हूं लेकिन आज भी दूरदर्शन पर देखी वो फिल्में कहीं भीतर अंदर फंसी हुई हैं।
फिलहाल पसंदीदा फिल्मों या यादगार फिल्मों की फेहरिस्त काफी लंबी होने के बावजदू भी कुछ नाम रख दे रहा हूं-
अर्जून पंडित- वजह पूरे पांच साल तक मेरे जिन्दगी की जगह ही बदल कर रख दी। शायद आदमी भी बन पाया।
चक दे इंडिया- जिसको देखने के बाद घर छोड़ने का प्रोग्राम कैंसल किया। भागो नहीं दुनिया बदलो की ठानी है।
गोलमाल- जितनी बार देखता हूं उतनी बार तारोताजा
चश्मे बद्दुर- एक ऐसी फिल्म जिसे सौ बार लगातार देख सकता हूं।
द डिक्टेटर- चार्ली की हँसी के पीछे छिपे दर्द को उकेरने वाली शानदार फिल्म
चिल्ड्रेन ऑव हैवन्स, ब्यूटीफूल चिल्ड्रेन- बच्चों के बहाने ईरानी जिन्दगी और तकलीफों को चित्र की तरह कैनवास पर उकेर देने के लिए
मोटरसाईकिल डायरिज- कॉमरेड चे की कहानी
लूटेरा- बेहतरीन..बेहतरीन...बेहतरीन
मद्रास कैफे- हिन्दी फिल्मों का विदेश
हंगामा
हेरी फेरी
दो गज जमीन


Zindagi via Cinema 2


इस बीच घर ने अपने डांट-फटकार के बावजूद भी मेरे सिनेमाई ललक को कम होता न देख वो फैसला लेने पर मजबूर हुआ, जिसने रातों-रात मेरे दोस्तों के बीच मेरा ओहदा काफी उंचा कर गया। एक दिन ठेले पर ऑनिडा ब्लैक एंड व्हाईट टीवी को अपने दरवाजे चढ़ते देखा, साथ में एक छोटी सी बैटरी भी। आनन-फानन में एक बांस काट कर लाया गया। अंटिना सेट करते हुए मामा को हमलोग बताते रहे- आ गया, झिलमिला रहा है, चला गया जैसे शब्द उस दिन रात तक आंगन में गोल-गोल चक्कर काटते रहे। शुक्रवार की उस रात गांव-टोले भर में बात फैल चुकी थी कि मेरे घर में टीवी आ चुका है। आस-पड़ोस वाले जिनके यहां से काफी घरेलू रिश्ता था हमारा। बड़े ही अधिकार से उस रात साढ़े नौ से पहले ही आ जमे थे। चाय की केतली गरम होने को चढ़ा दी गयी। बड़े-बूढ़ों के लिए कुर्सी और बच्चे जमीन पर। तकरीबन पचास से ज्यादा लोगों की दर्शक-दिर्घा तो रही ही होगी। पहली फिल्म चली- प्रेमरोग। घर थोड़ा बेगूसराय वाले क्रांतिकारी पृष्ठभूमि का तो था ही। फिल्म अंत तक न जाने कितने बूंद आँसू टपकाए। हमें तो लूट लिया- भवरें ने खिलाए फूल-फूल कोई ले गया राजकुमर। टीवी वाला घर बनने की उत्तर-कथा ये हुई कि अब मेरे दोस्त मेरी खुशामद करने लगे, किसी से लड़ाई होने पर उसकी सजा अपने घर टीवी नहीं देखने की धमकी के रुप में दिया जाने लगा, इसी टीवी को देखने का दरवाजा खुलते ही लड़ाई भी खत्म हो जाती। इस तरह सिनेमा हम दोस्तों की लड़ाई और सुलह को तय करने लगा था।
  एक घटना और याद हो चला आता है। एक बार पटना गए थे। जिन रिश्तेदार के यहां रात में रुकना हुआ उनके घर रंगीन टीवी केबल के साथ लगा देखा। पहली बार रंगीन टीवी और उसपर भी रात-दिन सिनेमा आने वाला चैनल जी-सिनेमा। रात भर आवाद धीमी करके टीवी पर सिनेमा देखता रहा था। करिश्मा-गोविंदा-बादशाह-अहले जब चार बजे सुबह के करीब माँ ने कान उमेठ डांटना शुरू किया तब जाकर सोया था उस रात।
   रंगीन टीवी देखने के बाद अपना टीवी कुछ फीका सा लगने लगा। बिहारियों में असुविधाओं के विकल्प खोजने की जबरदस्त ताकत है, जिसे जुगाड़ टेक्नोलॉजी कहते हैं। इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी से ही न जाने कितने घरों में गोबर गैस की बत्तियां जलती हैं और न जाने डिल्ली-बम्बई-कलकत्ता में मजे की जिन्दगी भी। तो मैंने भी अपने टीवी को रंगीन करने की ठानी। पटने में ही मिला एक शीशा-चारों तरफ ब्लू..बीच में लाल..और थोड़ा-थोड़ा हरा भी। उस ऑनिडा ब्लैक एंड व्हाईट टीवी पर उपर से चिपका दिया गया। रंगीन टीवी के पूरे मार्केट को ठेंगा दिखाते हमारी ऑनिडा ने भी रंगीन कलर में सिनेमा दिखाने लगी।
डीभीडी और सीडी का हमारे गांव तक आना
उस समय तक डीभीडी काफी प्रचलित था लेकिन धीरे-धीरे डीवीडी और सीडी में बनकर नयी-नयी फिल्में हमारे गांव तक का रास्ता तय करने लगी थी। तमाम तरह के मेले-ठेले, तीज-त्योहार में हम गांव में चंदा करते। कभी ज्यादा पैसे होने पर परदे पर प्रोजेक्टर के सहारे सिनेमा दिखायी जाती। कम पैसे होने पर डीवीडी प्लेयर में सीडी दिखा काम चलाया जाता। हां, एक बात और दोनों ही माध्यमों में पहली फिल्म का धार्मिक विषय होना अनिवार्य सा रहता। देर रात कोई भूतहा फिल्म लगाया जाता।
  ये जिन्दगी सिनेमा के नाम
बेगूसराय के जिस सुदूर दियारा इलाके के गांव से मैं आता हूं। उसके बारे में मशहूर है कि बारह-तेरह साल की उमर में अगर बम फेंकना न सीखे, तमजा खोंस कर चलना न सीखें तो शक की काफी गुंजाईश है कि वो बच्चा उसी गांव का है कि कहीं सरईसा से उठ आया है। तो मैं पांचवी में था। सावन का महीना। अंतिम सोमवारी। गांव से सात किलोमीटर दूर विद्यापति धाम, जहां हर सोमवारी भारी संख्या में लोग जल चढ़ाने आते। स्कूल के दोस्तों ने कहा चलो बाबा के यहां जल चढ़ाते हैं। मैंने मना कर दिया। जानता था जल तो बहाना है असली काम भिडियो हॉल में सिनेमा देखने जाना है। लेकिन दोस्तों को यूं ही कोई कमीना थोड़े न कहता है। बाबा शिव का ऐसा डर दिखाया कि घर का डर एक बार को बहुत टुच्चा सा लगने लगा। आज भी याद है सावन के उस बारिश में केले के पत्ते की ओट में हम भागते-भागते सीधा सिनेमा हॉल ही पहुंचे थे। बाबा को जल चढ़ाने का मतलब था फिल्म आधी छूट जाना इसलिए पोस्टपोन्ड।
फिल्म थी- अर्जून पंडित। सन्नी देओल। शायद पेशे से वकील था। प्यार-मोहब्बत-बदले की कहानी। एक-एक रुपये की टिकट ले हमने जमीन वाली सीट बुक कर ली थी। फिल्म देख घर को लौटे- दरवाजे पर खड़ी वो भीड़ आज भी जस का तस याद है। लगा कोई दुर्घटना हुई। दिल धक्क। जाकर देखा तो माँ रो रही थी। लोग हमें खोजने के लिए चारों तरफ भेज दिए गए थे। अपहरण का अंदेशा था। पिटायी नहीं हुई थी उस दिन। एक खतरनाक चुप्पी थी जिसे हमने रात की रोटी को कुतरते हुए महसूस किया था। सुबह वाली ट्रेन से हमें ननिहाल की तरफ भेजा जा चुका था। ननिहाल। जहां कड़े अनुशासन वाले मामा थे, दिन भर की खबर लेते नाना जी थे। आने वाले पांच साल यहीं बिताने थे मुझे। आज भी सोचता हूं अगर अर्जून पंडित न देखा होता तो शायद मैं भी गांव के अपने दूसरे दोस्तों की तरह कहीं गुमनामी में खड़ा तमचें और बम बनाना सीख रहा होता।
    लेकिन  इन सबके बीच साथ बना रहा तो मेरा सिनेमाई प्रेम। ननिहाल के कड़े अनुशासन वाले माहौल में नौ बजे रात तक रट्टा मार-मार पढ़ना जरुरी होता। फिर खाना और सोना। सिनेमा सिर्फ रविवार की शाम को देखने की इजाजत थी। आज भी याद है शुक्रवार और शनिवार की वो रातें जब अपने कंबल के एक कोने को उठा चुपके-चुपके पूरी फिल्म देखा करता। कभी-कभी तो रात भर कंबल के नीचे सर गोते सिर्फ आवाज के सहारे ही पूरी फिल्म आँखों से गुजर जाती। एक नयी बात ये जरुर हुई कि अब अखबारों और सरस सलिल के माध्यम से फिल्मी खबरें भी पढ़ने को मिलने लगी।
मेरे साथ हमेशा यही होता है जब अपनी यादों की पोटली पसार बैठता हूं तो उसे समेटना मुश्किल सा हो जाता है। मीडिल स्कूल के बाद हाईस्कूल में दाखिला लिया था हमने। सबसे दूर वाले स्कूल में। वजह ये कि वहां फिल्म के दो थियेटर थे। बड़े परदे पर फिल्म देखने की जो ललक दलसिहंसराय में जगी थी उसके पूरे होने के दिन शुरू होने वाले थे। साईकिल से पांच किलोमीटर की रोजाना यात्रा। स्कूल में हाजिरी भी जरुरी होता। पहले हाजिरी बनती। साईकिल हम बाहर ही रख छोड़ते। एक दोस्त स्कूल के बाहर बाउंड्री के पार वाले हिस्से में खड़ा होता। हम धीरे-धीरे अपना बस्ता उधर फेंक देते। फिर एक चाहरदिवारी नुमा छत से नीचे की छलांग। सारा ध्यान साईकिल के पैडल पर। स्पीड..स्पीड...और स्पीड। एक भी सीन छूटना नहीं चाहिए। इस तरह हिन्दी-भोजपुरी फिल्मों के संसार में धड़धड़ाते पहुंच जाते हम। बड़े परदे की फिल्में, कि फिल्म के बीच ब्लेड फेंक देने से पर्दा फटने की कहानियां और न जाने क्या-क्या। चार या पांच रुपये में बेंच पर बैठ कर फिल्म देखने का वह सुख जरुर फिर दोहराना चाहता हूं। सुख का तेज अनुभव उस दिन भी हुआ था जब हमने मैट्रीक की परीक्षा खत्म कर सिनेमा हॉल पहुंचे थे। थोड़े से बड़े होने के सुख ने सामने वाले फिल्मी परदे को भी उस दिन काफी बड़ा कर दिया था।

जारी....

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...