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Wednesday, April 16, 2014

खुद से बात #2

कभी-कभी किसी खास दोस्त का फोन आ जाता है। दोस्त, जिससे हर रोज बात न हो, फिर भी जो मुझ पर विश्वास करे।

उसके सामने मन की वो बात भी शेयर हो जाती है, जिसका खुद भी पता नहीं होता।

कभी-कभी ऐसे दोस्तों के सामने रोया भी जाता है।

रोने के बाद अच्छा भी लगता है। सच में। रो कर देखना। ईमानदार आसूँ का निकलना आदमी बनाये रखने का जरिया भी हो सकता है। सच में।

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...