Tuesday, June 25, 2013

हंसोड़ कॉमरेडः चार्ली चैपलिन



चार्ली चैपलिन को पहली बार छुटपने में 'चैरी बोलेसम' के एड में देखा था। वो स्कूल जाने के शुरुआती दिन थे। सफेद शर्ट, ब्लू हाफ पैंट, एक स्कूल बैच लगा टाई और चैरी बोलेसम से पोलिश किया जूता। गांव के उस नये खुले प्रायवेट 'इंडियन पब्लिक स्कूल' में हर नकल शहरी अंग्रेजी स्कूलों की होती थी। पहनावा से लेकर टिफिन का डब्बा तक। हां, पढ़ाई का मीडियम हिन्दी बना रहता। मास्टर साब कई बार खुद अंग्रेजी में लपटाते तो बच्चा को ही सोटिया देते। तो चार्ली उसी जमाने में हमें हंसाता हुआ टीवी पर आने लगा था। उस दौर में दूरदर्शन पर स्कूल जाते समय 'शान्ति' और लौटने के वक्त 'युग' सीरियल आता था। हमेशा 'शान्ति' को अधूरे मन से छोड़ कर निकलना पड़ता और शाम तीन बजे दौड़ते हुए आधे से 'युग' सीरियल देखने को मिलता।


फिल्म डिक्टेटर में चार्ली
चैरी बोलेसम एड देखते समय इतना पता थोड़े न था कि इ विदेशी फिल्मों का हीरो है। इतना दुबला-पतला आदमी, नाक सिंकौड़े-विदेशी मूंछ तो हमारे यहां फिल्मों-नाटकों में कॉमेडियन कम साइड हिरो का ही हुआ करता है। वो जमाना मिथुन से निकल सन्नी देओल, अमीर खान, सलमान, गोविंदा का था। सब मोटे-ताजे या फिर संजय दत्त टाइप अन्याय के खिलाफ गोली-बंदूक उठाने वाले।
फिल्में वही गांव के ठाकुर का शोषण, शहरी कोरपोरेटी बाप का इश्क में बाधा जैसे मुद्दे पर ही बनती थी। उस समय ठाकुरों की पिटाई करते ये हीरो सच्चे के नायक लगते। हमारे ग्रुप के बच्चों ने बांट लिया था। सबको बड़ा हो कर गोविंदा, सलमान या फिर संजय दत्त ही बनना था।

दूरदर्शन वालों से आज शिकायत करने का मन करता है। हम गांवों-कस्बों में बड़े होने वाले जेनरेशन को विदेशी सिनेमा से मरहूम करने की साजिश इसी सरकारी चैनल ने किया है। आज बप्पी लहरी जमाने की फिल्मों के बारे में सोचकर हंसी आती है।
धीरे-धीरे गांव से भाया कस्बा होते हुए शहर पहुंचा। कुछ केबल टीवी और कुछ यूट्यूब पर चार्ली चैपलीन की फिल्मों को देखने लगा- आज भी पूरा नहीं देख पाया हूं लेकिन दो-तीन फिल्मों को ही देख मन मानने लगता है कि अपना हिन्दी सिनेमा चार्ली चैपलिन जैसा एक भी हीरो पैदा न कर सका। कोई एक हीरो का नाम ले लीजिए जिसके प्रति श्रद्धा से आपका मन भर जाय लेकिन चार्ली की महानता देखिये कि आज भी उसकी फिल्मे दुनिया के हर कोने में देखी-पसंद की जाती है। चार्ली की कोई फिल्म देख लीजिए। उनकी फिल्मों में भी शोषण, अमानवता, असमानता के खिलाफ लड़ाई दिखती है लेकिन झुठउका मार-धाड़, धिसुम-धिसुम से अलग। हमारे यहां तो नायक पिलपिलाया रहता है आव देखा न ताव मार-पीट शुरू। अब जरा सोचिये जो जेनरेशन ही जवान हो रहा हो मारपीट-धिसुम-धसाम के बीच उसकी समाज-व्यवस्था और जीने की लड़ाई में कितनी गहराई आ पाएगी। चार्ली अपनी फिल्मों में कैसे हंसते-हंसाते बड़ी-बड़ी चोट कर जाते हैं। खुद मार खा कर भी इस व्यवस्था को गहरी चोट  पहुंचा जाते हैं। हमारे यहां का कोई हीरो मार खाने लगे तो उसे फ्लॉप मान लिया जाता है।

हिन्दी फिल्मों में शोषण से लड़ते-लड़ते नायक चोली के पीछे क्या है..गाने लगता है (मैं सभी हिन्दी फिल्मों की बात नहीं कर रहा)। जिस तरह के शोषण, अव्यवस्था से हमारे युवा पीढ़ी में गुस्सा, नफरत पैदा हुआ था उसे इस मुए सीनिमा ने एंग्री यंग मैन में बदल कर रख दिया। आप याद कीजिए उस जमाने की कोई फिल्म जिसमें कोई गंभीर बात कही गई हो( हम सब सन्नी दैओल की तारीख पर तारीख वाला डॉयलॉग सुन ही खुश होते रहे।) चार्ली की हर फिल्म में आपको एक गंभीर डिबेट दिख जाएगा। द डिक्टेटर में चार्ली का दिया गया लास्ट भाषण ही सुन लीजिए। मानवता के प्रति प्रेम, युद्ध-गुस्सा, मशीनीकरण पर मानव की विजय का कितना गंभीर फोटो खिंचते हैं चार्ली। चार्ली ने कितनी गहरी चोट पहुंचाई है इस कारपोरेटी तंत्र की फिल्म मॉडर्न टाइम्स में और वो भी आज से पचासियों साल पहले ही उन्होंने औद्योगिकरण के खिलाफ जो सवाल उठाए....आज भी घोर समकालीनता रखते हैं।

कुछ-कुछ राज कपूर साब ने चार्ली सा कुछ करने का प्रयास किया। इसलिए भी राजकपूर मुझे अच्छे लगते हैं तब से जब चार्ली की फिल्मों से परिचय नहीं हुआ था। विदेशी फिल्मों की नकल भी बॉलीवुड ने सेलेक्टिव ही किया। मार-धाड़, एक्शन और धूम-धड़ाका तो चुरा लिया लेकिन वो ह्युमर, वो सटायर वहीं छोड़ आए जो चार्ली की फिल्मों को कालजयी फिल्म बनाते हैं।

शायद दोष हम दर्शकों का ही है। हिष्ट-पुष्ट हीरो चाहने वाले हम हिन्दी दर्शक एक दुबले-पतले,नाटे से आदमी को हीरो के रुप में शायद ही स्वीकार पाते। देखिये न कैसे सलमान से लेकर आमिर तक सबको बॉडी बनाकर फिगर मेंटेन करना पड़ रहा है- हमारी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए। 

indian charlie
और अंत में, मेरा कतई मानना नहीं है कि हिन्दी फिल्मों में कुछ अच्छा है ही नहीं। सामानंतर सिनिमा भी इसी हिन्दी सिनेमा का पार्ट रहा है और मुख्यधारा में भी दर्जनों गंभीर-उत्कृष्ट फिल्में बनती रही हैं..बन रही हैं।

लेकिन भाई कॉमरेड चार्ली की तो बात ही कुछ और है..
आज भी चार्ली की नकल करने वाला मन को गुदगुदा जाता है। अभी चार्ली को बहुत पढ़ना देखना है..मैं तो चला।

फिलहाल पूरा ब्लॉग चार्ली की फोटो से भर देना चाहता हूं...लेकिन बहुत कोशिश के बाद भी गुगल चार्ली और चैरी बोलोसम और साथ में उस मोटे अंकल जिसका जूता नहीं चमक पाता की तस्वीर नहीं मिल पायी।
विडियो लगा रहा हूं देखने लायक चीज है।
अब चार्ली के इस कोट के साथ विदा
To truly laugh, you must be able to take your pain, and play with it!
Charlie Chaplin






(note-  किसी दोस्त ने कहा कि अच्छा लिखा है लेकिन सतही लेख है। चार्ली सच में गंभीरता की मांग करते है।
उनसे सहमत हूं..इस लेख को भावनात्मक माना जाय..बोला ही है अभी चार्ली को और पढ़ने-देखने की जरुरत है) 

Saturday, June 22, 2013

पटना टू सिंगरौली..इंडिया से भारत का सफर

बादल और धुंए का ये दृश्य




सिंगरौली लौट आया हूं। कभी पहाड़ों के उपर तो कभी उनके बीच से बलखाती निकलती पटना-सिंगरौली लिंक ट्रेन। बीच-बीच में डैम का रुप ले चुकी नदियों और उनके उपर बने पुल तो कभी पहाड़ो के पेड़ से भी ऊंची रेल पटरी से गुजरती ट्रेन। जंगल में उदास खड़े चट्टान और थोड़ी दूर-दूर पर खड़े अपने-अपने अकेलेपन के साथ पेड़। ट्रेन की खिड़की से झांकती मेरी आंखे और बीच-बीच में कैमरे का क्लिक। दूसरी तरफ मेरे हाथों में नाजियों द्वारा तबाह-बर्बाद कर दिए गए कस्बे लिदीत्से पर निर्मल वर्मा का यात्रा संस्मरण- मानो लिदीत्से पर किए गए उस नाजी अत्याचार को फोटो खींच रहे हों वर्मा। तय करना मुश्किल इन पहाड़, जंगल. नदी को देखता रहूं, जो शायद कुछ सालों बाद मानव सभ्यता के विकास के नाम पर बर्बाद कर दिए जाएंगे या फिर नाजियों के द्वारा जलाए गए बच्चों की स्कूल जाती तस्वीर और मार दी गयी औरत के नीले स्कार्फ के संस्मरण पढ़ता रहूं। आखिर क्या अंतर है उस जर्मनी के नाजी अत्याचार और इस दुनिया के महान लोकतंत्र वाले देश में जहां जल-जंगल-जमीन-जन की रोज विकास के नाम पर हत्या की जा रही है?
लोगों से सुनता हूं कि कुछ साल पहले तक सिंगरौली जैसे इलाकों में जब ट्रेन किसी रेल फाटक से गुजरती थी तो पहले ट्रेन का ड्राइवर उतर कर फाटक बंद करता था फिर फाटक गुजर जाने पर कोई सवारी या गार्ड उतर फाटक बंद कर देता और ट्रेन आगे बढ़ती। छोटे-छोटे स्टेशनों पर लोग उधर से गुजरने वाली इक्का-दुक्का एक्सप्रेस ट्रेनों को हाथ देकर रोकते, अपने संबंधियों के आने तक ट्रेन रोकने का अनुरोध करते, या फिर पूरा सामान उतारने तक ट्रेन को रोके रखने को कहते लोग। ट्रेन के ड्राइवर भी जानते कि आने-जाने के लिए यही ट्रेन सहारा है इसलिए आराम से चलते। कोई हड़बड़ी नहीं। वैसे भी यहां के लोगों में भागमभाग कम ही देखता हूं। जब से यहां आया हूं भूल जाता हूं कि कौन सा दिन है, क्या तारीख है, क्या महीना, क्या समय। समय मानों खुद दो-तीन दिन पीछे चल रहा हो। हमारी सरकारें इन सुस्त पड़ गयी जिंदगी की रफ्तार को विकास के सहारे भगाना चाहती हैं। ऐसा भागमभाग, ऐसी दौड़ जो अंधेरे गली में जाकर खत्म होती है।
रास्ते में ऐसे-ऐसे स्टेशन गुजरते हैं जहां आपको रिसिव करने के लिए ऑटो, कार, बाइक सब प्लेटफॉर्म पर ही खड़े मिल जाएंगे। ट्रेन के दरवाजे से नीचे उतर सीधा ऑटो में चले जाईये।  एक स्टेशऩ पर टीशन मास्टर साब गंजी बनियान में ट्रेन को हरी झंड़ी हिलाते दिखते हैं तो दूसरे स्टेशन पर उंघता हुआ फाटक मैन ट्रेन गुजर जाने के बाद हड़बड़ाता हुआ पीछे से हरी झंडी दिखा रहा है।
जंगल-पहाड़-नदी एक खूबसूरत लैंडस्केप बना रहे हैं। बीच-बीच में दूर कहीं बस्ती के नाम पर दो-तीन घरों का आभास भी हो रहा है जो पहाड़ों की ओट में दिखते-छुपते चल रहे हैं। मानो ये सब हकीकत नहीं एक कैनवास हो जिसके भीतर मैं पहुंच गया हूं। ट्रेन की खिड़की से देखते-देखते मैं दरवाजे पर खड़ा हो जाता हूं। मन करता है उतर जाउं इन्हीं पहाड़ियों-जंगलों में। अपना अतीत, भविष्य सबकुछ भूलकर यहीं का हो रहूं लेकिन रेनुकूट आते-आते सबकुछ वैसा ही नहीं रह जाता। प्लांट्स, उनके साये में बनी झुग्गियों में जिंदगी और चिमनी से उठता धुंआ मानो पूरे कैनवास पर धुंधलका सा छा जाता है। मन अजीब होने लगता है। आसमान में बादल और चिमनियों के धुंए का फर्क करना मुश्किल है। अब रास्ते में प्लांट्स के साथ-साथ बिजली के बड़े-बड़े तार, ग्रेनामाइट से उड़ाए गए या क्षत-विक्षत कर दिए गए पहाड़ो के चट्टान सब मिलकर एक विद्रुप रेखाचित्र लगने लगते हैं। बीच-बीच में आदिवासी महिलाएं माथे पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए एक पगडंडी बना चलती दिखती हैं। इस इलाके के आदिवासियों-मूलवासियों की स्थिति ये बताने के लिए काफी होती है कि विकास ने कितना और कितनी बार इन्हें छला है।
हां, एक बात और। एक घुमावदार रास्ते पर मैं खिड़की से झांक कर देखता हूं तो खुद को ट्रेन के सबसे पिछले बोगी में पाता हूं। मैं दौड़ कर दरवाजे तक जाता हूं। लगभग पटना से बारह बोगियों को लेकर चली ट्रेन रेनुकुट आते-आते तीन बोगियों का बन जाता है- बाद में एक साथ वाले यात्री ने बताया। हमारी  ट्रेन की रफ्तार धीमी हो गई है और कोयले लदी मालगाड़ियां तेजी से पास करायी जाने लगी हैं। युवा आदिवासी कवि अनुज लुगुन की एक कविता की पंक्तियां याद आती है जिसमें वो बताते हैं कि कैसे उनका पहाड़ ट्रकों पर लद शहर की ओर जा रहे हैं। यहां भी कुछ वैसा ही है। यहां के लोगों की जिंदगी को तबाह कर उनके पहाड़ खोद कोयले को रेल डब्बों में भर कहीं दूर भेजा जा रहा है।
धीरे-धीरे हमारी ट्रेन सिंगरौली पहुंचने को होती है। सिंगरौली वो फिल्म जिसमें कोयला खनन करने वाली पावर प्लांट्स विलेन बने हुए हैं और वो खैरवार, वैगा जैसे समुदाय के आदिवासी हीरो नजर आते हैं जो लगातार अपनी जमीन-जंगल को खोकर भी जी रहे हैं औऱ बचे हुए जंगल-जमीन को बचाने के लिए अनवरत संघर्षरत है। आज से नहीं आजादी के बाद से ही। इस भागते-दौड़ते अर्थव्यवस्था वाले कारपोरेटी लोकतंत्र से लड़कर जीतना महत्वपूर्ण तो है ही लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है लड़ने की ललक, अपने अधिकार-रोटी-रोजी को बचाने की आकुलता। जो हारने के बाद भी इन्हें इस फिल्म का हीरो बनाते हैं।

अविनाश कुमार चंचल
singrauli

Tuesday, June 4, 2013

बुढ़ाता लोकतंत्र

बीच-बीच में हमारे देश के प्रभु वर्ग को लोकतंत्र की चिंता सताने लगती है। उस समय और जब इसी देश की जनता दामिनी के लिए सड़क पर होती है या फिर ये चिंता और बढ़ जाती है जब अपने ही जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर दिए गए लोग हक की लड़ाई के लिए आवाज उठाने लगते हैं। लोकतंत्र के प्रति इन प्रभुओं का दर्द और चिंता बहुत ही स्पेशल  है। इन्हें तो किसी अदने से अरुंधती की अदनी सी खरी-खरी बात भी लोकतंत्र पर खतरा लगने लगता है। कितना कमजोर है इस देश का लोकतंत्र, आह।
आजादी के साठ साल बाद हुआ यह है कि हमारा लोकतंत्र  लोक से उठकर कहीं चला गया है..कोई मित्र बताते हैं कि कभी ये मुबंई के किसी बड़े शेयरखान के दफ्तर में दिखता है तो कभी दिल्ली के लुटियन्स में लेकिन  झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्यप्रदेश से लेकर उड़िसा तक कहीं भी लोकतंत्र नहीं दिखता।
मेरे दोस्त शोवरण..उन्हें भी लोकतंत्र मिल गया एक दिन संसद के गलियारे में..उनसे अच्छी खासी जवाब-तलब हुई.. मैं यहां उसे शोवरण के फेसबुक वॉल से उठा चिपका दे रहा हूं..आप भी पढ़िये ये रोचक दास्तान-ए-लोकतंत्र ऑफ अ ग्रेट इंडिया-
शोवरण



आजकल संसद बंद है। मन में जिज्ञासा हुई कि चलों देखें कि जब संसद में जूते चप्पल नही चलते हैं ,फिजूल की बहसें नही होती हैं और सबसे जरुरी बात जब जनता का पैसा बर्बाद नही होता है ,तब बंद संसद कैसी लगती है । अन्दर गया तो देखा कि भारतीय लोकतंत्र दण्ड पे दण्ड पेले जा रहा था । हमने पूछा... का भैया... काहे सलमान खान बनने पे आमादा हो ..तो लोकतंत्र बोला ..अरे का बताएं भैया हम बहुत प्रेशर में आ गए हैं ..उ का हैं कि एक तो हम दुनियां के सभी लोकतंत्रों से शारीरिक डील-डौल में थोड़े बड़े हैं और ऊपर से हियां का बुद्धिजीवी सब चिल्लाता रहता है कि भारत का लोकतंत्र मजबूत हो रहा है।
अब आप ही बताइए ई बुद्धीजीबी सब 60-65 की उम्र में भी मजबूती की उम्मीद करते हैं। लेकिन भैया हकीकत तो ये है कि हमें अन्दर से बड़ी कमजोरी फील हो रही है। जब जब मैं छत्तीसगढ़,झारखण्ड,उडिसा,आन्ध्र जाता हूं ..बीमार हो जाता हूं । और ये कमबख्त कश्मीर तो मुझे कभी रास ही नही आया ,जब जाता हूं तबियत खराब हो जाती है। और नार्थ-ईस्ट का तो मैं नाम लेते ही घबरा जाता हूं ..बहां के मणिपुर प्रांत का इरोम शर्मीला नाम का जीव तो पिछले 12 साल से मेरा खून चूसे जा रहा है...इधर सोनी सोरी नाम के छत्तीसगढ़ी जीव ने तो पिछले कई दिनों से मेरी नाक में दम कर रखा है और तो और इसने तो मेरे केयर टेकर सुप्रीम कोर्ट को भी नही छोड़ा ....जब भी बेचारा सोनी सोरी का नाम सुनता है ,हांफने लगता है। वाकई बड़ी कमजोरी फील कर रहा हूं भाई...और हां एक तो अपनी कमजोरी से परेशान हैं और ऊपर से ये नेता मेरा खून पिए जा रहे हैं । 
अभी पिछले दिनों जब महेन्द्र कर्मा और नंद कुमार पटेल की माओवादी हमले में मौत हो गई तो ये सोनिया गांधी कह रही थी कि कांग्रसी नेताओ पर हमला लोकतंत्र पर हमला है ...भैया मैं तो बहुत डर गया ..ये नेता लोग अपनी आपसी लड़ाई में मुझे बेमतलब काहे घसीटते हैं।भैया जिस दिन सुकमा में कांग्रेसी नेताओ पर हमला हुआ उस दिन तो मैं मुम्बई में अंवानी की पार्टी मे स्कोच पी रहा था । फिर कुछ देर बाद मीडिया में खबर आने लगी कि कहीं लोकतंत्र पर हमला हो गया तो मैने सोचा कि मैं तो हियां सेफ बैठा हूं फिर पता आखिर ये किस लोकतंत्र पर हमला हो गया ।फिर पता चला कि हमला तो कांग्रेसी नेताओ पर हुआ है और मीडिया फर्जी चिल्ला रहा है कि लोकतंत्र पर हमला हो गया । मीडिया की इन्ही अफवाहों की वजह से मैने अब डिस्टर्ब एरिया में जाना ही बंद कर दिया । बैसे भी इस लाल इलाके में जबसे सुरक्षा बलों ने मेरे भाई मानवाधिकार की हत्या की है ,मैने इस इलाके मे जाना ही बंद कर दिया । इसलिए मैं आजकल हियां संसद में ही रह रहा हूं और अपने आपको मजबूत बना रहा हूं। आखिर बुढापा भी कोई चीज होती है।

Tuesday, April 30, 2013

नर-मादा -इतिहास-भूगोल

 
डेनियल गोवर का स्केच

काफी अगंभीर मीडियम होने के बावजूद कभी-कभी फेसबुक पर गंभीर लिखावट अगंभीर रुप में मिल ही जाता है। एकदम स्पोन्टेनियस, अराजक, तितर-बितर तरीके से लिखे जाने वाले ये स्टेट्स अगर एक जगह इकट्टा कर दें तो एक पूरा का पूरा कहानी, उपन्यास या कविता जैसा कुछ हो जाता है।
बीच-बीच के अंतराल पर जे सुशील का लिखा भी कुछ ऐसा ही बन जाता है, जिसको एक जगह समेटने की तलब होने लगती है और फिर जब इसे पूरी समग्रता में समेट लो तो ये छोटे-छोटे स्टेट्स किसी कविता, कहानी या उपन्यास टाइप हो जाते हैं।
 पिछले दिनों इतिहाल और भूगोल का मेटाफर रचते हुए जिस तरह उन्होंने प्रेम, देह, गांव-शहर, यौनिक संबंध, विछोह, मेट्रो फिजिक्स, शंका और प्रेम के इन्टरनल  लाजिक को लिखा है, इनको पढ़कर बरबस ही आपको ernesto-cardenal  याद आ जाते हैं।  एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं एपिग्राम्स या फिर कहें सूक्तियों की तरह हमारे सामने आती हैं लेकिन इन एपिग्राम्स को एक जगह मिला दीजिए तो पूरा का पूरा एक एपिक या महाकाव्य आपके सामने होता है।

सुशील  एर्नेस्तो कार्देनालकी कविता तोते की तरह ही अपने आसपास की दुनिया को अपना मेटाफर बनाते हैं.
एर्नेस्तो की कविता तोते में साम्राज्यवादी अमरीका से त्रस्त जनता तोते के रुप में है तो सुशील के यहां आधुनिक प्रेम की मुलामियत और त्रासदी की कहानी इतिहास-भूगोल के मेटाफर में है।
पूरी लिखावट नीचे पढ़े-

हर लड़की का इतिहास होता है और हर लड़के का भूगोल...वैसे, हर लड़की को लडके के इतिहास में और हर लड़के को लड़की के भूगोल में रुचि होती है...इन भूगोल-इतिहास की चट्टानों पर प्रेम की दूब उग जाती है...इधर उधर छितर बितर।
  इतिहास और भूगोल की लड़ाई जहां खत्म होती है वहां दर्शन पैदा होता है....बाल-दर्शन।
.मैं इतिहास में पीछे था...वो भूगोल में आगे थी...दूब ने दोनों को पीछे छोड़ दिया...और हम फ्रायड की बांहों में झूल गए.

  धड़कते-धड़कते दिल दीवार हुआ जाता है...लिखते लिखते लिखना लाचार हुआ जाता है...। हम तो पड़े थे उसके भूगोल में, और वो अब इतिहास हुआ जाता है।
भूगोल में बैठ कर इतिहास लिखना कैसा होता होगा...और इतिहास में बैठ कर भूगोल के बारे में सोचना
  एक दिन इतिहास ने भूगोल को गोल कर दिया...भूगोल के गोल होते ही दोनों गार्डन के इडेन में पहुंच गए......
भूगोल के गोल होने से दूब सूख गई और फिर गोल गणित का जन्म हुआ जिससे फिर आगे चलकर लॉजिक, फिजिक्स और मेटाफिजिक्स की शुरुआत हुई।
बड़े शहर में हर बात छोटी होती है और छोटे शहर में हर बात बड़ी......वैसे बड़े शहर में हर बात भूगोल पर अटकती है....छोटे शहर में हर बात इतिहास पर।
  भूगोल बदलता है तो इतिहास बनता है और नया भूगोल पुराना इतिहास ज़रूर पूछता है लेकिन इतिहास को सिर्फ भूगोल में रुचि होती है. इतिहास भूगोल का इतिहास कभी नहीं पूछता। 
  इतिहास की नियति है भूगोल के पीछे भागना..उसे पकड़ना और फिर उसे इतिहास में बदल देना
  एक दिन इतिहास ने भूगोल के सामने अपने इतिहास के पन्ने पलटने शुरु किए. भूगोल ने ये देखकर अंगड़ाई ली और अपना जुगराफिया बदला. जुगराफिया बदलते ही इतिहास का मुंह खुला का खुला रह गया और फिर दोनों मिलकर दूब उगाने लगे.
. ...और फिर एक दिन भूगोल ने कहा इतिहास से कि मुझे तुम्हारा इतिहास पढ़ना है. इतिहास के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उसे अपने पुराने भूगोल की याद सताने लगी और वह सामने के भूगोल को ताकते हुए सोचने लगा काश कि दूब उगने लगे फिर से...
नया भूगोल मिलते ही इतिहास अपना पुराना इतिहास भूलना चाहता है लेकिन भूगोल को हमेशा इतिहास के पुराने इतिहास में रुचि होती है
  इतिहास हमेशा भूगोल भूगोल खेलना चाहता है और भूगोल हमेशा इतिहास इतिहास . इस खेल में नुकसान हमेशा दूब का होता है.
  भूगोल इतिहास की रगड़ में सबकुछ खत्म हो चुका था. बरसों बीत गए थे. झुर्रियों पड़े हाथों में हाथ थे. इतिहास भूगोल के इतिहास में गुम था और भूगोल इतिहास के भूगोल के इश्क में उलझा हुआ-सा था.


Saturday, March 23, 2013

सबसे ख़तरनाक -पाश

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

Saturday, March 9, 2013

मासाब चक्रवृद्धि ब्याज़ निकल गया स्कूलों का

पिछले दिनों मास्टरों को बिहार सरकार ने खूब पिटवाया. पांच हजार की सैलरी पर खट रहे इन मास्टरों ने जब अपने हक के लिए लड़ना शुरू किया तो उन्हें बदले में डंडा दिखाया जा रहा है. सवाल सिर्फ मास्टरों का ही नहीं है पूरे राज्य की स्कूली शिक्षा का है. उस स्कूली शिक्षा का जहां पढ़ने वाले बच्चे सिर्फ गरीब परिवार के ही होते हैं क्योंकि माना जाता है कि थोड़े से पैसे वाला आदमी भी अपने बच्चे को बरबाद करने के लिए सरकारी स्कूल में नहीं भेजता..ऐसे में दस बजिया सरकारी स्कूलों में पले-बढ़े बच्चों के भविष्य की चिंता तो होती ही है. एक जमाना था जब हाईस्कूल और मीडिल स्कूल में ऐसे मास्टर साब होते थे जिन्हें आसपास के गांवों में भी इज्जत से याद किया जाता था. न जाने कितने बिगड़ैल बच्चों को इन मास्टर साबों ने रास्ते पर ला दिया..लेकिन आज ऐसे मास्टरों की चर्चा विरले ही सुनाई देती है..
ऐसे ही एक मास्टर साब की आत्म-कथा को लिखा है सुशील झा ने..पढ़िये पूरी कहानी



मासाब चक्रवृद्धि ब्याज़ निकल गया स्कूलों का

हम 1968 में मैट्रिक किए थे. यहीं के स्कूल से. चक्रवृद्धि ब्याज़ निकालते निकालते दम निकल जाता था. मास्टर साब पीटते थे उ अलगे रहै. एक बार बाबूजी को बोले तो बाबू ने कहा उधर नहीं पिटोगे तो हम खेत में पीटेगें. देख लो. मासाब से ही पिटना मंजूर किए. पढ़ाई में अच्छे थे क्योंकि घर में पढ़ने का माहौल था. उस जमाने में फर्स्ट डिवीजन लाए थे. बारहवीं हुआ फिर भौतिकशास्त्र से ग्रैजुएट हुए. बाबूजी नहीं चाहते थे हम घर से दूर हों. बगल के ही स्कूल में टीचर हो गए.

पहली बार जब स्कूल में पहुंचे 1977 में तो स्कूल के नाम पर एक टूटली मडैया रहै. प्रखंड अधिकारी बहुत बढ़िया थे बोले-यहां जो रिसोर्स है उसी का इस्तेमाल करिए पढ़ाइए. हम समझे नहीं तो बोले आप मास्टर हैं. तीन साल मेहनत कीजिए बच्चा पर फिर बच्चा आपसे मेहनत करा ले जाएगा. ये मास्टर होने की सबसे पहली शर्त थी.

कच्ची मिट्टी का टीला था और ऊपर एक छप्पर. इलाक़ा आदिवासियों का. वो बांस से कमाल कमाल चीज़ बनाते थे. हम गांव में घूमे और जुगाड़ लगवाए. बंसवाड़ से बांस कटवा कर बेंच कुर्सी बनवाए. मास्टर के बैठने के लिए भी बांस का कुर्सी टेबल बना. उस इलाके में पहला स्कूल था जहां चेयर टेबल था बच्चा के लिए. कुर्सी पर बैठने के लालच से बच्चा सब स्कूल आता था. खूब पढ़ाए मन लगाकर. 11 महीने तक सब विषय पढ़ाए. आज भी याद है जब ट्रांसफर हुआ तो बच्चा सब रो रहा था.

दूसरा स्कूल में हम जाना नहीं चाहते थे. मुसलमानों के एरिया में था. हम ब्राह्मण हैं. उस टाइम गांव में अभी वाला माहौल नहीं था. बाबूजी बोले कर्म है करो. दो मास्टर थे. गए स्कूल बहुत गंदगी थी और गरीबी भी. गांव में इतनी गरीबी हम कभी नहीं देखे थे. फिर लगे पढ़ाने बच्चा सब को. पानी भी नहीं पीते थे. रहते बगल के गांव में. सुबह सुबह पांच कोस साइकिल चला कर पढ़ाने आते. फिर मन लग गया मुसलमानों में और ऐसा लगा कि 11 साल पढ़ाते रहे. वो स्कूल आंखों के आगे घूमता है.

फिर एक दिन हमसे गलती हो गई. गलती-बहुत्ते बड़का. गणित का सवाल हल नहीं कर पाया था एक बच्चा-मारे थप्पड. उ गिर गया और लगभग बेहोश हो गया. हम किसी तरह उठाए उसको. पानी वानी मारे मुंह पर तो होश आया. पूछे क्या हुआ खाना खाके नहीं आए थे. बच्चा बोला-नहीं सर घर में कुछ था नहीं खाने को. उस बच्चे पर विशेष ध्यान दिए. उस दिन के बाद शाम में रुक कर बच्चों को पढ़ाते. गणित, साइंस, हिंदी. तब दो ही टीचर मिल के मिडिल स्कूल चलाते थे हम लोग. वो बच्चा आज डॉक्टर है. एक दिन बोला, मासाब आप थप्पड़ नहीं मारते तो हम डॉक्टर नहीं होते. हमारा सीना चौड़ा हो गया था.

बहुत कुछ सीखे वहां. मुसलमानों के स्कूल में सब किताब उर्दू में होता था. साइंस का भी गणित का भी और सोशल साइंस का भी. हम उर्दू सीखे ताकि बच्चों को पढ़ा सकें. बहुत कठिन नहीं है. पूरा सीख गए थे. भाषा से लगाव हुआ और इसी चक्कर में बाद में एमए किए मैथिली भाषा से विद्यापति पर. पीएचडी करने का मन था लेकिन उम्र हो गई थी और बच्चों से दिल लग गया था. अधिकारी ठीक बोले थे. तीन साल मेहनत करो फिर बच्चा सब मेहनत कराएगा.

फिर कई बदलियां हुई लेकिन वैसा दिल कहीं और लगा नहीं. नब्बे के दशक में कोर्स बदला किताबें बदली. हालात खराब हुए. चरवाहा स्कूल में भी पढ़ाने गए. बहुत कोशिश किए लेकिन बच्चा सब नहीं माना. काला अक्षर भैंस बराबर और भैंस के आगे बीन बजाने वाली कहावत एकदम सही कही जाती है. राजनीति भी होने लगी. खेतीबाड़ी बाबूजी बहुत छोड़ गए थे. गुजारे की दिक्कत नहीं थी लेकिन रोग लगा था पढ़ाने का.

फिर हाई स्कूल में नियुक्ति हुई तब तक मध्यान्ह भोजन आ चुका था. शिक्षक भी आए नई भर्तियां हुईं. पढ़ाई कम दूसरा काम अधिक होने लगा. हमारा मन यहीं से उचटना शुरु हुआ. बच्चा बोरा में कॉपी किताब भरकर लाता और जाते समय कॉपी किताब हाथ में बोरे में अनाज. अनाज नापने लगे थे हम लोग.
हेडमास्टर को पता था हमको ये काम पसंद नहीं है. हमको प्रशासनिक काम दे दिया गया. टीचर लोग का तनख्वाह बनाइए. ब्लॉक में स्कूल से जुडा काम कीजिए. सीनियर टीचर थे तो कोई कुछ बोलता भी नहीं था. कभी कभी गणित पढ़ाते थे और बच्चों को बताते चक्रवृद्धि ब्याज़ जो अब सिलेबस में था ही नहीं.

सन 2000 के बाद एकदम नहीं पढाए. हम सिर्फ दरमाहा बनाने स्कूल जाते थे. अनाज के नाम पर धांधली होने लगी थी और इसमें हम कुछ कर नहीं सकते थे. हमारा काम कम हो गया था. सिर्फ वेतन के लिए जाने लगे और दिन गिनने लगे थे कि जल्दी रिटायर हो जाएं. ऐसे ऐसे मास्टर आए कि जिनको नाम भी लिखना नहीं आता था. इ मास्टर सब को मुखिया भी आकर गालियां देता. हमसे शिकायत करता. हम जानते थे मुखिया गरियाता है क्योंकि पुराने मुखिया के कहने पर मास्टरों की बहाली हुई थी. हम क्या कहते. हमको पता था अब इधर से कोई बच्चा डॉक्टर इंजीनियर नहीं बनेगा.

रिटायर हुए तो चैन मिला. रोज रोज के आलू परवल गिनने से मुक्ति मिली. हमारे टाइम में जब इंस्पेक्टर आते थे तो महीने भर पहले तारीख मिलती थी. और जब उस तारीख पर आते इंस्पेक्टर तो तैयारियों की धज्जियां उड़ा जाते. बागवानी एक महीने पुरानी दिखती है. पढ़ाते क्या हैं आप लोग. क्लास रुम में बैठ जाते इंस्पेक्टर और बच्चों से सवाल पूछते. आखिरी दिनों में देखे कि हर हफ्ते इंस्पेक्टर आते हैं. सौ रुपया लेकर जाते हैं 40 बच्चे स्कूल में हैं तो 80 के रजिस्टर पर हस्ताक्षर करते हैं ताकि मध्यान्ह भोजन का राशन अधिक मिले.
अब तो ये आलम है कि ब्लाक लेबल पर घूस देकर मध्यान्ह भोजन का प्रभार लेते हैं मास्टर. ऐसे में कोई क्या पढ़ाएगा और कोई क्या पढ़ेगा. हम खुश हैं ऐसे में नहीं काम करना पड़ा. रिटायर हैं. अभी भी आसपास के गांव में अपना पढ़ाया हुआ दो चार बच्चा मिलता है तो बोलता है मासाब चक्रवृद्धि ब्याज़ निकल गया स्कूलों का.

सुशील झा (बीबीसी हिन्दी)

Friday, March 1, 2013

गांव शहर और शहर गांव हो रहा हैः सुशील झा

हमारे जैसे कस्बाई-मन को लुभाने वाली कविता...पढ़ के लगे कि अरे, ये तो हमारे गांव-शहर की कहानी है- कविता लिखी है सुशील झा ने..फिलहाल जमशेदपुर से निकल  बीबीसी दिल्ली में नौकरी  कर रहे हैं।


गांव शहर और शहर गांव हो रहा है
गांव में फ्लैट और शहर में हेरिटेज होम्स बिक रहा है
गांव कोका कोला और शहर आर्गेनिक हो रहा है
छठ शहर आ रहा है
कड़वा चौथ गांव जा रहा है
गरीब शहर भाग रहा है
एलीट गांव दौड़ रहा है
गांव शहर और शहर गांव हुआ जा रहा है
इन दोनों के बीच डोलते कुछ लोग हैं
जिनका मन गांव शहर शरीर और आत्मा
कहीं की नहीं है
वो इंटरनेट, गूगल और पासपोर्ट के ज़रिए
अपनी जड़ों को तलाशते हैं
बिन मिट्टी के सूख गई जड़ों को देखकर
फिर वापस लौट जाते हैं
एक नई जगह जड़ें जमाने
कौन चाहता है जड़ों के बिना जीना
लेकिन
जड़ों को जमने में
फलने में फूलने में
वक्त तो लगता ही है.

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...