Saturday, September 28, 2013

Zindagi via Cinema part 1

सिंगरौली की उस शाम हम सभी जंगल से लौटे ही थे। नियम सा है कि गांव से लौट सबलोग अपने-अपने इस बक्सेनुमा लैपटॉप में घुस सा जाते हैं। दरअसल, सिंगरौली जैसे जगह में बैठे-बैठे ही हम बाहरी दुनिया वालों से खुद को आसानी से जोड़ने के मोह से ग्रस्त होते हैं। उस दिन बैठे-बैठे मैंने अपनी जिन्दगी के पन्ने उलटने शुरू किए वाया सिनेमा। सिनेमा और मेरी जिन्दगी इतनी जुड़ी होगी पहले से पता तो न था।
जिन्दगी वाया सिनेमा कुछ किश्तों में---- (पहली किश्त)

 
चवन्नी चैप में हिन्दी टाकीज पढ़ रहा था। इधर मैं ओल्ड पोस्ट पर क्लिक करता  जा रहा था उधर बचपन से लेकर अबतक सिनेमा देखी अनुभव का रील भी घूमता चलता रहा। पहली बार किसी हॉल में सिनेमा कहां देखा-सोचता हूं तो फ्लैश बैक में  दलसिंहसराय (समस्तीपुर का एक कस्बा) का वो हॉल चला आता है शायद मोहरा फिल्म रही होगी लेकिन  रजा मुराद जैसी कोई भारी आवाज भी साथ में सुनाई देती है। चाह कर भी बचपन की वो पहली याद किसी हिरोईन के डांस और उस भारी आवाज से आगे नहीं जा पाती। माँ की एक दोस्त थीं- हमलोग दोस्तीनी चाची बुलाते थे-उन्हीं के ईलाज के लिए दलसिंहसराय गए थे। तभी आज भी उस याद में माँ के हाथों को पकड़ सिनेमाहॉल जाने का फोटो बचा रह गया है और सिनेमाहॉल जाने का उत्साह भी।
    इसके बाद काफी अरसा सिनेमाहॉल दिखा नहीं। गांव में टीवी इक्का-दुक्का घरों में ही लग पाया था। हर रविवार डीडी पर शाम चार बजे। हफ्ते भर हम इंतजार करते रहते। साढ़े तीन बजे तक टीवी वाले के घर पर हम दोस्तों की टोली पहुंचनी शुरू हो जाती। आधे घंटे पहले आने की हिदायत  टीवी मालिक की तरफ से विशेष रुप से दी गयी थी। वजह, उन आधे घंटों में हमें बैठने के लिए जमीन पर अपनी सीट तलाशनी होती और साथ ही, टीवी मालिक-दर्शकों को कुत्ते-बिल्ली-खिखिर और न जाने किन-किन जानवरों की आवाज निकाल मनोरंजन करना पड़ता। गांव में बिजली नहीं है। हर शुक्रवार को टीवी मालिक साईकिल के करियर में बैटरी बांध बजार से चार्ज करा लाते। शुक्रवार से रविवार तक फिल्म देखने का साप्ताहिक कार्यक्रम होता-बैटरी इतने दिनों के लिए चार्ज होते रहते। तो बैटरी वाले उस टीवी-सिनेमाई युग में हर ब्रेक के बीच टीवी को ऑफ कर दिया जाता- बैटरी की खपत कम करने वास्ते। हर ब्रेक के बाद टीवी तभी ऑन होता जब हममें से कोई (जिसे टीवी मालिक चुनता) उस कुत्ते-बिल्ली-खिखिर की आवाज नहीं निकाल लेता। अगर कोई आवाज न निकालने को अड़ जाता तो टीवी भी ऑन नहीं होता। ऐसे समय हमलोगों की खुशामद पर ही वो दोस्त आवाज निकालने को राजी होता और फिर सिनेमा आगे बढ़ायी जाती। जाड़े के दिनों में शाम छह बजे तक काफी अँधेरा हो जाता- आज भी याद है कोई ऐसी रविवार वाली रात नहीं गुजरती जब हमें मार न पड़ी हो।
   शनिवार को दोपहर दो बजे से नेपाली चैनल पर हिन्दी फिल्म आती थी। गांव में एक ही टीवी मालिक था जिसके टीवी पर नेपाली फिल्में साफ-साफ दिखती थीं लेकिन हम दोस्त जब भरी दुपहरी में फिल्म देखने पहुंचते तो टीवी मालिक का शर्त होता कि सिर्फ मुझे ही अंदर आने दिया जाएगा। मैं अड़ जाता। जाउंगा तो दोस्तों के साथ ही। बात नहीं बनती। फिर हम दोस्त टीवी वाले कमरे में की-होल से झांका करते, कभी-कभी खिड़की के दरिजों से भी। बारी-बारी हम सब फिल्म को देखते और कहानी कहते जाते। फिर बाद में हम दोस्तों ने एक रास्ता खोज निकाला। मेरे बांकि दोस्त छिप जाते, मैं टीवी मालिक को अंदर आने देने को कहता और दरवाजा खुलते ही मुझसे पहले मेरे सारे दोस्त अंदर। मैं अनजान बना रहता। गांव में होने की गनीमत थी कि टीवी मालिक मेरे दोस्तों को अंदर से बाहर नहीं निकाल पाता। इतनी मशक्कत बाद भी सिनेमा से कभी प्यार कम न हुआ। इसी दौरान हिरो, राजा बाबू, घातक, मिथून, गोविंदा, सन्नी देओल, अभिताभ सबसे मुलाकात हुई। काफी दिनों तक हिरोईनों के मामले में कन्फयूज ही रहा। माधुरी, जूही, काजोल सबके चेहरे एक से ही लगते रहे। ये वे दिन थे जब दिव्या भारती की मौत को लेकर तरह-तरह के चर्चे हम दोस्त किया करते। आपस में झगड़ते तो मिथून की ईस्टाईल में धिसूम-धुड़ूम वाली ध्वनि मुंह से खुद ब खुद निकलते। अक्षय और सन्नी देओल में कौन ताकतवर है के सवाल से जूझते रहते। हमारी सिनेमाई समझ खुद की विकसित की हुई समझ थी- बिना किसी फिल्मी पत्रिकाओं और अखबारों के। हम किस सीन पर घंटों चर्चा करते- कोई कहता हिरो-हिरोईन के बीच में शीशा लगा होता है, एक ही गाने में इतने कपड़े कैसे बदल जाते हैं-जैसे मासूम सवालों में उलझना अच्छा लगता था।
(जारी..)

पड़ोसी-1





कुछ दिन से पड़ोसी के
घर में सन्नाटा है,
ना रेडियो चलता है,
ना रात को आँगन में
उड़ते हुए बर्तन हैं।


उस घर का पला कुत्ता--
खाने के लिए दिन भर,
आ जाता है मेरे घर
फिर रात उसी घर की
दहलीज़ पे सर रख कर
सो जाया करता है !
-गुलजार (रात पश्मीने की)

Friday, September 13, 2013

फर्स्टेट सिंगरौली डायरी


इस कस्बे में रहते-रहते बोर हो जाता हूं

जंगल-गांव और लोगों के बीच से लौटते ही

दुबक जाता हूं इस बक्सेनुमा लैपटॉप में

मेल, फेसबुक और न जाने कौन-कौन सी साइटें खोल बार-बार रिफ्रेश करता रहता हूं- नेट भी स्लो चलती है काफी
बाहर

बाहर जाने को क्या कहते हो।
बाहर का अवसाद इस बंद ऑफिसनुमा घर से कम है क्या

कोई चाय दुकान भी नहीं है वैसा

लेकिन उस दुकान पर बैठ कर ही क्या

कोई दोस्त भी तो नहीं कि घंटों बैठ कर लूं उनसे बातें-बहस चलती रहे बेमतलब की ही सही

किसी रोज पैदल ही जब नापने निकलता हूं इस कस्बे को

वापसी में जेब में अवसाद भी रखा चला आता है।

फिर वो अवसाद रात के खाने को कसैला बनाने तक बना रहता है स्वाद में।

दोस्त-यार फोन पर बताते हैं- तु अच्छा काम कर रहा है। जमीनी काम करने के मौके कहां मिलते हैं सबको। लगा रहा।

मैं चिल्ला-चिल्ला कर घोषित कर देना चाहता हूं- नहीं कर पा रहा मैं कुछ भी।

कल ही जब डीएम ने गांव वालों को गिनाए थे कंपनी और मुआवजा से विकास के फायदे।

मैं जोर-जोर से चिल्ला कर कहना चाहता था उससे- बताओ तुम्हारे इस लोकतंत्र के सबसे पहले ठेकेदार पंडित नेहरु ने जो दिखाए थे सपने स्वीजरलैंड के, उसका क्या हुआ
शिक्षा, अस्पताल, नौकरी और एक बेहतर जिन्दगी का सपना दिखा कबतक लोगों को भूलाते रहोगे।

उधर इस राज्य का मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी आजकल घोषित करने में लगा है- सिंगरौली को लंदन।

मैं उसके गिरेबान को पकड़ रसीद देना चाहता हूं एक झन्नाटेदार थप्पड़।
क्यों बे, चल बकवास बंद कर।

अरे हां, इसे कविता न समझ लेना ।
ये बस फर्स्टेशन है। सिंगरौली में होने का फर्स्टेशन ।
पेंटर भाई लोग रेखाओं में अभिव्यक्त कर पाते हैं इस अवसाद को तो वही एब्सट्रैक्ट-सा हो जाता है।
मैंने शब्दों को आड़े-तिरछे कर दिया है बस।

Thursday, August 8, 2013

सफर जारी है...

महान जंगल के किसी पहाड़ी चोटी की चढ़ाई के दौरान

पीठ पर लैपटॉप बैग लादे। बैग में लैपटॉप के अलावा एकाध जोड़ी जींस-कुर्ता। ब्रश, कुछ कागज के पन्ने, एक या दो किताब। इसी तरह की बेहद जरुरी सामान। और कंधे पर झूलता लाल रंग का बैग।
पिछले कुछ महीनों में जो भी दोस्त मिले हैं। ऐसे ही देखा है मुझे-हाफ पैंट से थोड़ी लम्बी पैंट पहने। जेब में चार हजार में ही अच्छी तस्वीर उतारने वाला नोकिया फोन।  कभी भोपाल। कभी जबलपुर। कभी सतना-रीवा-सिंगरौली। या फिर बनारस। और दिल्ली।
ट्रेन के एसी बोगियों से लेकर जनरल डिब्बों तक का सफर। कभी-कभी तो टिकट वेटिंग जाने पर बोगी के फर्श पर ही अखबार बिछा सो जाता हूं। सबसे ज्यादा मजा स्लीपर बोगी के कम भीड़ वाले डब्बे में। खिड़की के पास। हवा आ रही है मैं कान में ईयरफोन लगा लय मिला रहा हूं। सारी बोगी से बिल्कूल बेपरवाह- लाल बैंड से लेकर हबीब जालीब, कैलाश खैर तक।
कटनी रेलवे स्टेशन के पास

भोपाल टू जबलपुर रास्ते की तस्वीर

सतना से बनारस जाते हुए पसंदीदा जगह पर बैठ कर



भैराघाट में
निर्मल वर्मा के एक ट्रैवलॉग से पता चला कि यूरोप में हिच-हाइकिंग करके स्टूडेंट लाइफ में घूमा जाता है। एक दिलचस्प और सस्ता तरीका यात्रा करने का। "सड़क के किनारे खड़े होकर सामने गुजरती हुई मोटरों, लारियों या ट्रकों को रोकने के लिए हाथ हिलाते हैं, और घंटों इसी तरह खड़े रहते हैं, जब तक कोई ड्राइवर दया करके उन्हें भीतर नहीं बुला लेता। इसी तरह लिफ्ट लेते हुए वे रास्ते तय करते रहते हैं"।
निर्मल लिखते हैं- "अक्सर लड़कियों के लिए 'लिफ्ट' लेना अधिक आसान होता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लड़कियां अपने पुरुष-साथियों को पीछे छिपा लेती हैं और जब उन्हें 'लिफ्ट' देने के लिए कोई कार रुक जाती है, तो वे इशारे से इन्हें बुला लेती हैं। ड्राइवर बेचारे को तब न केवल उन्हें बल्कि उनके प्रेमियों को भी अपनी कार में ढोना पड़ता है"।
इंडियन साधुओं के धर्म पक्ष को छोड़ दें तो उनकी  फक्कड़ी खूब ललचाती है। फिलहाल अपने साथ काम को लिए घूम रहा हूं। लेकिन अगला प्रोजेक्ट बिना मतलब-बेमकसद देश घूमने का रक्खा है। इन्हीं साधुओं के साथ हो लूंगा कुछ दिन। बिना जाने-समझे-सोचे। कभी इस स्टेशन। कभी उस बस। कभी इस देस-कभी उस देस।
चल रे मांझी
आज फिर कुछ घंटे बाद निकल जाउंगा..भोपाल वाया जबलपुर। सफर जारी है.....

Tuesday, July 30, 2013

पांच रुपये का नोटः टुकड़े यादों के


टहलते-टहलते कस्बा चला गया। रविश ने एक पोस्ट डाला है वहां- पनटकिया नाम से। पनटकिया शब्द दिखते ही रिवाइंड मोड में चला गया हूं। गांव में उस समय मोबाईल छप्पर पर स्पेशल मोबाईल एंटिना लगाने के बाद ही काम करते थे। बीएसएनएल का लैंड लाइन सेवा गांवों तक पहुंची ही थी। गांवों में थोड़े पढ़ लिख गए बीए पास भैया लोग बेकारी के दौर से गुजरते हुए मुजफ्फरपुर-पटना से कोर्स खत्म कर लौट गए थे अपने-अपने घर। रेलवे ड्राईवर से लेकर सिपाही की भर्ती परीक्षा तक मामला नहीं जम पाया था। ठीक इसी समय दिल्ली-बंबई-कलकत्ता गए गांव के चाचा-मोसा-मामा टाइप लोग मोबाईल खरीद चुके थे अपने-अपने शहर में। तभी गांव वाले भैया लोग को एसटीडी बूथ के बिजनेस का संजीवनी मिल पाया था। फोन करने के पैसे तो लगते ही थे....साथ ही, फोन सुनाने के अलग से।

दिल्ली-बंबई-कलकत्ता से चाचा-मामा फोन करते। फिर दूरी के हिसाब से आधे से एक घंटे का समय देना होता। इस बीच एसटीडी बूथ वाला  साईकिल खरखराते हुए जल्दी से पहुंचता- फोन की खबर सुन चाची-मामी टाइप लोग जल्दी से तैयारी शुरू करती। साड़ी बदलना-स्नो पाउडर लगाना और सज-धज कर एसटीडी बूथ पर। कई बार तो दिन में तीन-तीन चक्कर लगाने पड़ते। हर बार एसटीडी वाले को पांच रुपये देना होता।  गांव में भी एसटीडी बूथ वाले भैया हर दस मिनट पर साईकिल दौड़ाते नजर आते। दोस्त-यार उन्हें देखते ही पीछे से आवाज मारते-पनटकिया कहां चले...एसटीडी बूथ वालों का नाम ही पनटकिया हो गया था।

कांग्रेस वाले रसीद साब ने पांच रुपये की औकात गलत नहीं आंकी है। इस पांच रुपये के पास लोगों के नाम तक बदल देने की हैसियत रही है फिर ये भरपेट खाना क्या बला है।
रसीद साब को पांच रुपये का औकात पता है। रसीद साब को पनटकिया बयान के बाद बहुत गाली खानी पड़ी। मन करता है फेसबुक पर उनके समर्थन में एक एलान दे मारुं- कि हां, पांच रुपये का औकात है। एक बार इस अदने से आदमी ने भी पांच रुपये की औकात नहीं समझी थी। आजतक उस पनटकिया नोट को याद कर अफसोस करता रहता हूं।

नब्बे के दशक का अंतिम साल रहा होगा शायद-एक जनवरी का दिन। मोहल्ले में मछली बेचने वाला आया था। साल का पहला दिन, मछली और बच्चा मन। दौड़ कर घर को बुला लाया था। घर के पास पैसे नहीं । घर ने  बहुत समझाया-बुझाया लेकिन बच्चा मन मानने को तैयार नहीं। घर के आंचल में शायद बंधा था पांच का नोट। मुड़ा-सा वो पांच का नोट बहुत बेमनी-आशा से घर ने मेरे हाथ में रख दिए थे। लेकिन बच्चा मन जिद्दी था बहुत। नोट के कितने टुकड़े किए आज याद भी नहीं। घर आँसूओं से भींगा होगा जरुर- याद नहीं। आज भी लगता है उस पांच के नोट का हर टुकड़ा कही दिल के एकदम भीतर वाले कोने में गिरा पड़ा है। उन टुकड़ों से लग आज भी आँख का कोना भींग जाता है।

इसलिए राशीद साब को गंभीरता से लीजिए- पांच रुपये के नोट को भी। वैसे इस पांच रुपये को लेकर जो हल्ला कर रहे लोग हैं, उनमें ज्यादातर के लिए पांच सौ रुपये के नोट भी पांच रुपये के नाप का ही आता हो शायद।

फिलहाल पनटकिया गाने का लिंक दे रहा हूं- सुनिये


Monday, July 29, 2013

अलहदा-सा कार्टूनिस्ट-कम-इंसान

अपने पवन भैया
 
 " ऑफिस में हमें सिटी रिपोर्टिंग में बैठाया गया था, वहीं उनकी सीट भी थी। आज ये मानता हूं कि उनसे दुआ-सलाम, नमस्ते-प्रणाम से आगे बैठ कर बात करने की हिम्मत नहीं हुई। वजह, साफ था- बचपन के उस कोने से ही उनके लिए मन में एक छवि थी। मैं उस छवि को तोड़ना नहीं चाहता था। कुछ छवियां बड़ी होती हैं- जिसे दूर से निहारते प्रशंसक की तरह ही देखने में सुख है। फोटो भी एक खिंची है हमारी साथ में। एक बार विभुराज भैया आए थे उनसे मिलने मेरे ऑफिस। बड़ा प्राउड फील हुआ था जब ऑफिस के कैन्टीन में दोनों को मिलवाया था- एक प्रशंसक को इससे बड़ा सुख और क्या चाहिए। अपन तो इतनी अवकात वाला भी नहीं कि उनके बारे में कुछ लिख सके "
हिन्दूस्तान अखबार कबसे पढ़ना शुरु किया है कुछ याद नहीं। और कब से उसके पहले पन्ने से लेकर संपादकी के बगल वाले पन्ने के कोने तक बनाए गए कार्टून को देख-देख हंसना और समझना शुरू किया है ये भी याद नहीं।

उस कार्टून बनाने वाले को पहली बार डीडी न्यूज के इंटरव्यू में देखे थे। वहीं से पता चला कि तेरह साल की उमर में घर से भाग दिल्ली पहुंच गया था वो आदमी- जिद्द कार्टून बनाने की, कि कैसे बिना किसी गॉडफादर के दिल्ली में उस उमर में घूमते रहे- सड़कों पर रात गुजारी-लेकिन कार्टून बनाने की जिद्द ज्यों का त्यों।

कहीं से शायद फॉर्मल ट्रेनिंग जैसा लिया हो पता नहीं लेकिन कार्टून अमरीका के किसी विश्वविद्यालय के सिलेबस में भी मिल जाएगा आपको।

बिहार का शायद ही कोई दरवाजा हो जहां उनके कार्टून को पढ़ कर लोग हंसे न हो-गुदगुदाए न हों या कि तारीफ में दो शब्द कहा न हो।
 
आईआईएमसी के दौरान मैं भी उनके फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में टपकने में कामयाब रहा। एक बार डरते-डरते हैला किया था...तुरंत रिप्लाई में हैलो।
उनको बताया अब आपके साथ काम करने का मौका मिलेगा-हिन्दुस्तान में। कुछ बातचीत हुई लगा नहीं कि किसी से पहली बार बात हो रही है-एकदम सहजता।
 
हिन्दुस्तान के ऑफिस में पहली बार जिनको चेहरे से पहचान पाया था वही थे। जाकर हैलो किया। नादान माफिक ये भी बोल आया- आपसे फेसबुक पर बात हुई थी (जबकि उनके फ्रेंड लिस्ट से जियादा उनके फॉलोअर्स हैं-हजारों-हजार लाइक्स में एक लाइक अविनाश कुमार चंचल का भी)।
लेकिन लगा जैसे वही सहजता फिर फेसबुक के चैट बॉक्स से उतर सामने टपक रही हो।
एक मात्र पवन भैया के साथ वाली फोटु

 
ऑफिस में हमें सिटी रिपोर्टिंग में बैठाया गया था, वहीं उनकी सीट भी थी। आज ये मानता हूं कि उनसे दुआ-सलाम,नमस्ते-प्रणाम से आगे बैठ कर बात करने की हिम्मत नहीं हुई। वजह, साफ था- बचपन के उस कोने से ही उनके लिए मन में एक छवि थी। मैं उस छवि को तोड़ना नहीं चाहता था। कुछ छवियां बड़ी होती हैं- जिसे दूर से निहारते प्रशंसक की तरह ही देखने में सुख है। फोटो भी एक खिंची है हमारी साथ में। एक बार विभुराज भैया आए थे उनसे मिलने मेरे ऑफिस। बड़ा प्राउड फील हुआ था जब ऑफिस के कैन्टीन में दोनों को मिलवाया था- एक प्रशंसक को इससे बड़ा सुख और क्या चाहिए। अपन तो इतनी अवकात वाला भी नहीं कि उनके बारे में कुछ लिख सके।
 
उनके कार्टून रोज आँखों से गुजरते हैं- अक्सर पूरा पेज खोलकर उनके बनाए कार्टून देखता रहता हूं।
आज बहुत दिनों के बाद उनसे फेसबुक पर ही बात हुई। लगा ही नहीं कि अरसे बाद बात हो रही है। फिर वही सहजता, वही सौन्दर्य। लगा कोई छोटे भाई से हालचाल ले रहा है। कैसे हो, कैसा चल रहा है से लेकर मिलने तक की बातें। एक जिंदा समय में ही मिथक बन चुके हस्ती का इतना पूछ भर लेना- की कीमत यहां घिसिर-पिटर करके नहीं आंक सकता- शब्दों में।
आज जब थोड़ी-सी लोकप्रियता, थोड़ा-सा बढ़ा हुआ लाइक आपको सेलिब्रेटी-सा व्यवहार करवाने में सफल हो जाता है, ठीक उसी समय में पटना के एक अखबार में चुपचाप अपना कार्टून बना रहे इस कार्टूनिस्ट की सहजता की ऊंचाई का ग्राफ भी  फेसबुक और लाखों अखबारी पाठकों के तारीफ के साथ ही उपर बढ़ता चला जाता है।
उनका नाम लेने की जरुरत नहीं लेकिन फिर भी उन्हें यहां मेंशन किए देता हूं
- Pawan Toon
  उनका कार्टून यहां भी देंखे-पवन कार्टून

एक मुड़ा सा ख्वाब का टूटनाः सिंगरौली डायरी



शाम में छत पर खड़ा था। एक तरफ पहाड़ एकदम जिंदा-सा तो दूसरी तरफ कोयला खदानों के लिए खोद कर मिट्टी बना दिए गए ओवरबर्डन के पहाड़। कुछ दूरी से रेल की छक..छक..छुक..छुक की आती आवाज। बड़े-बड़े खुले डिब्बों में ढोए जा रहे पहाड़-एकदम काले से।
हमारे घर के आस-पास और पीछे का काफी हिस्सा खाली मैदान-सा खेत पड़ा है जो बिल्कूल पहाड़ से सटकर ही खत्म होता है। मैं छत पर खड़ा-खड़ा फ्लैशबैक में चला जाता हूं।
सबसे पहली तस्वीर उस दिन जब पहली बार पहाड़ को देखा था। एक वैद्य जी से दिखाने के लिए जम्मूई जाने की कड़ी में लखीसराय के पास दिखा था। घर ने बताया- मरा हुआ पहाड़ है, जिंदा पहाड़ में जीते-जागते पेड़-पौधे औऱ पानी निकलता है। वहीं से जिंदा पहाड़ देखने की ललक रह गई। मन हमेशा उन जिंदा पहाड़ों के बीच पहुंच जाता। हिन्दी फिल्मों में पहाड़,नदी के दिखाए इमेज ही कल्पना में फोटो बनकर आते रहते। मन हमेशा पहाड़ों के बीच होने को करता रहता।
बारहवीं के बाद रांची गया था। संत जेवियर कॉलेज में एडमिशन लेने वास्ते। रास्ते में पहली बार  जिंदा पहाड़ दिखा था- एकदम खालिस जिंदा- पेड़-जंगल-जल से भरा-पूरा। हुआ कि यहीं उतर जाएं बस से। रह जाएं इसी किसी झोपड़ी में अपना बिस्तर डाल। मन हमेशा पहाड़ों को लेकर रोमांटिक होता रहा शायद यही वजह थी कि आज भी जेएनयू में सबसे अच्छी जगह पीएसआर ही लगती है मुझे। लेकिन जेएनयू वाला पहाड़ मरा हुआ है-एकदम मुर्दा-सा सन्नाटा वाला।
काफी दिनों तक पहाड़ का प्रेम चलता रहा। हाल तक जब अखबारी नौकरी में था पटना में। मन आज-कल होने लगा था-कि चलूं छोड़ नौकरी किसी पहाड़ के गांव में आशियाना टिका लूं। खैर,  नौकरी आपको मारती है-जान से नहीं, तड़पा-तड़पा के। मैं भी तड़पता रहता आया हूं।
अचानक ही काम मिला जंगल-जमीन बचाने के लिए लोगों के संघर्ष में साथ देना। बिल्कूल पहाड़ और जंगल के बीच रहने वालों के साथ काम करने का ऑफर। -ना- करने का सवाल कहां था। चला आया।
जिस दिन बनारस से सिंगरौली के लिए इंटरसिटी पर बैठा था- उत्साह मन के इस कोने से उस कोने तक डोलता रहा। रास्ते में बस पहाड़ ही पहाड़, जंगल ही जंगल। लो ये पहाड़, ये जंगल, ये नदी। लगा इतना कुछ कैसे समेट पाउंगा।
लेकिन ये सब तस्वीर का आधा फटा-मुड़ा भाग ही था। पहाड़ की जिन्दगी इतनी आसान नहीं थी- बिल्कूल नहीं। शुरुआती दिनों में पहाड़-जंगल घूमने जाता तो अच्छा लगता। अब जब वहां जीने जाता हूं तो तस्वीर का आधा फटा-मुड़ा भाग भी खुलने लगा है।
अव्वल तो जंगल में रहने की कठिनाईयां। दूसरे इन जंगलों-पहाड़ों को खोद-खोद कर कोयला,बॉक्साइट निकालने वाली लोकतांत्रिक सरकार-कारपोरेटी कंपनियां। अक्सर जंगलों के ठीक बीच में, पहाड़ों के उपर ऐसे गांवों में होता हूं, जहां फोन का नेटवर्क नहीं। अस्पताल, स्कूल जैसी सुविधाओं के लिए कोई स्पेस नहीं। ये लोग इस लोकतांत्रिक देश का हिस्सा तभी हो पाते हैं जब सरकारों को पता चलता है कि इनकी जमीन के नीचे अपार खनिज संपदा भरी पड़ी है। अचानक से आनन-फानन में विकास रुपी पहिये को इनके गांवों में धकेल दिया जाता है। यहां की कठिन जिंदगी हम मैदान वालों के लिए रोमांटिक लाइफ होता आया है। पिकनिक और सैर-सपाटे के लिए अक्सर हम पहाड़ों की तरफ दौड़ते रहे हैं लेकिन सच्चाई है कि पहाड़ी जीवन सिर्फ पिकनिक की रंगनियों से नहीं बनती। यहां के लोग हर रोज अपने जीने के लिए संघर्ष करते हैं। कभी जंगली जानवरों से तो कभी सरकारी अमलों से।
कभी-कभी लगता है जिंदगी में फिर से जगा हूं। बचपन के ख्वाब अब परेशां नहीं करते। जिंदगी की तल्ख सच्चाईयां भी झकझोर नहीं पाती। एक मैदान लड़का पहाड़ी लोगों की कोमलता को देख-देख और कठोर और रुड होता जा रहा है। वजह की तलाश अभी करने का समय नहीं।
फिलहाल कुछ अस्पष्ट सा खाका है कुछ दिमाग में और हां, नौकरी हर जगह जानलेवा ईलाज की तरह ही होती है।
खामोशःःःः

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...