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बच्चों के बीच पवन |
रविवार को पवन जेएनयू में थे। जेएनयू के कंस्ट्रक्शन वर्कर के बच्चों को कार्टून सीखाते मिले। 13 साल की उम्र में कार्टून बनाने के लिए घर से भागने वाले पवन को कार्टून बनाना और बच्चों को कार्टून सीखाना- दो ही काम सबसे ज्यादा पसंद है।
एक तरफ कार्टून को उसके इलिटनेस से नीचे लाकर आम लोगों में लोकप्रिय बनाना और दूसरी तरफ इस कला को सुविधाविहिन बच्चों औऱ हाथों तक पहुंचाना- दोनों ही स्तर पर पवन लगातार काम कर रहे हैं।
कार्टून और पेंटिंग में कई बड़े नाम हुए हैं लेकिन वहां आमलोक का अभाव हमेशा से दिखा है। इसलिए जब हुसैन अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि कैसे उन्होंने अपने पुराने स्कूल के बच्चों में अपनी पेंटिंग यूं ही बांट दी तो प्रभावित होता हूं।
pen & pencil program के सफर में कई अच्छे अनुभव भी हैं पवन के पास। एक बार बिहटा में चार सौ बच्चों को कार्टून बनाना सीखाया, उनमें दस बच्चों के काम को सेलेक्ट कर पहुंच गए बिहार सरकार के किसी विभाग के पास। बाद में सरकार के कई विभाग ने उन बच्चों के काम को ग्रीटिंग कार्ड के रुप में प्रकाशित किया। बाद में बकायदा एक समारोह आयोजित कर बच्चों को पैसे दिये गए और उन्हें सम्मानित भी किया गया। इनमें कई बच्चे ऐसे थे जो तीसेक किलोमीटर दूर होने के बावजूद पटना नहीं आए थे कभी।
पवन की संवेदनाएँ ही हैं जो कार्टून सीखने वाले बच्चों के लिए किसी मंत्री के पैसे से रसगुल्ले खरीदने के मिठास को फील कर सकती हैं। संवेदनशील होना किसी भी कलाकार की शायद पहली शर्त हो लेकिन उस संवेदनशीलता को कागज-कलम-पेंटिग-कार्टून से बाहर भी फील करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। पवन यही कर रहे हैं।
एक उम्मीद |