Friday, December 5, 2014

भोपाल गैस त्रासदी की अंतहीन कहानी और ढ़ेरों मुस्कान



चिंगारी ट्रस्ट भोपाल गैस पीड़ितों के बीच काम करती है। 3 दिसंबर 2014 को भोपाल गैस त्रासदी को गुजरे 30 साल हो गए। एक ऐसी त्रासदी जिसने तत्काल हजारों लोगों की जान ले ली, लाखों लोगों को विकलांग कर गया, भोपाल शहर को बर्बाद कर दिया, लेकिन ये सिलसिला ऐसे ही नहीं थमा। 





 आज भी भोपाल में खतरनाक विकिरण से बच्चे शारीरीक-मानसिक रुप से विकलांग पैदा हो रहे हैं। चिंगारी ट्रस्ट में इन्हीं बच्चों की देखभाल की जाती है।
3 दिसंबर को महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ताओं के साथ भोपाल में इन बच्चों से मिलने का मौका मिला

 वैसे तो चिंगारी के कैंपस में जाते ही मन और आँख दोनों भींग गए थे और कैमरा भी मैंने अपना बंद कर लिया था, लेकिन जब लौटा तो चेहरे पर खूब सारी हँसी, मन में ढ़ेरों उम्मीदें और बहुत सी तस्वीरें साथ थी।
 मानव के मुनाफाजनित त्रासदी ने इन बच्चों से वह सब छिन लिया जो एक सामान्य स्थिति में जन्म के साथ किसी भी बच्चे का अधिकार है। इन तस्वीरों में शामिल बच्चे या तो सुन नहीं सकते, बोल नहीं सकते, कोई चल नहीं सकता, कोई ठीक से सोच नहीं सकता, कोई अपने माँ-बाप, परिवार, दोस्त को पहचान नहीं सकता, कोई बड़ा होकर सामान्य जिन्दगी नहीं जी सकता, कोई व्हील चेयर से उठ नहीं सकता, हो सकता है कोई चाहकर भी डॉक्टर नहीं बन सकता, पायलट बन हवाई जहाज नहीं उड़ा सकता, कोई फिल्मी पर्दे पर छा जाने के सपने नहीं देख सकता...हो सकता है कोई फुटबॉल खेलने नहीं जा सकता, कोई क्रिकेटर नहीं बन सकता...और कोई वह सब नहीं कर सकता जो एक सामान्य बच्चा सोचता-करता-सपने देखता है।





  


















एक मुनाफाखोरआदमखोर व्यवस्था ने इनसे इनके जीने का हक ही छिनने की कोशिश की हैलेकिन वो छिन नहीं पाया इनकी हँसीइनकी आपस की दोस्तीइनका बार-बार रिक्वेस्ट कर फोटो खिंचानाफोटो को देख-देख हँसनाजोर-जोर से ताली पीटनापढ़नालिखनाकिसी भी अजनबी को हैलोहाईबायथैंक्स कहने की तहजीबएक-दूसरे को छेड़नामुंह बना बना पोज देनाहाथेलियों को मोबाईल बनाकर एकदूसरे से घंटों बतियाने की एक्टिंग करनाझूले पर तेज-तेज झूलनाहँसी-खुशी जीना...और सामान्य जीवन जी रहे लाखों बड़े-समझदार-ओहदेदार-पढ़े,लिखे लोगों को जिन्दगी जीने का पाठ पढ़ानाजो हर रोज की जिन्दगी को कोसते हुए सोते-उठते हैं..जो धर्म के नाम पर कभी हिन्दू होते हैं कभी मुसलमान लेकिन आदमी नहीं होते।


जबकि यहां देवेश और जावेद साथ में बैठ ढोलक बजातेगाना गातेकोई सकीना और पूजा साथ-साथ में डांस का अभ्यास करतेहँसते-मुस्कुराते-ठहाके लगाते-मुँह फुलाते हर रोज दुख के अथाह सागर से अपने लिये थोड़ी-थोड़ी जिंदगी चुरा लेते हैंथोड़ा-थोड़ा सुख उठा लेते हैं।


इन कुछ क्लिक्स के बहाने मैंने भी इनसे सीखने की कोशिश की थोड़ी सी जिंदगी, कुछ सुख, ढ़ेर सारी उम्मीदें......

Wednesday, November 26, 2014

पर्यावरण के मोर्चे पर सौ दिन की सरकार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नयी केन्द्र सरकार ने अपना पहला सौ दिन पूरा कर लिया है। इस बीच सौ दिन पूरे होने पर सरकार के पक्ष और विपक्ष में कई सारे तर्क और कार्यवाही चर्चा में रहे। इस नयी सरकार से लोगों को बहुत उम्मीदे हैं, इसी उम्मीद का परिणाम मोदी सरकार को मिले प्रचंड बहुमत में भी देखा गया। खुद नरेन्द्र मोदी ने चुनाव से पहले समावेशी विकास के सपने दिखाये थे, लेकिन पिछले सौ दिन में सरकार ने पर्यावरण के मोर्चे पर जिस तरह से निर्णय लिये हैं या फिर निर्णय लेने की तैयारी में है, उससे साफ है कि पर्यावरण और उसके आसपास सदियों से चली आ रही सभ्यता को बचाने में सरकार की रुचि नहीं है।

फिलहाल खबर आ रही है कि केन्द्र सरकार औद्योगिक परियोजनाओं और कथित विकास के दूसरे कामों के लिये होने वाले जंगलों की कटाई के लिये आदिवासियों और जंगलवासियों की अनिवार्य सहमति को हटाने पर विचार कर रही है। मीडिया खबरों के अनुसार सरकार वन अधिकार अधिनियम में संशोधन के लिये संसद जाये बिना ही इस प्रावधान को हटाने के लिये रास्ता बना रही है। अगर ऐसा होता है तो बड़ी परियोजनाओं के लिये सदियों से अपनी जीविका के लिये जंगलों पर निर्भर जंगलवासियों की आम सहमति जरुरी नहीं रह जाएगी।

यह उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक वन अधिकार कानून को संप्रग सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में लागू किया था। 2006 में पारित और 2008 से लागू इस कानून को लाते वक्त कहा गया था कि यह कानून सदियों से अन्याय के शिकार और अपने अधिकारों से बेदखल रहे जनजातियों और जंगलवासियों को उनका अधिकार देने का प्रयास है। तत्कालीन संप्रग सरकार ने इस कानून को अपनी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए इसे जनजातियों के भविष्य के लिये बदलावकारी कदम बताया था, लेकिन वर्तमान केन्द्र सरकार इन दलीलों को नजरअंदाज करते हुए वनाधिकार कानून को कमजोर करने की कोशिशों में जुट गयी है। इस मामले को लेकर सरकार ने 31 जुलाई को प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में पहली बैठक आयोजित की थी। इसके बाद संबंधित मंत्रालयों की कुछ और बैठके भी हुई हैं। खबर के मुताबिक अक्सर ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति को खत्म करने की दलील देने वाले कोयला मंत्रालय और भूतल परिवहन मंत्रालय के अतिरिक्त जनजातिय मामलों के मंत्रालय और विधि मंत्रालय भी इन बैठकों में शामिल होने लगे हैं। इस पूरे मामले में विडंबना है कि जिस पर्यावरण मंत्रालय पर पर्यावरण को बचाने का दायित्व है वही मंत्रालय औद्योगिक परियोजनाओं के हित को ध्यान में रखते हुए वनाधिकार कानून को कमजोर बनाने की पहल कर रहा है। हालांकि कई सारी परियोजनाओं को चालू करने के लिए वनाधिकार कानून को कागजी खानापूर्ती तक ही समेटने की कार्यवायी भी हुई जैसा कि पोस्को और महान में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वनाधिकार कानून को लागू दिखाया गया, लेकिन साथ ही पिछले साल वेदांता के मामले में इस कानून ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इसी कानून के आधार पर नियामगिरी में ग्राम सभा की सहमति ली गयी, जिसमें ग्रामीणों ने वेदांत को नकार दिया था। इन्हीं सब कारणों से बड़े खनन परियोजना वाली कंपनियां इन प्रावधान को हटाने की मांग कर रहे हैं।


पिछले दिनों मोदी सरकार ने अपने एक और निर्णय से पर्यावरण और लोगों के अधिकारों को महत्व न देने का संकेत दिया, जब नर्मदा बांध की ऊँचाई को बढ़ाने का निर्णय लिया गया। इस ऊँचाई के बढ़ने से करीब 2 लाख लोगों के उपर विस्थापित होने का खतरा मंडराने लगा  है। इसके साथ ही अब 2 से 10 हजार हेक्टेयर सिंचाई परियोजनाओं के लिये केन्द्र द्वारा अनुमति की आवश्यकता को खत्म कर दिया गया और इतनी ही नहीं अगर 2000 हेक्टेयर से कम सिंचाई परियोजना के लिये पर्यावरण मंजूरी के प्रावधान को ही खत्म कर दिया गया। इसी तरह सरकार ने प्रदुषणकारी वर्गीकरण में परिवर्तन लाते हुए वन अभ्यारणों के पांच किमी के दायरे में मध्य आकार के प्रदुषणकारी उद्योगों को अनुमति दे दिया है, जबकि इस मामले में खुद उच्चतम न्यायालय ने 10 किमी की दूरी को मानक बनाया है। सरकार ने सबसे प्रदुषित औद्योगिक शहरों में नये उद्योग पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया है, इससे गुजरात, मध्यप्रदेश के सिंगरौली, उत्तरप्रदेश में सोनभद्र जैसे सबसे प्रदुषित शहरों में एक बार फिर से नये उद्योग लगाये जा सकेंगे।


पिछले कुछ दिनों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) लगातार पर्यावरण के मुद्दे पर मुखर रही है। अब नयी सरकार एनजीटी को कमजोर करने के लिए कानून में बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। औद्योगिक घरानों के रास्ते को आसान बनाने के लिये सरकार नयी भूमि अधिग्रहण कानून में भी 19 संसोधन करने की योजना बना रही है जिससे सामाजिक प्रभाव आकलन, मुआवजे और आम सहमति जैसे मुद्दे को आसानी से हल किया जा सके। इसी तरह जीएम फसलों को लेकर सरकार ने कमर कस ली थी लेकिन संघ के सहयोगी संगठनों के विरोध के बाद उसे अपने कदम पीछे हटाने पड़े। दरअसल पर्यावरण को नजरअंदाज करके जिसपर लोगों का जीवन ही नहीं बल्कि लाखों आदिवासियों की जीविका निर्भर है कथित विकास के दौड़ में हिस्सा लेने का ही नतीजा है कि खुद पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर बयान देते हैं कि उन्होंने अपने 100 दिन के कार्यकाल में एक भी पर्यावरण मंजूरी को नहीं लटकाया। ऐसे बयान देते वक्त वो भूल जाते हैं कि पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण और जंगलों को बेहतर बनाने के लिये बनाया गया है, न कि सिर्फ विभिन्न परियोजनाओं को हरी झंडी देने के लिए। सिर्फ तीन महीने में जावेड़कर ने 240 परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी दी है।


एक सच्चाई यह भी है कि 1980 के बाद केन्द्र सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं के लिए 11,29,294 हेक्टेयर वन भूमि की मंजूरी दे दी है और अब हमारे पास 69,790,000 हेक्टेयर वन भूमि ही है जो राष्ट्रीय वन नीति द्वारा अनिवार्य 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र के मुकाबले सिर्फ 21.23 प्रतिशत ही है। स्पष्ट है कि अब हम और अधिक वनों को खत्म नहीं कर सकते।


मोदी सरकार के 100 दिन पूरे होने के बाद चार सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति बनाया गया है, जिसे पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमन्यम नेतृत्व दे रहे हैं। ये समिति पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, जल (संरक्षण) अधिनियम 1974 और वायु (संरक्षण और नियंत्रण) अधिनियम 1981 में आवश्यक संशोधन के लिये सुझाव देगी जिससे नयी परिस्थितियों में आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। सरकार के अबतक के रुख से स्पष्ट है कि यह आवश्यकता किस तरह के हितों की पूर्ती करेगा और पर्यावरण के लिये कितना नुकसानदेह साबित होगा।
अभी हाल ही में हमारे प्रधानमंत्री ने शिक्षक दिवस के मौके पर देश के बच्चों को संबोधित करते हुए जलवायु परिवर्तन की अवधारणा को ही नकार दिया। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या को सिरे से नकार देना किसी भी देश के मुखिया के लिये शुभ संकेत नहीं है। कई पर्यावरण संगठनों ने इस बात के लिये उनके बयान की आलोचना भी की है क्योंकि जलवायु परिवर्तन एक सर्वमान्य समस्या के रुप में स्थापित हो चुका है। आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन हमारी अगली पीढ़ी के लिये सबसे खतरनाक समस्या होने वाली है। हमारी सरकार को इस बात का विशेष ख्याल रखते हुए नीतियों को प्रकृति के अनुरुप बनाने की जरुरत है, जिससे मोदी के ही सपने समावेशी विकास को पूरा किया जा सके।
यह लेख सोपान पत्रिका में छप चुका है।

Sunday, November 23, 2014

जिसने कभी महानायक बनना न चाहा…

   
वो हमारी तरह ही किराये का कमरा खोजता, कॉलेज में लड़कियों को चिट्ठी लिखता, बस की कतार में खड़ी लड़की को निहारता, बैचलर लॉज में रहते हुए पानी का इंतजार करता, क्लर्क की नौकरी करता, कॉपी हाउस में लड़की के साथ बैठा रहता, अपने दोस्तों के साथ दुनिया जहान की बातें करता, बीच-बीच में अपने बाल को कंघी करता, रुमाल से मुँह पोंछता।

वो कभी किसी दूसरी दुनिया का सुपरमैन नहीं लगता। झोला लटकाए, बजाज स्कूटर को किक मारते, लड़की के साथ इंडिया गेट घूमते, सिनेमा जाते, पार्क में बैठ बातें करते,कभी गाँव में बस से उतरते, कभी रेल स्टेशन से घर जाने के लिये टांगे की सवारी करते हुए वो हमेशा अपने बीच का ही कोई आदमी लगता।
मानों हम में से ही कोई एक उठकर उस बड़े से रुपहले पर्दे पर चला गया हो। उसकी फिल्मों को देखते हुए लगता हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी को ही किसी ने बड़े पर्दे पर उठाकर रख दिया हो।

वो रियलिज्म के इतना करीब था कि उसकी बेरोजगारी, सिगरेट के लिये खत्म हो गए पैसे, सेकेंड हैंड बाइक, किसी अंग्रेजी रेस्तरां में चम्मच से न खा पाने की मजबूरी, उसके सुख-दुख, मुंछों के बीच अचानक से फूंट पड़ने वाली हँसी सबकुछ अपना ही हिस्सा लगता।

उसका बैलबटन फूलपैंट, स्लीव शर्ट, पतली मुँछ, बड़े ग्लास वाला चश्मा, कानों तक लंबे बाल ठीक वैसे ही थे, जो हमने अपने घर के एलबम में पापा-मामा-चाचा की जवानी की तस्वीरों में देख रखे थे।
उसकी प्रेमिकाएँ किसी टिपिकल हिन्दी फिल्मों की तरह अचानक से नाचते-गाते नहीं मिलती, बल्कि वो उसके आसपास ही पड़ोसी के घर में, मोहल्ले में या कॉलेज- ऑफिस में साथ-साथ काम करती मिलती। हमारी तरह उसका दिल भी लड़की को प्रपोच करना तो दूर उससे बात तक करने में धक-धक करने लगता, महिनों-सालों वो सिर्फ लड़की को निहारता रह जाता, उसके बगल वाली सीट पर बैठकर ही खुश होता रह जाता, लड़की के समय पूछ लेने भर से न जाने कितने ख्यालों को मन में उकेर बैठता।

वो उन फिल्मी हिरो की तरह नही था, जो अकेले ही न जाने कितनों को निपटा देते। वो तो हमारे चाचा जी की तरह था, हमारी तरह था- अपने बॉस के सामने हाथ जोड़े, ऑफिस-कॉलेज-आस-पड़ोस की आंटियों के सामने दुबका सहमा विन्रम छवि बनाए रखने वाला।
हम जब उसे पर्दे पर देखते हैं तो सिर्फ उसे नहीं देख रहे होते बल्कि अपने दब्बुपन, आम आदमी होने की लघुता को भी नाप रहे होते हैं। भारी भरकम सुपरहिरो वाली फीलिंग से इतर अपने दब्बुपन को सिनेमेटिक पोएट्री में पिरोए जाने का सुख महसूस कर रहे होते हैं। खुद की साधारण कहानी भी स्पेशल लगने लगती है।

साधारण होने की लघुता को बड़े रंगीन रुपहले पर्दे पर करीने से सजाने वाले उस नायक को जन्मदिन की शुभकामनाएँ, जिसने कभी महानायक बनना न चाहा।
आमोल पालेकर साहब। हैप्पी बर्थडे।

Tuesday, November 4, 2014

वाया दिल्ली

इन्टरनेट से साभार


पहली बार दिल्ली पार्टी रैली में आना शुरू किया था। उन दिनों दिल्ली आने से पांच दिन पहले ही तैयारी शुरू हो जाया करती थी। 
रैली में जाना है की घोषणा होते ही तैयारियां भी शुरू कर दी जाती थी। कोई ठेकुआ बनाता। किसी घर में नमकीन और भुंजा बन रहा होता। कहीं सत्तुआ तैयार किया जाता तो कहीं लिट्टी।
कोई पूरी और आलू का भुजिया बनाता। अमूमन ये रैलियां दिसंबर-जनवरी में हुआ करती। इसलिए कंबल का भी इंतजाम करना होता। 

गांव से निकलने से पहले की रात को  100-150 लोगो के लिए पटना से लेकर दिल्ली तक खाने का इंतजाम किया जाता।
फिर हम सब पटना में जनसाधारण में लद जाते। हमें झंडा बैनर पकड़ा दिया जाता। टिकट नहीं ली जाती कहने की जरुरत नहीं। कभी सामान रखने की साइड वाले रैक पर मुझे सुला दिया जाता तो कभी न जाने किस तकनीक से दो सीटों के बीच चादर को बाँध उसमे झुला दिया जाता।
क्या विधायक क्या जिला परिषद और मुखिया। सब के सब घर से आये पोटली को खोल एक दूसरे से बांटते खाते दिल्ली पहुंचते।
पहली बार दिल्ली आया था तो रामलीला मैदान में रुका था। दिसंबर के महीने में पता चला था दिल्ली की सर्दी क्या होती है। हम सबने जनवादी गीतों के साथ-साथ दिल्ली की सर्दी पर भी गाने गाए थे।
 उन दिनों राजधानी में मेट्रो शुरू ही हुई थी। सबसे ज्यादा मेट्रो ने लुभाया भी था। नई दिल्ली से विश्वविद्यालय तक के सफ़र को कम से कम 5 बार तो किया ही होगा।

अब दिल्ली आता हूं, अब दिल्ली से जाता हूँ। महीने में कई बार दिल्ली से गुजरता हूँ। कभी उ़ड़कर, कभी सबसे तेज ट्रेन में चढ़ कर, लेकिन बिना किसी एहसास को लिए। शुन्यता से भरे एक सफ़र की तरह बस- आता हूं और लौट जाता हूं।
यात्राओं के तरीके बदल गए हैं। लोग बदल गए हैँ। पूरे रास्ते बोगी में हँसते-बतियाते-लड़ते-गुस्साते-दुख, सुख बांटते चाचा-मामा-मामी-चाची-दीदी-भैया और न जाने कितने रिश्तों में लिपटे अनजाने लोग तक की जगह चुपचाप पेट फूलाए, मुंह चिपकाए, अपने-अपने स्मार्ट फोन में गर्दन घुसाये सह (यात्रियों) ने ले लिया है।

जहां चुपचाप टुकुर-टुकुर ताकते रहिये।  किराये का पैसा हो तो प्रमियर कटाईये और चलते रहिये।

 #lonesome Traveler 

Wednesday, October 15, 2014

हुदहुद के बहाने जलवायु परिवर्तन की घमक



जलवायु परिवर्तन से युद्ध स्तर पर निपटने की जरुरत

पिछले डेढ़ साल में तीसरी बार भारत एक बार फिर से प्राकृतिक आपदा के चपेट में आया है। इस बार यह आपदा समुद्री तुफान हुदहुद के रुप में आया था, जिससे आंध्र प्रदेश, ओडिशा के तटीय इलाके बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। हालांकि अच्छी बात यह है कि इस बार भारतीय मौसम विभाग के द्वारा समय रहते की गई घोषणा और राज्य सरकार के द्वारा बरती गयी मुस्तैदी की वजह से हुदहुद से आम जनजीवन उतना प्रभावित नहीं हुआ जितना होने की आशंका जतायी जा रही थी, लेकिन फिर भी इस तुफान की वजह से सिर्फ आंध्र प्रदेश में राजस्व विभाग के अनुसार पांच लोगों की मौत और कुल 2,48,004 लोग प्रभावित हुए हैं। इससे 70 मकों को भी नुकसान पहुंचा है और 34 पशु मारे गए हैं। इसी तरह दूसरे राज्यों में भी करोड़ों की सरकारी और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ है।
बीते महीने जम्मू-कश्मीर को भी इसी तरह बाढ़ के प्रकोप का सामना करना पड़ा है, जिससे लगभग हजारों करोड़ संपत्ति का नुकसान हुआ और लाखों लोगों की जिन्दगी प्रभावित हुई है। अभी हाल ही में अमेरिकी मौसम विज्ञान सोसाइटी ने उत्तराखंड आपदा पर एक रिपोर्ट जारी किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड आपदा आदमी जनित जलवायु परिवर्तन का नतीजा है। पिछले साल जून में उत्तराखंड में आयी भयानक बारिश को उन 16 चरम मौसम घटनाओं में से एक माना गया है जो जलवायु परिवर्तन की वजह से होते हैं। यह शायद पहली बार है जब भारत में हुए किसी भी खास प्राकृतिक आपदा को  जलवायु परिवर्तन के परिणाम के रुप में बताया गया है। सामान्यतः वैज्ञानिकों में भी जलवायु परिवर्तन को लेकर एक मत का अभाव ही देखा जाता है। वहीं, दूसरी तरफ सरकार का नजरिया भी जलवायु परिवर्तन को लेकर उपेक्षा का ही रहा है।
इससे पहले भी संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत आने वाली आईपीसीसी की रिपोर्ट में भी जलवायु परविर्तन की वजह से भारी बारिश, सूखा, भूकंप और बाढ़ की घटनाओं के बढ़ने की संभावना जतायी जा चुकी है। फरवरी में प्रकाशित आईपीसीसी की रिपोर्ट में भारत जैसे एशियाई देशों को इसके लिये विशेष तौर पर आगाह भी किया गया है।
अक्सर यह देखा जाता है कि किसी भी प्राकृतिक आपदा के बाद सरकारी अमला आनन-फानन में कार्यशील हो जाती है और कोशिश की जाती है कि लोगों को कम से कम नुकसान उठाना पड़े। चाहे वो उत्तराखंड में आया भूकंप हो या फिर जम्मू-कश्मीर में आयी बाढ़ या फिर हुदहुद। सभी मामलों में सरकार द्वारा राहत कार्यों के लिये भारी-मरकम राशि की घोषणा की गयी, लेकिन वहीं दूसरी तरफ सरकार, मीडिया और समाज में इन प्राकृतिक आपदाओं से पहले की तैयारी पर न तो कोई ठोस पहल होती दिख रही है और न ही इस पर बहस किया जा रहा है।
लद्दाख में बादल फटने की घटना के बाद से, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और अब हुदहुद जैसे प्राकृतिक आपदाओं को झेलने के बाद भारत को सबक लेने की जरुरत है। यह सबसे सही वक्त है जब देश भर में प्राकृतिक आपदाओं से पहले बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बात की जाय, जलवायु परिवर्तन की चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाय। भारत के 84 जिलों, 13 राज्यों में तटीय शहर फैले हुए हैं, जहां लगभग देश की 25 प्रतिशत आबादी निवास करती है। इन तटीय शहरों को अपने विकास योजनाओं में जलवायु जोखिम प्रबंधन रणनीति अपनाने की जरुरत है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक पिछले 270 सालों में 23 प्रमुख साइक्लोन में जिसमें लगभग 10 हजार लोगों की जान गयी है में से 21 साइक्लोन भारत और बंगालदेश के आसापस ही घटित हुआ है। भारत के सारे शहरों में जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों से निपटने के लिये कोई योजना नहीं है। न तो पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने के लिये कोई ठोस योजना तैयार की गयी है। ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि जलवायु परिवर्तन या ऐसे किसी कारणों से होने वाली घटनाओं के लिये राज्य सरकार केन्द्र सरकार के सहारे बैठ जाती है, जबकि राज्य सरकारों को चाहिए कि वो खुद के स्तर पर प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिये ठोस नीतियों को लागू करे। साथ ही, विकास के वर्तमान मॉडल में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को लेकर भी एक सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की जरुरत है। यह नहीं हो सकता कि एक तरफ जंगलों को काटकर आर्थिक विकास की गति को तो तीव्र किया जाय वहीं दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा और पर्यावरण के मसले पर महज औपचारिक कदम उठाये जाये। इन सबके बीच सबसे अहम बात यह भी है कि अक्सर ऐसे किसी भी प्राकृतिक आपदाओं की वजह से सबसे ज्यादा गरीब, कम सुविधा संपन्न तबका ही प्रभावित होता है, जिनकी संख्या हमारे देश में सबसे ज्यादा है। पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं को युद्ध स्तर पर लागू न करके हम आने वाले समय में कई नये तरह के प्राकृतिक आपदाओं को ही निमंत्रण देंगे।


Friday, September 19, 2014

बचपन का पूरा कैनवास याद आता है..

Credit-  Hajin Bae

रात का सन्नाटा चारों तरफ पसर गया है। मैंने अपने कमरे की खिड़की अच्छे से बंद कर ली है। थोड़ी देर बालकनी में खड़ा होने गया लेकिन खड़ा न हो पाया। दूर तक मौन पसरा है। खिड़की के बाहर झांकने की हिम्मत करता हूं। झिंगुर की आवाज, सन्नाटा और अँधेरे में लिपटा खाली खेत है जो पहाड़ों के किनारे जाकर खत्म होता है। घर के बाहर बिना स्ट्रीट लाइट वाली सड़क चुपचाप झपकी ले रही है। बीच-बीच में किसी मोटरसाईकिल की पीली रौशनी से उसकी नींद टूट जाती है, लेकिन सर्रररर.. से बाइक के गुजरने के बाद कुछ देर अलसायी सी ताकती है और फिर उंघने लगती है।
मैं सोना चाहता हूं लेकिन दिल्ली की आदत है कि आधी रात से पहले नींद ही नहीं आती। एक को फोन कर रहा हूं- देर तक फोन रिंग होता है, उधर से आंसर नहीं मिलता। मैं घड़ी देखता हूं- अभी सिर्फ नौ बजे हैं। रात काफी लंबी है।

मुझे अपना गांव याद आ रहा है, अपना बचपन। जाड़े के समय शाम के 6 बजे सोना याद आ रहा है, लालटेन की पीली रौशनी याद आ रही है, नोटबुक के पन्नों पर पड़ने वाली पीली रौशनी से कागज का सुनहला हो गया रंग याद आता है, उसी रौशनी में बैठे-बैठे पड़ोस के लड़के से ज्यादा तेज आवाज में पढ़ना याद आता है, रात को आंगन के उसपार बाथरुम जाने में पस्त हिम्मत याद आती है, आंगन, आंगन भी याद आता है। वहां खाट डाले बसबिट्टी (बांस का झुंड) और तार के पेड़ ताकना याद आता है, बांसों के पेड़ों का भूत बनना याद आता है। जाड़े की वो रात याद आती है।

जाड़े की वही रात नहीं कई रात याद आती है। नानी गांव याद आता है, घूरा के लिये इकट्ठा किया जलावन याद आता है, पटना में बिजली का हिटर याद आता है, हिटर जलाने के बाद आया बिजली बिल याद आता है, दस्ताने के लिये लालायित हाथ याद आता है, बंदर टोपी से किया मुखालफत याद आता है, मफलर की चाहत भी। रिश्तेदारों का उतरन वो ढीला हो गया जैकेट याद आता है।

गांव के पुलिस चौकी वाले सिपाही जी का वो दोस्त याद आता है। सोलर लाइट में जिसके साथ पढ़ते रहे। जो दो-चार महीने के लिये बेस्ट फ्रेंड हो गया था। पढ़ने के समय खेलते हुए पकड़ाने पर हुई उसकी पिटाई, उसके सूजे गाल याद आते हैं।


माँ का स्वेटर बुनना याद आता है। स्वेटर का नाप भी। किराये का वो पटना वाला डेरा याद आता है। धूप में चटाई डाल किस्सा-कहानी-किताब की पढ़ाई याद आती है, जाड़े की अलसायी सुबह और शाम का बैडमिंटन खेलना याद आता है।

बचपन का पूरा कैनवास याद आता है..

Monday, September 15, 2014

हमारे कटहलतर वाले नाना जी

अतीत की ओर लौटते क्रेडिट- Hajin Bae


अचानक ही आज कटहल वाले नानाजी याद आ गये। उनकी कभी सुनायी शायरी 'कब तक छिपोगी ऐ किरियों, पत्ते की आड़ में, आखिर कभी तो बिकोगी आम बनकर बाजार में'- न जाने कहां से मेरे जीभ पर आकर अटक गयी। करीब पन्द्रह साल बाद अचानक ही इस शायरी का याद हो आना और वो भी ज्यों का त्यों। स्कूल में नीचले दर्जे में पढ़ता रहा होउंगा शायद, तभी इस शायरी को कटहल तल वाले नानाजी ने सुनाया था। कटहल तल वाले नानाजी की कोई तस्वीर नहीं है मेरे पास। लेकिन उनको याद करता हूं तो एक बेहद लंबा तलवा याद आता है और उससे भी लंबे पैर और उससे भी लंबा कद। नाक और कान भी लंबे – लंबे जेहन में उतरते हैं। कुल मिलाकर छह फीट लंबी कद काठी। लंबी आँखे, लंबाकार चेहरा और खूब चौड़ा माथा।

बाद में उन लंबे तलवे पर उग आए कुछ घास-फूस भी याद आते हैं, जिन्हें अब कुष्ठ रोग का लक्षण समझने लगा हूं। दरअसल कटहलतल वाले नानाजी हमारे ननिहाल में नहीं रहते थे, वो हमारे गांव में ही आकर रहते थे। हां, उनका घर मेरे ननिहाल में था और ससुराल मेरे गांव में। हमलोग उन्हें कटहर तल वाले नानाजी कहते थे क्योंकि उनका घर कटहल के पेड़ के नीचे था।

युवा होने के बाद की जिन्दगी और उसके भागम भाग में कई चीजें जेहन से गायब सी हो गयी हैं- उनमें कटहल तल वाले नानाजी भी हैं। पिछले चार-पांच सालों में शायद ही उनकी याद आयी है। हां, इतने ही साल पहले उनके मरने की खबर पर छोटा सा अफसोस भर व्यक्त कर सका था। लेकिन स्मृतियां तो मन में घर कर जाती हैं। बचपन की, बचपन का हिस्सा रही ये स्मृतियां तो ऐसे ही अचानक कहीं किसी रोज मुनिरका के किसी कमरे में बैठे-बैठे सामने आकर खड़ी हो जाती हैं और सबकुछ एक-एक कर याद आने लगता है। आज कटहल तल वाले नानाजी की स्मृति भी कुछ ऐसे ही सामने आ गयी- मार्फत इस शायरी।

दरअसल, कटहल तल वाले नानाजी कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। इसलिए शायद वो अपने घर नहीं लौट कर ससुराल में ही रह गए। बाद के दिनों में आँख के अँधे भी हो गए थे। लेकिन याद आता है कुछ न दिखने के बावजूद वो चश्मा लगाते थे। शायद उस चश्मे से उन्हें छाया का भान होता हो। खैर, उनके चश्मे से ही हमने न जाने कितने कागज धूप में जलाये हैं। हाई पावर के उनके चश्मे के नीचे कोई कागज रखकर जब भी हम उसे धूप में रखते, कागज जलने लगता। यह हमारे लिये एक खेल था, जिसे नानाजी ने ही अपने विज्ञान के मार्फत  सीखाया था। बिना आँख से देखे वो हमारे खेलने की खुशी को टटोला करते और खुद भी उसमें शरीक होते।

नानाजी कई गुणों से भरपूर थे। और उनके अनुसार ये सारे गुण उनको खानदानी विरासत में मिली थी। मसलन, अच्छी अंग्रेजी बोलना, दवाओं और मेडिकल का ज्ञान, खूब सुर में गाना और शायरी। नानाजी गाहे बगाहे हमें भी खूब गाना सुनाते, हमसे अंग्रजी में बतियाते और जरुरत होने पर हमारा इलाज भी उन्हीं से करवाया जाता। जिस इलाके में पचास कोस के दायरे में कोई डॉक्टर न हो वहां नानाजी जैसे दवा-सुई देने वालों को समाज देवता नहीं तो उससे कम भी नहीं मानता। शायद यही वजह थी कि नानाजी के कुष्ठ रोग से पीड़ित होने के बावजूद समाज में उनकी इज्जत वैसी ही बनी रही थी, जबकि उस जमाने में कुष्ठ, रोग कम पाप का फल ज्यादा समझा जाता था और आजतक हमारे समाज में कुष्ठ रोगियों को घृणा के भाव से ही ट्रीट किया जाता है।

आज इतने सालों बाद नानाजी को याद करता हूं तो उनकी चिकित्सा पद्धति पर शोध करने का मन होता है। आँख नहीं होने के बावजूद वो सटीक दवा बताते। उनकी पत्नी जिसे हम कटहल तल वाली नानी कहते को उन्होंने सुई देना सीखलाया था। खुद के शरीर को प्रयोगशाला बनाकर। नानी पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन फिर भी वो गांव भर में सुई-दवा करने जाती रहती। नानाजी कहते- पीली गोली, छोटी गोली, काली गोली, बड़ी गोली, हरी-नीली गोली। तमाम तरह की गोलियों के रंग और आकार उन्होंने याद कर रखे थे और उसी अंदाज पर मरीज का इलाज भी किया जाता। आजतक मुझे याद नहीं कि उनकी दवा से किसी को हानि पहुंचा  हो, हां, लोग कैसे ठीक हो जाते थे ये आश्चर्य का विषय हो सकता है।

नानाजी ने इसी चिकित्सा पद्धति के सहारे अपने घर चलायें, दो बेटियों को सरकारी नर्स बनाया, चारों बेटियों की शादी की और ढ़ेर सारे गांव वालों की जान बचायी, उनके पैसे बचाये।
नानाजी से जुड़ी और कई सारी यादें हैं। उनमें उनका हम पर गुस्सा भी है, खूब मन लगाकर पढ़ने की सलाह भी और उनके झूठे चाय के कप में चाय पीने की चोरी पर घर से मार खाने की याद भी है।

आज सोचता हूं तो समझ आता है कि हमारे आसपास गांवों में न जाने ऐसे कितने ही अजूबे बिखरे हुए थे, न जाने कितना ही लोक ज्ञान हमारे आसपास, हमारी स्मृतियों में  बिखरा पड़ा है, जिन्हें हम महानगरीय आपा-धापी में बिसरते चले जाते हैं। यह भी समझ आता है कि कुदरत एक कमी देता है, तो दस खूबियां भी भर देता है। बस, जरुरत है हिम्मत, आत्मविश्वास और उम्मीद को जिन्दा रखने की। इस महानगरीय जीवन में जब हम कल और परसों के दोस्तों को याद नहीं रख पाते, अपनी विरासत और अनूठे स्मृतियों को याद रख पाना बड़ी चुनौति ही है।



कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...