Sunday, May 25, 2014

पटना पर कुछ फेसबुक स्टेट्स

अपना शहर तो वही है न। जहां एक जगह जाने के आपको दस रास्ते मालूम हो और आप कंफ्यूज हो कि किस डगर चलें। फिर उसी जगह जाने के बीच एक की जगह चार रास्तों को समेट कर पहुंचा जाय। सड़क पर देर रात बाइक चलाते हुए जोर-जोर से गाने का मन हो और बाइक की स्पीड 70-80-90 लेकिन अचानक से याद आए- ओह, गाड़ी का मीटर ही खराब है। फिर भी फिक्र नहीं- गिरे भी तो पचास लोग उठाने चले आयेंगे का विश्वास रहे।
महेन्द्रु- जहां हर रोज दस किलोमीटर का सफर तय करके दिल्ली का अखबार और पुराने मैगजीन लेने जाता था, अशोक राजपथ, गांधी मैदान, फ्रेजर रोड, मौर्या कॉम्पलेक्स होते हुए बोरिंग रोड और पॉलिटेक्निक होते हुए राजा बजार के पीछे से दीघा-कुर्जी निकलते वक्त लगे कि बाइक आप नहीं ये शहर ही चला रहा है।
पटना इस मायने में सच में अपना शहर ही तो है जो मेरे लंबे हो गए बालों के लिए फ्रिकमंद नजर आता है।



साल-दर-साल बदलता जा रहा है लेकिन पटना है कि जड़ है। ये शहर फैल रहा है, बदल नहीं रहा। हर बार होर्डिंग का साइज बढ़ जाता है, मकानों का उपरी तल्ला बढ़ता जाता है लेकिन शहर है कि वहीं का वहीं रहता है। न एक कदम आगे और न एक कदम पीछे।
शहर का मिजाज आज भी चाय दुकानों और लिट्टी चोखे के स्वाद में अटका-सा लगता है।
एक दम ईमानदार, गंवई और अपने तरह का अलग ही सिविक सेंस 'डेवलप' कर चुका शहर है पटना। बड़े-बड़े कॉलेज-यूनिवर्सिटि खुले तो हैं लेकिन अपने चारदिवारी में कैद ही रहते हैं-अजनबी या फिर अलग 'क्लास' का फील लिए।

शहर की जान तो PU और MU में ही अटकी रहती है। बड़े-बड़े प्रायवेट हॉस्पिटल जरुर चमकते दिखते हैं लेकिन PMCH आज भी आस्था का विषय है। इस शहर को नीतीश ने कितना बदला और कितना समय ने ये अभी तय होना बचा रह गया है.....
in sort I m in Patna 

गरमी में अपना देस बहुत याद आता है..........

लीची की तस्वीर गुगल से लेकर लगानी पड़े- वाकई बुरे दिन आ गए हैं


लीची मिल गयी। इस सीजन में पहली बार लीची का स्वाद चखा। यहां सिंगरौली में लीची। अपने देस से दूर बहुत दूर लीची का स्वाद। अचानक। पिछले कई दिनों से यहां के लोकल मार्केट में लीची खोजने का काम जारी था लेकिन यहां तो किसी को लीची के बारे में पता ही नहीं।

आज अचानक खाने के टेबल पर रखी पॉलिथिन में एक लीची दिख गयी- आखरी बची लीची। शायद इस साल की पहली और आखरी लीची। लीची का रस मुंह में और आँख में पानी। हम कमजोर लोग हैं जो हर चीज को सहेज कर, हर याद को संभाल कर रखने की कोशिश करते हैं।

अक्सर पास की चीज को हम महसूस नहीं कर पाते। नहीं तो कभी मैंने सोचा था कि एक दिन दूर देस में बैठकर इस लीची को याद करुंगा या फिर इस छोटी से लीची पर लिखूंगा।

एकाएक फ्लैशबैक में जा रहा हूं। लीची के स्वाद को याद कर रहा हूं। लीची से जुड़े अंतहीन किस्से याद आ रहे हैं। गरमी के दिनों में हम नानी गांव में होते थे। नानाजी के पास लीची का पेड़ हुआ करता था। हम सारे भाई-बहन दिन भर लीची के पेड़ पर बैठे मिला करते। अक्सर गांव के दूसरे बच्चे लीची चुराने आते। हम छिप कर औगरवाही (चौकीदारी) किया करते। कभी कोई पेड़ पर चढ़ने में सफल हो भी गया तो उसे चटाक से जमीन पर खींच कर लड़ जाते, हल्ला होता- चोर...चोर..वो बच्चे भागते और हम उनके पीछे। एक तरह से ये बच्चों के चोर-पुलिस खेल का थोड़ा-थोड़ा रियल वर्जन ही था।

तो हमारे नानाजी के रिश्तेदारों के यहां भी खूब लीची हुआ करती थी। उन दिनों हर तीसरे-चौथे दिन किसी न किसी बस से लीची का कार्टून बतौर बैना भेज दिया जाता था। आज नरहन से कल रोसड़ा से मामी के घर से। फिर हर दोपहर नाना-नानी, मामा और हम बच्चे बैठकर कार्टून खोलते- लीची निकाली जाती। बाजी लगायी जाती। मैंने पचास खाए, मैंने सौ। गिनती के साथ मार्किंग भी। नरहन वाले की लीची ज्यादा अच्छी है तो रोसड़ा वाली लीची इस बार थोड़ी कम मीठी है। लीची की बुराई को मायके की बुराई या फिर अपमान सा समझ लिया जाता। तभी तो रोसड़ा वाली मामी सफाई देती- इस बार बारिश नहीं हुई इसलिए मीठी कम है।

लीची के स्वाद से घर-गांव की अस्मिता जुड़ जाती।

नाना जी के यहां से भी लीची पेठाया (भेजा) जाता लेकिन कार्टून में कम ही- अक्सर पॉलिथिन में। उसी पॉलिथिन में जिसमें कभी मामी हाजीपुर से साड़ी खरीद कर लायी थी। एक तरह से शगुन या फिर औपचारिकता के लिए। नाना जी को ये सब रिवाज ज्यादा नहीं लुभाते थे शायद। उनकी चिंता थी कि हमारे नातिन-नाती, पोते-पोती भरपेट-भरमन खा ले फिर रिश्तेदारों को जाय।

नाना जी उन दिनों हमारे खाने-पीने को लेकर विशेष उत्साहित होते। लीची खाकर पानी नहीं पीना है, ब्रश कर लिये तो लीची क्यों नहीं खा रहे हो जैसे हजार नसीहतें घर के आंगन में गूंजा करती।

नानीगांव से जब हम लोग अपने घर लौटते तो बोरी भर लीची हुआ करती। आस-पड़ोस वाले को बांटते हुए बड़ा प्राउड फील होता- हमारे पास सैकड़ा के हिसाब से खरीदी गयी लीची नहीं है, बेहिसाब बोरी भरी लीची है- का प्राउड।

स्कूल खत्म हुए तो साथ में गर्मी की छुट्टी भी। फिर हमलोग पटना में रहने लगे डेरा लेकर। उस साल से आजतक जा नहीं पाये दुबारा लीची खाने नानी गांव। हर साल नानी बुलाती रही लेकिन कॉलेज और करियर ने गांव-घर के मोह को तो छुड़ाया ही साथ में लीची को भी हमसे दूर ले गया। लेकिन नाना जी कहां मानने वाले। उस उम्र में भी लीचियों का कार्टून लेकर पहुंच जाते पटना वाले डेरा पर। खुद न आ सके तो किसी और के हाथ ही थमा दिया एक कार्टून लीची।


जबतक पटना में रहा लीची टाइम से मिलती रही। जिस समय हमारे डेरा में लीची आती दोस्त यार का मजमा लगा रहता। कॉलेज से निकलकर सारे दोस्त-यार लीची खाने रुम पर आते। कभी-कभी तो पूरा कार्टून खत्म करके ही हमलोग उठते।

लेकिन पटना छूटने के बाद सब खत्म हो गया। बिहार के गांवों से निकलने वाले लड़के पटना तक जाने-अनजाने अपनी मिट्टी, अपने गांव, गांव के दूध-दही, आम-लीची, सब्जी, आटा, चावल, गेंहू, ककरी, तरबूजा, अस्पताल के बहाने पटना आए मामा-मामी, अपने बेटे का बोर्ड में नंबर बढ़वाने के लिए पैरवी करवाने आए चच्चा-फूफा इन सबसे जुड़ा रहता है लेकिन पटना से निकलने वाली ट्रेन पर जब वो बैठता है तो सिर्फ पटना ही नहीं छूटता उसके साथ-साथ गांव-घर के ये सौगात भी छूटते चले जाते हैं।

इसलिए दिल्ली बिल्कुल पराई सी लगती है। और यहां सिंगरौली मध्यप्रदेश में जब मैं अकेला हूं तो ये सब चीजें ज्यादा शिद्दत से याद आती हैं। याद आती है लीची और आम। आम का टिकोला। हर रात बारिश और तेज आँधी के बाद सुबह-सुबह बोरी लेकर आम के बगीचे में जाना। टिकोला चुनकर लाना।  याद आता है नानी का सिलोट में पीसकर टिकोला की चटनी बनाना। याद आता है आम के बगीचे में ही दोस्तों के साथ नमक में टिकोला को सटा-सटा कर खाना।

याद आता है दोपहर बारह बजे आम के पेड़ पर आने वाले भूत का डर। याद आती है वो लड़की जो हर दोपहर हमारे साथ आम के बगीचे में बैठकर शादी करने और आने वाले कल की चिंता में पांच-छह टिकोले खा जाती थी। याद आता है गरमी के दिनों में आम के बगीचे में ही खाट लगाकर एक टॉर्च के सहारे रात बिताना, याद आता है घर वालों से छिपकर पोखरी (तालाब) में नंगा नहाना।

गरमी में अपना देस बहुत याद आता है..........

Saturday, May 17, 2014

..... और सड़कछाप दोस्ती !!!

पटना में तकरीबन एक साल बाद





बहुत दूर जाकर घर लौट आने जैसा लगता है उनसे मिलना। या फिर सफर के बीच का स्टेशन जैसा, जहां दो-चार मिनट के लिए सुस्ताने को रुकते हैं हम। हम तीनों की जिन्दगी की अपनी-अपनी अलग-अलग प्रायवेट डायरी है। खूब सारी घटनाओं, ब्यौरों, लोगों से भरी हुई। जिसमें उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, प्यार-नफरत सबकुछ है। लेकिन हम इन प्रायवेट डायरियों के किसी एक खास हिस्से को अपनी गोपनियता बचाए रखते हुए एक-दूसरे से बांट भर लेते हैं बस।

हम दोनों की बहुत सी कहानी एक सी है
नेहा, रिमझिम से मेरी दोस्ती इन बांटे हुए हिस्सों से कहीं दूर का कुछ है। मिलने पर ढ़ेर सारी हँसी, एक-दूसरे की टांग खिंचाई, किसी सिनेमा हॉल में जाकर एकाध मूवी, एक बाइक पर ट्रिपल सवारी करते हुए शहर भ्रमण। कहने को बेहद आम, बेहद साधारण दोस्ती। हमारी दोस्ती में एक-दूसरे की निजी जिन्दगी में झांकने, एक-दूसरे के दुखों को बांटने का स्कोप बेहद कम है। है तो बस ढ़ेर-सा हँसी, थोड़ा मजाक, कुछ स्माईली ऑइकॉन :)   और सड़कछाप दोस्ती।

दरअसल ये दोस्ती लादी हुई मिली हमें। कैंपस में हम तीनों में कोई खास बातचीत नहीं थी। मुझे लगता रहा कि ये लोग विरोधी (राईटिस्ट-सेन्ट्रीक) खेमे के लोग हैं, जो मुझे एक निकम्मा, बिना स्कोप वाला बेवकूफ टाइप कुछ समझती होंगी (शायद इनके लिए मेरा एक्जिटनेंस ही न हो जैसे)

लेकिन जब हमें एक साथ एक शहर में पहली नौकरी के लिए पटना भेजा गया तो हम चारों (सरोज भी) ही एक-दूसरे का सहारा बने। मैं खुश था कि सरोज( कैंपस में मेरा बेस्ट फ्रेंड...जिसके छूटने का दुख हमेशा रहा) के साथ एक ही शहर में काम करने का मौका मिला। नहीं लगा था कि नेहा, रिमझिम के साथ प्रोफेशनल रिश्ते से आगे इमोश्नल-सा कुछ जुड़ाव होगा। नेहा हमेशा डेल्हाइट लगी तो रिमझिम के बारे में सोचता रहा कि शायद ये हमें बेवकूफ समझती होगी।

हम दोनों की एक भी कहानी एक सी नहीं है
लेकिन पहले असाइनमेंट तक आते-आते ऐसा हुआ कि हम तीनों ही एक ही असाइनमेंट पर एक साथ गए। वो शुरुआत भर था। उस सफर का जो पूरे एक साल तक चला, उस सफर का जिसमें एक साल बाद हम लोग भींगी आँखों के साथ अलग हुए, उस सफर का जिसमें हम लोगों ने खूब मैगी बनाये, खूब मस्ती की, कुछ फिल्में देखी, कुछ मन-मुटाव किया और अभी तक, आजतक एक साथ खड़े हैं।

पिछले दिनों पटना में था। नेहा भी थी। रिमझिम भी। हम तीनों थे। हमारे बीच के एक साल का गैप नहीं था। हम फिर से एक ही बाइक पर ट्रैफिक की धज्जी उड़ाते हुए सिनेमा हॉल की तरफ बढ़ रहे थे, हमतीनों दुकान में खरीदारी कर रहे थे, हम तीनों मौर्या लोक में जाकर गोलगप्पे खा रहे थे, हम तीनों ऑफिस के गॉसिप में बिजी थे।

हम तीनों की दोस्ती ऐसी ही है। बिना किसी को बहुत कुछ कहे एक-दूसरे को जान लेने की। एक-दूसरे के दुख में दुखी होने से ज्यादा एक-दूसरे के सुख में सुखी होने की। पर्सनली फील करता हूं कि मुझे इनकी जरुरत है, जहां मैं रोता नहीं, बस हँसाना चाहता हूं क्योंकि मालूम है-

मेरी हर बात पर इनको हँसी छूट जाती है  :) 

Friday, May 16, 2014

तु जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत पर यकीन कर




कल जब मोदी के जीत की खबर चैनलों पर दहाड़ मार रही थी, हम महान संघर्ष समिति के एक बैठक में सुहिरा गांव में थे। एक दोस्त ने मोबाइल इंटरनेट पर देखकर बताया कि मोदी तीन सौ से ज्यादा सीटों पर लीड कर रहा है।

लीडिंग के इस खबर को सुनकर हरदयाल सिंह गोंड मेरे पास आकर धीरे से पूछता है- अब जंगल कट जाएगा न ?

हरदयाल एक आदिवासी है। यही कोई 22-24 साल का लड़का। वो पिछले तीन साल से अपने जंगल को बचाने के लिए एस्सार के प्रस्तावित कोयला खदान के खिलाफ आंदोलन कर रहा है। वो समझता है कि मोदी की जीत के उसके लिये क्या मायने हैं, वो जानता है कि एस्सार-अंबानी के मोदी के साथ क्या रिश्ते हैं।

इसलिए उसकी आवाज में निराशा है, बेउम्मीदपन है। मोदी की जीत हाशिये पर खड़े आदिवासियों-दलितों-मुस्लिमों के लिए अच्छा संदेश तो नहीं है। भले मोदी समर्थक दावा करें कि इन तबकों का भी उन्हें समर्थन मिला है।

आदिवासियों से उनका जंगल पहले भी छीना जाता रहा है लेकिन अब इसकी रफ्तार अपनी निर्ममता को छुएगी, जिस ब्राह्मणवादी आरएसएस की पॉलिटिक्स के सबसे बड़े नेता के बतौर मोदी उभरे हैं, वो दलितों को पीछे ले जाने वाली साबित हो सकती है। इन चुनावों में जिस तरह से समाज में धर्म के आधार पर धुव्रीकरण हुआ है वो अल्पसंख्यकों और अमन पसंद लोगों के लिए शुभ संकेत नहीं देता। एक दक्षिणपंथी, रुढ़िवादी समाज और सरकार में पिछड़ों-महिलाओं-अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्ग के लोगों के साथ किस तरह का बर्ताव किया जाता है ये हम पूरी दुनिया के फासिस्ट सरकारों के शासनकाल में देख चुके हैं।


हम सबके लिए ये आलोचनात्मक होने का समय है- खुद के लिए। कहां चुक हुई? कहां पीछे रह गए हम? गंगा-जमुना तहजीब वाले अपने इस देश को बचाने में क्या चुक हुई हमसे? क्या सच में हम अपने लिए एक नयी जनता के आने का इंतजार कर रहे हैं?

लेकिन इन सबके बावजूद एक उम्मीद है। उसी उम्मीद की वजह से मैं हरदयाल को उसके तीन सालों के संघर्ष को, मेहनत को, प्रतिबद्धता को याद दिलाता हूं।
उम्मीद इसलिए भी कि इस चुनाव में जिस तरह से फेसबुक-ट्विटर से लेकर समाजिक मंचों तक पर देश के अमनपसंद तबका ने मोदी विरोध के झंडे को थामा है वो सराहनीय है।

मोदी का जो लहर करोड़ों-अरबों खर्च करके दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पीआर एजेंसी एपको ने संभाल रखी थी, उसके खिलाफ सोशल मीडिया पर अपने खर्चे से लगातार आवाज बुलंद करके साथियों ने बताया है कि भले मौसम उदास हो, हम सब उदास मौसम के बारे में भी गीत गायेंगे।

आप करने को आलोचना कर सकते हैं, आप करने को फेसबुक पर गाइडलाइन जारी कर सकते हैं, आप हमारी आलोचना की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन उसे इग्नोर नहीं कर सकते। लगातार मोदी के खिलाफ, फासिस्ट ताकतो के खिलाफ आवाज उठाकर साथियों ने अपनी भूमिका अदा की है और आगे भी करते रहेंगे।

इस बीच चुनौती बढ़ी है। कल रात देर तक हम सभी साथी गीत गाते रहे-
तु जिन्दा है तो जिन्दगी की जीत पर यकीन कर
गर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर
तु जिन्दा ......
ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन
ये दिन भी जायेंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन...
तु जिन्दा है...

Saturday, May 3, 2014

महुआः कुछ क्लिक्स

महुआ बीनती एक छोटी बच्ची
महुआ बीनकर लौटता एक परिवार

शाम को जंगल से टोकरी में महुआ लाता एक जंगलवासी



एक परिवार महुआ बीनता


दीपचंद साकेत अपने बच्चों के साथ महुआ बीनने के दौरान

महुआ के मौसम में जंगल में ही डेरा जमाया है, एक डेरे की तस्वीर

महुआ बीनना एक कला है जो पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर होता आया है, अपने बच्चे को देखता एक पिता


भाई-बहन और महुआ
पूरी कहानी यहां http://kharinews.com/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF/item/21666-2014-04-30-07-48-45

Wednesday, April 30, 2014

तुम्हारी दोस्ती पर खर्च कुछ शब्द


 न हर रोज के  फोन, न ऑफिस से लेकर निजी जिन्दगी में होने वाली घटनाओं का
ब्यौरा और न ही मिलने और बात करने का वैसा कुछ इंतजार।
वैसा कुछ भी नहीं है जो हमदोनों को दोस्ती के सामान्य परिभाषा में फिट
करता हो। हां, उसका लिखा मुझे अच्छा लगता है। अपना लिखा उसको पढ़वाना
चाहता हूं। जानते हुए कि वो अच्छा बोलेगी बजाय इसके कि ईमानदार फीडबैक
दे। फिर भी एक अजीब सा भरोसा है लगता है उसने अच्छा बोल दिया तो फिर
बांकि दुनिया भले खराब बोले ये अच्छा ही होगा। अच्छी तस्वीर, अच्छे शब्द।

हां, इत्ता जरुर है कि जब पूरी दुनिया मेरे खिलाफ खड़ी हो, वो चुपके से
मेरे बगल में आ खड़ी होती है। बिना हल्ला किए, शोर मचाये वो साथ होती है।
उस समय भी जब कथित बेस्ट फ्रैंड हँसी उड़ा रहा होता है और उस समय भी जब
लोगों की बातों से मैं निराश अपनी उड़ान कम करना चाहता हूं।

कभी-कभी जब हमारी बात होती है तो बस बातें होती है। पता नहीं क्या-क्या
बातें करता हूं। मन के गांठ खुलते हैं।

जब हम मिलते हैं तो बस मिलते हैं। उस समय हमारे आसपास  सिर्फ हमारी
मुलाकात होती है। न जाने किस इशारे में, किसके लिए, किस को इमेजिन कर-कर
के हम बतियाते रहते हैं।

हमदोनों एक-दूसरे के प्रायवेट स्पेस को बचाये रखना चाहते हैं। कई बार
लगता है उस स्पेस को बचाये रखने की वजह से कुछ छूट रहा है, कुछ है जो
नहीं कहा जा रहा है, कुछ है जो शायद कह दे तो बोझ हल्का हो जाये...
वो कई बार कुछ ऐसा लिखती है जिसपर ‘अच्छा लिखा है’ नहीं कह पाता। बस, उस
लिखे की प्रक्रिया को समझना चाहता हूं, उन बेनींद बीती रातों को समझना
चाहता हूं जब वो लिखा गया, उन हदों को समझना चाहता हूं जहां बिना लिखे
इमोशन स्थूल हो जाते हैं.....लेकिन उसके रहस्य को छूना नहीं चाहता इसलिए
समझने की कोशिश नहीं करता, बस चाह कर रह जाता हूं।

बावजूद इसके इक भरोसा है। जब बोझ बढ़ेगा तो हम एकदूसरे के कंधे पर डाल
आगे बढ़ेंगे....
बिना थोपे पैदा हुआ विश्वास है, बिना बोले महसूस किया गया अपनत्व है...

Monday, April 28, 2014

इमोशनल होना

इमोशनल होता हूं तो लिखता हूं। रोता हूं। लेकिन बोल नहीं पाता।

आज सुनील भाई की याद में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में कुछ ऐसा ही हुआ।

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...