Tuesday, August 2, 2016

अनकहे अपने लोगों से दूरी

 कुछ लोग कितने अपने से लगते हैं। दूर होकर भी।बिना किसी भेंट मुलाक़ात के। बिना कहे सुने वे अपने लगते हैं। ऐसे लोगों को आप बस जाते हुए देखते हैं। उनके लिए आप इतने सेंटिमेंटल होते हैं कि आप उनको रोकने से डरते हैं। आप उन्हें पीछे से आवाज़ नही लगा पाते- बहुत चाहने के बावजूद।
आप डरते हैं उस सामने वाले की अच्छाइयों, भावुकताओं और ईमानदारी से। आप डरते हैं- उस इमेज के टूट जाने से, जिसने आपके मन में उस सेंटिमेंट को गढ़ा है। ये सेंटीमेंट इतना गाढ़ा बन पड़ता है कि आप उसके सामने झूठ नहीं बोल पाते। अगर दुखी हैं तो हो सकता है आप हालचाल पूछने जैसी सामान्य बात पर भी उसके सामने रो दें। ऐसे अनजान लोगों के बीच फूट फूट कर रोना कितना अजीब होता होगा न!
ऐसे लोगों से मिलने से पहले हम सुख का इंतज़ार करते हैं- सुख में ही बात की जा सकती है। जब तक सुख न हो- तब तक आप बस उन्हें कनखियों से गुजरते हुए देखते रह जाते हैं। और फिर करीब जाने के बाद अलग हो जाना कितना painful प्रोसेस है न?

रोता हुआ सेल्फी

हमें हर चीज़ एक बने बनाये नियम की तरह थमा दी गयी है,
सेल्फी लेते वक़्त हंसना है- का नियम किसने बनाया होगा ?
हंसना एक एक्ट है- सेल्फी लेने वक्त,
हज़ारों – लाखों लोग सेल्फी ले रहे हैं और हंस रहे हैं,
हर रोज़ लोग हंस रहे हैं,
सिर्फ सेल्फी लेने के लिए हंस रहे हैं, फ्रंट कैमरा घुमते ही ज़ोर ज़ोर से हँसते हैं- हज़ार उदासियों को भीतर समेट बाहर हँसते हैं, न चाही गयी मुलाक़ात में भी हम say chees वाली सेल्फी लेते हुए हँसते हैं, जिसकी जितनी बड़ी हंसी, उतनी बड़ी सेल्फी, और दुनिया की नज़र में उतना ही खुश जीवन !
ठहाकामार हंसी वाली सेल्फी आपको ज्यादा जीवन जीने वाला आदमी घोषित कर देगा
मैं चाहता हूँ एक रोता हुआ सेल्फी
अँधेरा, दुःख, अकेलापन और विरक्ति को समेटने वाला सेल्फी।
लेकिन दुनिया ने नही बनाया है ऐसी सेल्फी लेने का कोई नियम ।
इसलिए मैं भी लगाता हूँ- एक ठहकामार सेल्फी।

Thursday, July 14, 2016

Its doesn't matter

cemetery में जाकर कैसा लगता है?
सबकुछ कितना फ़िज़ूल लगता है। अबतक जो भी किया एक बेकार की मेहनत। हमारा अबतक का किया, जिया , लिखा, कहा सब void दीखता है।
अंत में it's doesn't matter वाली बात कितनी सच्ची लगती है।
हमारी पूरी journey का अंत यही है- it's doesn't matter
और हमारी इस journey को भी कौन decide कर रहा है- एक  दुनिया जिसने बहुत सारे नियम, सिस्टम , प्रोसेस बनाये हैं - कि हमें पैदा होना है, स्कूल जाना है, कॉलेज जाना है, नौकरी करनी है, कब हंसना है, कब दुखी होना है, कब और किससे बात करनी है, कब मिलना है, कब सफर में रुकना है, कब भागते जाना है- हर चीज़ , हर desire को पूरा करने का एक बंधा-बंधाया नियम है- एक सिस्टम।
हम बस उसे ही फॉलो करते चलते हैं। बहुत सारी चालबाजियां, तिकड़म, शिकायतें, नफरत, प्रेम, गुस्सा सब करते हैं। हम जीवन को नदी बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन होता वो mathmatics है। हिसाब से किसी को खुश करना, किसी को दुःख देना, बात, मुलाक़ात। हर काम नफा-नुकसान के तराजू पर तौलते रहते हैं। जबकि अंत में सच में कुछ फर्क नहीं पड़ता। सारा जीवन, 'महानता' से भरे काम, achievement, failure सब एक illusion से ज्यादा क्या है? हम जो जी रहे हैं - वो सच में वही पत्थर है जिसे हम हर रोज ऊपर चढ़ाते हैं और वो हर रात फिर लुढ़क कर नीचे गिर आता है। हम फिर अगले दिन उसे चढ़ाने की कोशिश करते हैं। अब बस यह है कि इस पूरी कोशिश में आप कितना खुद को सिस्टम से आज़ाद कर पाते हैं, कितना अच्छा-बुरा सोच पाते हैं, कितना प्रेम दे पाते हैं, कितना अपने लिए, अपने मन के लिए जी पाते हैं, कितना सीखने से ज्यादा दुनिया का सिखाया unlearn कर पाते हैं। क्योंकि अंत में it's doesn't matter

Tuesday, June 14, 2016

लापता लोगों के उपर नया रायपुर का पता

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास बसाया गया नया रायपुर शहर। कुल 40 गाँव के लोगों जिनमें ज्यादातर दलित-आदिवासी थे को विस्थापित करके बसाया गया है। इन 40 गाँव की जगह क्रंकीट के जंगल खड़े कर दिये गए हैं। जिन्दल जैसे प्राइवेट कंपनियों के बोर्ड चारों तरफ लहरा रहे हैं। तलाब को स्विमिंग पूल बनाया जा रहा है।  वे 40 गाँव कहां गए? उन गाँवों में रहने वाले बच्चे कहां गए? महिलाएँ कहां हैं? सारे के सारे लोग शासन की बंदूक के नीचे से गायब कर दिये गए...लापता हो गए




Friday, June 10, 2016

छोटी-छोटी बातें

हम बड़े शहरों में चले आए। हमारे गाँव, छोटे शहर की पहचान पीछे रह गए। बड़े शहरों में सालों-साल रहते हुए हम अपनी पहचान टटोलने की कोशिश करते रहते हैं।
वहां दूर गाँव में लोग हमें अब भी याद करते हैं। तब भी करते थे। एक-दूसरे को जानते थे, पहचानते थे। आसपास कहीं चले जाओ, हर जगह दुआ-सलाम करने वाले लोग मिल जाते थे।

लेकिन बड़े शहरों में, एक ही दफ्तर और मकान के नीचे काम करने वाले लोगों में भी दुआ-सलाम नहीं, कोई जान-पहचान नहीं होती।

छोटी-छोटी बातें

1. ट्रैफिक सिग्नल पर जितनी देर खड़े रहो, उतना मन बैचेनी, गुस्से से भरता रहता है। लेकिन यही ट्रैफिक सिग्नल किसी की रोजी-रोटी का अहम हिस्सा है। उसकी पूरी बैचेनी इस बात पर टिकी होती है कि कितने देर तक लाल बत्ती जलती रहे, उतनी देर वो अपना सामान, फुल, फोन कवर, पंखे, धूप से बचाने वाले शीशे के कवर वो बेच सकता है। अक्सर वो दिख जाता है आईआईटी वाले फ्लाईओवर के पास। उसका चेहरा गोल है, वो गोल-गोल शीशे वाला चश्मा पहनता है। कपड़े भी उसके जहीन से होते हैं। मैं कई बार चाहकर भी पूछ नहीं पाता उसकी कहानी...डर लगता है।

Saturday, May 28, 2016

लंबी यात्राओं के बाद का ठहराव






रायपुर के एक होटल में। सुबह चार बजे ही नींद खुल गयी। वैसे जगा शायद रातभर ही रहा- एसी के प्वांइट घटाते-बढ़ाते, करवट बदलते जगा रहा। एक लंबी यात्रा के बाद रायपुर पहुंचा हूं। करीब 1300 किमी की सड़क यात्रा, सात जिले, दर्जन भर ब्लॉक, उससे भी अधिक गाँव, सैकड़ों लोग और फोनबुक में जुड़े बीस से ज्यादा नये दोस्तों के नंबर। इस दस दिन की यात्रा में इतने उतार-चढ़ाव आये- पहाड़, जंगल, नदी, डैम, गाँव, खदान, लोग, हाथी, जीवन। कई बार मन बच्चों की तरह पुलक उठा, तो कई बार एक गहरे अवसाद में डूब गया।
लगातार चलते रहने के बाद अचानक रुकने से कल से ठहराव-सा लग रहा है। हर सुबह पाँच बजे उठना, छह बजे तक निकल जाना, न सोने का कोई भरोसा, न खाने का, उपर से छत्तीसगढ़ की गर्मी। लेकिन इन सबके बावजूद सफर का मोह बना रहा। लोगों से बात करने का, उन्हें डॉक्यूमेंट करने का, घने जंगल में खड़े हो जी-भर सांस भीतर भर लेने का मोह कभी कम न हुआ।
देश के सुदूर देहातों, जंगलों, गाँवों और लोगों के जीवन को देखते हुए मुझे एक अजीब से भाव का अनुभव होता है, जिसके लिये ठीक-ठीक शब्द शायद मेरे पास नहीं। बहुत लगा लो तो धर्म की भाषा में उसे ‘स्प्रिचुअल’ कहा जा सकता है। लेकिन हम ‘नास्तिक धर्म’ वाले लोग स्प्रिचुअल शब्द से ही कितने डरते हैं? कई बार जंगल के बीच गाड़ी रोक- चुपचाप जोर-जोर से रोने का मन होता रहा। आदिवासी गाँवों में घूमते हुए, उनकी ईमानदारी, सहजता को देख मन घबराने लगता है। अचानक से अपनी सारी बेईमानी, शहरी प्रपंच, बौद्धिक फरेबपन याद आने लगता है। आप अपनी नजरों में ही एक खराब आदमी साबित होने लगते हैं। जीवन के मर्म को जितना आदिवासी समाज ने पकड़ा है, शायद ही दुनिया के किसी और समाज में वो समझ विकसित हुई हो। वो जानते हैं जरुरतों की एक सीमा होती है, वो जानते हैं कि प्रकृति और जीवन एक साथ संभव है, वो जानते हैं विकास और प्रकृति एक-दूसरे के द्वन्द नहीं हैं। उनके गाँव-घर भले एक-दूसरे से दूर-दूर हों, लेकिन वो जानते हैं सामूहिकता।
हम शहरी- दफ्तरों में, आसपास की दुनिया में एक-दूसरे के खिलाफ नफरत-घृणा, सवाल, शंका लिये खड़े रहते हैं। अपने ही अपार्टमेंट के बगल वाले फ्लैट में रहने वाला पड़ोसी हमारे लिये अजनबी है। हम हर दस मिनट पर अपने स्मार्टफोन को चेक करते, फेसबुक को रिफ्रेश करते, ट्विट करते हुए, होम डिलवरी साइटों पर ऑर्डर करते हुए एक खुद की बनी-बनायी दुनिया में आत्ममुग्ध रहते हैं। कई बार भ्रम होता है यह दुनिया बहुत बड़ी है- ग्लोबल गाँव है। लेकिन हकीकत में वो कैद है, जहां उतनी ही स्वतंत्रा है, जितनी एक चिड़ियाघर में कैद जानवर को मिल सकती है।
लंबी यात्राओं में रहते हुए हजार नयी-नयी योजनाएँ मन में चलती रहती हैं। नया करने को मन उत्सुक रहता है। लिखने, बोलने, कहने के लिये हजार नयी बात होती है। तमाम सवालों-शंकाओं के बावजूद मन में लिखने के प्रति उम्मीद जगती है। लगता है यही एक काम है जो किया जा सकता है, और करना चाहिए। दिल्ली में जो निराशा, अकेलापन, आत्ममुगधता और स्व की चिंता बनी रहती है, वो फील्ड में रहते हुए कहीं दूर छिटक जा गिरती है। लगता है कितना कुछ है, जो कहा जाना चाहिए, जिसे कहने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए- बजाये इसके कि खुद को एक रुमानी निराशा की गली में गुम कर लिया जाये। आह, दिल्ली। लौटने में कितनी पीड़ा है !  

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...