Tuesday, June 10, 2014

बम्बई पर कुछ स्टेट्स

बम्बई कामगारों का शहर है- अ सिटि ऑफ वर्किंग क्लास। दरअसल कामगार तो हर शहर में होते हैं लेकिन शहर के भीतर उनके लिए कितना स्पेस है ये महत्वपूर्ण है। बम्बई के लोकल में हों चाहे बेस्ट या फिर टैक्सी तक में। दस रुपये के टिकट पर शहर के इस छोर से उस छोर तक चले जाओ। ऑटो रिक्शा वाले मीटर से ही ले जाएंगे, ऑकेजनली टैक्सी में बैठ कार सा फीलिंग भी लिया जा सकता है।
आपको कहीं भी संभ्रातपन नहीं दिखेगा जो दिल्ली के मेट्रो में दिखता है। मेट्रो में तो मुझ जैसे देहात के रहने वाले को भक्का मार जाता है। माहौल में अजीब सा संभ्रांतपना घुला रहता है। तो मैं निकल रहा हूं लोकल डब्बों में बैठी भीड़ में घुल जाने के लिए।


बम्बई का मरीन ड्राइव, जुहु बीच जैसी जगह मैक-डी और सीसीडी कल्चर के खिलाफ एक विद्रोह है। यहां आप दस रुपये का भुना बदाम कुतरते हुए , छह रुपये वाली चाय की चुस्की के साथ घंटों बैठे अपने आने वाले भविष्य के सपने बुन सकते हैं।
दिल्ली में सेन्ट्रल पार्क, पालिका पार्क भी कुछ ऐसा ही है। ये जगहें उस देश के समाज और कथित संस्कृति के खिलाफ भी रिबेल है जो प्यार करने वाले अपने ही बच्चों को मौत के घाट उतारता आया है।
बांकि पटना जैसे शहरों का हाल यह है कि कपल्स छिंटा-कशी और भद्दे कमेंट से बचने के लिए मजबूर होकर मंहगे रेस्ट्रा की तरफ रुख करते हैं (अगर जेब में थोड़े पैसे हुए तो)।


बम्बई की चकाचौंध में बहुत संभव है कि आपको पता भी न चले कि इसी राज्य में विदर्भा भी है, जहां दस-बीस रुपये रोजाना भी मजदूरी नही मिलती, हजारों किसानों को आत्महत्या एक मात्र रास्ता नजर आता है। 
राजनीतिक रुप से आज तक उस क्षेत्र से कोई ऐसा नेता निकल कर नहीं आ पाया जो राज्य की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा पाए। सुगर मिलों के सहारे राजनीति में बने बड़े लोगों ने इतना जरुर किया है सूखाग्रसित विदर्भ को मिलने वाले पानी को पावर प्लांटों को बांट दिया है।


बॉम्बे में शिवसेना वाम संगठनों के उपर पैर रखकर खड़ी हुई है। टेक्सटाइल और तमाम दूसरे कारखानों के कामगार मजदूरों का शहर रहा है बम्बई। इन कामगारों के बीच वाम संगठन-यूनियन काफी मजबूत भी था। अस्सी के दशक में कई फिल्मों में हड़ताल, मिल-मालिक के शोषण की खिलाफत वगैरह में इसकी झलक देखी जा सकती है।
लेकिन नब्बे आते-आते शिवसेना ने मराठी मानुष का नारा देकर इन संगठनों को तोड़ दिया। और हमेशा की तरह इस बार भी वाम संगठन इस आईडेंटी पॉलिटिक्स को टुकुर-टुकुर देखते रहे- कोई रास्ता नहीं।


बम्बई स्ट्रीट शहर है। स्ट्रीट फूड, बारिश में छाता खोले स्ट्रीट वॉक, स्ट्रीट से सट-सटा चलते लोकल-बेस्ट, शहर के वसीयतनामे की तरह स्ट्रीट कार सेवा (टैक्सी), आपस में स्ट्रीट संवाद सबकुछ है इधर। मतलब आपके लेवल पर उतर ही उतर कर बात करेगा ये शहर आपसे।
और एक बात है- भीड़ और टाइम का रोना सिर्फ मुंबई ही नहीं लगभग हर शहर का है। देश के शहरों को इन दोनों को इन्जवॉय करना सीख लेना चाहिए।


दादर, ठाणे, कल्याण, अंधेरी, बोरवली, कुर्ला। आईला, ये सब नाम फिल्मों ने जेहन में फिट कर रखा है। शायद इसलिए बंबई अजनबी-सा फील नहीं दे रहा। हर लोकल स्टेशन, टैक्सी, बेस्ट (बस), लोगों की हिन्दी सब जानी-पहचानी सी लग रिया है।
कुर्ला से लोकल वाया परेल होते हुए सीएसटी की तरफ। प्रेस क्लब और कॉफी हाउस का जायजा भी लिया जाएगा।
आपके पास टाइम हो तो (सॉरी मुंबई में किसी के पास टाइम नको)..


कल चर्चगेट से संताक्रूज के लिए लोकल में बैठा। मुंबई सेन्ट्रल से आगे बढ़ने पर पता चला कि पहला दर्जा (फर्स्ट क्लास) में बैठ गया हूं। झट एक मुंबई के साथी को फोन किया। घिर..घिर.. के बीच इतना ही सुन पाया- नये आदमी को देख हजार-दो हजार फाइन।
अगले स्टेशन पर लोकल से लगभग कूदते हुए पिछे वाले गेट से अंदर हो लिया।
सुन रखा था, देख भी लिया- बंबई है पैसे वालों की।


गणेश विसर्जन के दिन बम्बई पहुंचा हूं। गणेश विसर्जन के दौरान हर राजनीतिक दल ने अपना-अपना स्टॉल लगा रखा है। सभी पार्टियां गणेश को अपने-अपने दुकान से बेच रहे हैं- कांग्रेस, भाजपा, मनसे सब हैं।
सेकुलरिज्म एक मिट्टी का खिलौना है इस देश में। जिसे हरेक पार्टी खेलती और तोड़ती रहती है।

Friday, June 6, 2014

मुर्दा शांति से भर जाना

कभी-कभी बंद कर दो लिखना और पढ़ना!

कभी-कभी बंद होना चाहिए सोचना और समझना !!

कभी-कभी ही होता है उस पड़ाव पर पहुंचना जहां न हो कोई हँसना और रोना !!!

अच्छा ही होता है कभी-कभी मुर्दा शांति से भर जाना !!!!

Sunday, June 1, 2014

मुर्दे से शहर में एक ज़िंदा आदमी

गांवों-कस्बों से न जाने कितने बच्चे अपने सपनों का झोला उठाये वाया किसी पत्रकारिता संस्थान  अखबारों-टीवी के दफ्तरों में पहुंचते हैं। सपने बड़े होते हैं तो नाजुक भी। लेकिन इन नाजुक से सपनों को तोड़ने के लिए पहले से ही कथित वरिष्ठ, महान टाइप 'पत्रकार-संपादक' वहां बैठे होते हैं। व्यक्तिगत रुप से मानता और समझता हूं कि दस-बीस साल लिखने-पढ़ने के काम में लगा चुका आदमी न जानेे किस श्रेष्ठता बोध से भरा होता है। अपने पाठक से लेकर अखबार में नया काम करने आए गैर इंटर्न तक के साथ वो अपने इसी श्रेष्ठ भाव से मिलता है। हो सकता है कि खबरों के शहर में उसका एक मुर्दे में तब्दीली स्वाभाविक हो।
ऐसे में कुछ ही लोग हैं, जो संपादकनुमा होते हुए भी अपने वरिष्ठता के केंचुल को फेंक किसी नये आए दूधमुंहा "गैर इंटर्न" से  मिलते हैं। यह एक मुलाकात, एक गर्मजोशी से मिलाया हाथ इतना संवेदनशील होता है कि उसकी गर्माहट उस 'गैर इंटर्न' को याद रह जाता है- दो साल बाद भी, दिल्ली के किसी अखबार में ठीकठाक रिपोर्टर बन जाने के बावजूद।
पटना  में ऐसे ही एक संपादक हुए अजय कुमार और वहीं वो गैर इंटर्न अभिषेक आनंद भी।
अखबारी महान लोगों से मोह छुट चुके समय में यह इक उम्मीद, एक ठंडी हवा की तरह है अभिषेक का लिखा यह संस्मरण-



वह शायद दफ्तर में मेरे दूसरे दिन की शाम थी। मुन्नवर राणा हमारे दफ्तर में तशरीफ ला रहे थे। खबरों के शहर की किसी कुर्सी पर मैं बैठा था, तभी एक गर्मजोशी का हाथ हमारी तरफ बढ़ा। मैंने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ हाथ मिलाया। थोड़ी देर बाद यही शख्स मुन्नवर राणा को दफ्तर की ओर से फूलों का गुलदस्ता भेंट कर रहे थे।
बाद में इनके साथ उस मुर्दे से शहर (पढ़ें खबरों का शहर) में मेरा काफी वक्त बीता। राज्य भर से आए कागजों के ढेर को भी टटोलने का काम साथ मिलकर मैंने किया। तब कई वरिष्ठों की ओर से मुझे आगाहनुमा इशारा भी मिला। लेकिन शायद यह मुझ पर उस गर्मजोशी के साथ बढ़े पहले हाथ का असर था या फिर कुछ और मैं जैसे था, वैसे ही रहा।
आज जब मैं याद करने की कोशिश करता हूं, मुझे याद नहीं आता कि उस मुर्दे से शहर में किसी और वरिष्ठ ने किसी गैर इंन्टर्न (जब आप किसी दफ्तर में काम करने के इरादे से ऐवे ही पहुंचते हैं आपकी औकात इंटर्न से भी पीछे होती है) का ऐसे हाल पूछा हो।
उन्होंने हाथ मिलाने के साथ हाल भी पूछा था। अगर किसी दूसरे ने कभी किसी से पूछा भी होगा तो उसमें उनकी वरिष्ठता सामने रही होगी, और हाल जानने की जिज्ञासा पीछे, मानो जैसे कह रहे हों, हम्म ये हैं, तुम तो बाबू अभी आए हो। ऐसा नहीं है कि मैं बाकी सभी को खारिज कर रहा हूं, लेकिन जो हैं वो अपवाद भर हैं। उनकी यादें फिर कभी मौके-बेमौके शेयर करता रहूंगा।
मैंने कहा कि इनके साथ दफ्तर के कुछ कागजी काम करते हुए मुझे आगाह किया जाता रहा। ये आगाहें दो तरह की थी। एक कि तुम इनके साथ बेकार में समय बर्बाद कर रहे हो। दूसरा, इनके साथ ज्यादा देर बैठने का तुम्हारे करिअर पर राजनीतिक असर पड़ेगा। यह उस दफ्तर के एक एडिटर थे। 
जाहिर है इनके साथ काम करते हुए कई बार इनके केबिन में मुझे बराबर वाली कुर्सी पर बैठना होता। कई बार कंप्यूटर में डाटा फीड करते हुए, इनकी कुर्सी पर भी। इस दौरान केबिन में कई भविष्य के संपादक का आना होता, जो इन्हें रिपोर्ट करते थे। और ऐसे में कई दिन, कई दफे, मैं एक गैर इंटर्न मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ वहां बैठा मिलता। जब मैं दफ्तर में गैर इंटर्न था, खूब मुस्कुराता था, सबको सुबह सुबह गुड मॉर्निंग करता था। अब इस पॉलिसी में बदलाव कर लिया हूं। 
किसी संपादक जैसों के साथ किसी गैर इंटर्न का अधिक समय दफ्तर में साथ दिखना सही नहीं माना जाता है।
शायद आगे चलकर इस वाकये के मेरे करिअर पर असर हुआ भी। लेकिन कहते हैं न, कोई फर्क नहीं पड़ता। जिंदगी पर कोई असर नहीं हुआ। दरअसल, आगे चलकर इसी दफ्तर में कांट्रैक्ट वाली स्थाई नौकरी भी मिली। और मेरे कई करीबी दोस्तों का मानना है कि कांट्रैक्ट वाली स्थाई नौकरी के दौरान दौरान मेरे साथ अलग व्यवहार हुआ। इसका कारण कोई नहीं जानता। मैं भी नहीं।
और पहली बात कि इनके साथ काम करते हुए मेरा कभी समय बर्बाद नहीं हुआ। 
मुझे तो जानने का मौका मिला कि एक बॉस इस तरह भी सहज भाव से बात कर सकते हैं। वरना जमाना है कि आपके बोलने से पहले बॉस कहते हैं कि संक्षेप में कहो। और जब कभी दो पक्षों की बात हो तो, जो संक्षेप में कह दिया। मानों वही सच। इससे अधिक टाइम नहीं होता। 
मैं तो जान पाया कि मुर्दे से शहर (पढ़ें, खबरों के शहर) में भी जिंदादिल हुआ जा सकता है। जब हंसे तो उसमें एचआर के दबाव की हंसी न हो।
तभी मैं यह भी समझ क्लिअर कर सका कि स्टोरी एक तरह की नहीं होती। दो तरह की होती है। अप मार्केट और डाउन मार्केट। यह तब जाना जब मैंने इनसे स्टोरी आइडिया पूछा था। इन्होंने पलटकर पूछा था, कौन सी वाली आइडिया तुम्हें चाहिए। 
आज आपको हैप्पी बर्थडे। और बहुत कुछ है जो बचा रहेगा। नहीं लिख पाउंगा। लेकिन उम्मीद रहेगा जब भी मिलूंगा खबरों के शहर में आपकी वही जिंदादिली बरकरार रहेगी।

तुम बहुत याद आते हो

कई बार बेहद शिद्दत से याद आते हो...लेकिन फिर सोचता हूं शायद तुम्हारे प्यार जिसे मैं पजेसिवनेस बोलता हूं....के काबिल नहीं...
अच्छा लगता है जब तुम्हारे बारे में पता चलता है कि तुम अपनी दुनिया में खुश न भी हो तो कम से कम बेहतर कर रहे हो....ठीक हो...या कुछ बुनने में लगे हो।
मेरे जैसे सेल्फीसों के लिए।। खैर क्या ही कहूं।
कई जरुरत हो तो याद करुंगा। फिलहाल अभी याद आ रहे हो, तुम्हारे साथ बिताए बेहतरीन एक साल और लड़ता हुआ दूसरा साल।
दो साल की दोस्ती। और इतनी करीबीयत। अब कोई नहीं मिलता जिसके गले गलकर रो लूं, कोई बांह नहीं मिलता जिसमें सिमट कर सबकुछ ठीक हो जाने का दिलासा मिले। बस। भागता हूं, खोजता हूं, हंसता हूं, रोता हूं।
सबकुछ नॉर्मल होने का भ्रम पाले चलता रहता हूं।


Thursday, May 29, 2014

घर को मनीऑर्डर

लगता है इस हफ्ते भी घर को पैसे नहीं भेजा पाउंगा। दो दिन बचे हैं और काम इत्ता। बिजी। पिछले दो महीने से घर पैसे नहीं भेज पा रहा। समझता हूं। घर इंतजार में होगा, माँ भी। हर महीने पैसे अकाउंट में भेजने की कोशिश करता हूं लेकिन इस बार काम थोड़ा ज्यादा है इसलिए।

याद है, जबतक कॉलेज में रहा-घर से हर महीने पांच तारीख तक पैसे अकाउंट में आते रहे। अगर कभी देर हो जाय तो कैसा फील होता था न। मकान किराया, अखबार बिल, किराना वाले का उधार और भी बहुत कुछ। जो हर महीने के एक तय तारीख को चुकाना जरुरी होता था।

लेकिन जब खुद की बारी आई है तो निश्चिंत पड़े हैं। काम का बहाना है, जहां रहता हूं वहां एक ही एसबीआई का ब्रांच है। भीड़ इतनी कि पूछो मत। इंटरनेट बैंकिंग अभी तक मेरे गांव वाले ब्रांच तक नहीं पहुंच पायी है।

मनीऑर्डर की सुविधा होगी शायद। कल सिंगरौली के एक गांव में रहूंगा तो पोस्ट ऑफिस जाकर एक बार पता ही कर लूंगा। मनीऑर्डर सेफ रहेगा ये कहना मुश्किल है। बचपन में कितनी बार अपने गांव के डाकिये को मार खाते, लोगों को उससे झगड़ा करते देखा है- शहरों से, नौकरी से लोग पैसा भेजते और वो उन पैसों की दारु पी जाता। बाद में बतौर कर्ज चुकाता रहता।

लेकिन मनीऑर्डर की खुशी। आह। जब भी घर में मनीऑर्डर आता पूरा घर खुशी के झूले पर। दिनभर डोलता रहता। जब मौसी के यहां कश्मीर के बोर्डर पर तैनात मौसा जी मनीऑर्डर भेजते थे। उनकी माँ कितनी खुश होती थी, डाकिये को टिप दी जाती, शाम को बाजार से मिठायी लाकर बांटी जाती। महीनों इंतजार होता। ज्यादा देर होने पर चिट्ठी लिखी जाती- बेटा, तबीयत खराब है, बहु को बच्चा होने वाला है, चापाकल बनवाना है, खेत में पानी पटाने का मौसम आ गया है, अबकी सोच रहे हैं बारिश में खप्परा ठीक करवा लें, होली में न सही छठ में तो सबके लिए साड़ी लेना ही होगा न। तो जितनी जल्दी हो सके पैसा मनीऑर्डर कर दो।

उधर से बेटे की चिट्ठी आती- इस बार मनीऑर्डर भेजने में देरी हो रही है। सरकार पैसा नहीं दे रही, छुट्टी का पैसा ज्यादा काट लिया है, इस महीने बिमार पड़ गए- डॉक्टर को दिखाना पड़ गया। जल्द ही पैसे भेजेंगे। छठ तक कोशिश करेंगे खुद आने की। तबतक सकुशल रहिये।

माँ परेशान होती। गाँव के साहुकारों से सैकड़ा पर ब्याज सहित कुछ पैसे उधार लिये जाते। घर के काम निपटाये जाते और मनीऑर्डर का इंतजार किया जाता।

एक दिन डाकिया आता। अंगूठा लगवा के मनीऑर्डर पकड़वा जाता। फिर सारे उधार चुकते किये जाते। घर के बाकी बचे काम पूरे किये जाते और दो-तीन दिन रुककर बेटे को मनीऑर्डर मिलने की सूचना भेजी जाती।

मेरा घर उतना खुशनसीब रहा नहीं कि कोई मनीऑर्डर भेजे। मेरे घर में भले मनीऑर्डर नहीं पहुंचा हो लेकिन वो आसपास रहने वालों के मनीऑर्डर का इंतजार और मिलने की खुशी में सहभागी रहा है। स्वाभाविक ही है मेरे घर को भी तो कभी लालसा हुई ही होगी न- काश, मेरे घर भी आता मनीऑर्डर।

हालांकि अब शायद ही आता हो मनीऑर्डर। तकनीक और बैंकिग की सुविधा ने उस लंबे इंतजार के बाद मिलने वाली खुशी को गायब कर दिया है। अच्छा है। अब जिन्दगी आसान है।

लेकिन फिर भी जाने क्यों मन हो रहा है - एक मनीऑर्डर घर भेजने का। शायद इसी बहाने मेरा घर भी मनीऑर्डर की खुशी को अपनी यादों में सहेज सके। शायद।



हनुमान बनने के समय में

हो सकता है आप इसे कहानी समझें, कोई इसे संस्मरण का नाम देने के लिए भी आजाद है लेकिन खुद इसे लिखने वाले ने इसे कमेंट्री का नाम दिया है। कमेंट्री समाज पर भी, राजनीति पर भी और हो सकता है इन सबसे बढ़कर हमारी मानवीय संवेदना पर। फेसबुक स्टेट्स के दौर में कुछ इस तरह का भी पढ़ा और लिखा जाना जरुरी है.....लिखा विनय सुल्तान ने है


घर से दूर दिल्ली में मेरे जैसे बेरोजगार युवक के पास शाम में करने के लिए कुछ ख़ास होता नहीं हैं। फिल्म सिटी के हर दफ्तर में में सीवी के साथ चक्कर काटने के बाद अक्सर शाम को मैं ऐसे किसी मेट्रो स्टेशन पर उतर जाता हूँ जहां पर भीड़-भाड़ हो।  मेरी बेरोजगारी ने मुझे लाजपत नगर, चांदनी चौक, चावड़ी बाजार, पहाड़ गंज सहित दिल्ली के तमाम बाजारों की सैर करवा दी। 

 इन सब में कनाट प्लेस मेरी पसंदीदा जगह है. यह कोई कहानी नहीं है और ना ही कोई संस्मरण. यह एक तरह की लिखित कमेंट्री है. जो दोस्त एक बढ़िया क्लाइमेक्स के इन्तेजार में हैं, उनके हाथ मायूसी लगने वाली है।

 तो इस लम्बी भूमिका के बाद घटना की तरफ बढ़ा जाए. शनिवार की शाम थी. मैं नोएडा के एक दफ्तर से मायूस लौट रहा था. मायूसी अपने उफान पर थी इस लिए वक़्त की हत्या करने के लिए(टाइम किलिंग) मैंने राजीव चौक का रुख किया. पिंड बलूची होते हुए मैं हनुमान मंदिर पहुंचा. पिंड बलूची मेरे लिए एक रहस्य है. फेंटेसी के भीतर की फेंटेसी. पता नहीं अन्दर से कैसा है पर जब भी ये नाम सुनता हूँ तो लाल कुरते और जलेबी मूंछो वाला दरबान सामने आ जाता है. हनुमान में मेरी कोई श्रद्धा ना होने के बावजूद मैं अक्सर सीपी के हनुमान मंदिर की तरफ बढ़ जाता हूँ. एक दोस्त ने गंगा ढाबे पर समोसा खाते हुए कहा था कि भारतीय बहुत होशियार होते हैं. आलू से पेट भर लेते हैं. इस उधार की होशियारी से उपजी चेतना और खाली पेट को भरने के लिए हनुमान मंदिर के बाहर लगी सब्जी कचौड़ी की दूकान सबसे मुफ़ीद जगह थी. 

मैं एक प्लेट सब्जी कचौड़ी खाने के बाद वहीँ किनारे बैठ जाता हूँ. ऊपर की जेब में पड़ी मुरझाई हुई सिगरेट निकाल कर उसे सुलगा लेता हूँ. शाम का वक़्त था. दुसरे पहर में बारिश का अहसास देने के नाम पर हुई बूंदा-बांदी के बाद हवाएं निर्मल वर्मा के उपन्यासों जैसी चल रही थी. एक बन्दर परिवार पीपल के पेड़ पर बैठा था. बंदरों के बच्चे खेल रहे थे. मुझे शक है कि बंदरों को पकड़ा-पकड़ी के अलावा कोई खेल शायद आता हो. मैंने अक्सर बन्दर के बच्चो को बिना वजह एक-दुसरे के पीछे भागते देखा है. खेल-खेल में एक बन्दर के बच्चे ने अपनी औकात से बढ़ कर छलांग लगा दी. उसकी गलती का अहसास उससे पहले उसकी मां को हो गया. उसके हाथ से टहनी छिटकने से पहले उसकी बांह उसकी मां के हाथ में थी. 

 रिवोली के ठीक सामने एक चार साला लड़का हनुमान बना खड़ा था. उसका परिवार ठीक उसके पीछे बैठा था. लोग बाल हनुमान के सामने निकल रहे थे. कुछ उसके हाथ में सिक्के थमा रहे थे. उसकी एक बहन थोड़ी दूर पर गुब्बारे बेच रही थी. इसी बीच एक सरदार जी अपनी महिला साथी के साथ रिवोली में सिनेमा देखने पहुंचे. सरदार जी का आर्थिक-सामाजिक विश्लेषण करने के लिए हम उदय प्रकाश से कुछ समय के लिए फैंटेसी उधार ले लेते हैं. सरदार जी दिल्ली के किसी पॉश इलाके के रहने वाले थे. जो महिला उनके साथ थी वो उनके शो रूम में काम करने वाली मुलाजिम हो सकती है. ये महज खालिस कल्पना हो सकती है. अगर यह झूठ साबित होती है तो पुलिसिया दस्तावेज का शब्द 'प्रथम दृष्टया' मेरे बचाव का सबसे बढ़ा हथियार है. 

तो हुआ यों कि सरदार जी अपनी महिला मित्र के सामने रुआब गांठने की गरज से पास की गुमटी से एक कोकाकोला की बोतल खरीद कर बाल हनुमान के हाथ में पकड़ा दिया. इस बीच वो अपनी मित्र से कुछ कह रहे थे जिसका लब्बोलुआब यह था कि भीख मांगने  वाले इस बाल हनुमान का बाप चोर और शराबी है. इस वजह से पैसा देने की जगह वो इसे कुछ खिला कर अपने पुण्य अकाउंट को मजबूत कर रहे हैं. लड़की सिर्फ गर्दन हिला रही थी. कोकाकोला की बोतल को खोल कर सरदार ने बाल हनुमान के मुंह में वो बोतल लगभग ठूंस दी. हनुमान ने उसमे से दो अपनी औकात से बड़े दो घूँट खींचे और मुड़ कर अपने परिवार की तरफ देखने लगा.

 उसकी एक गर्भवती बहन, दादी और एक दो साल की बहन की नजर कोकाकोला की बोतल पर टिकी हुई थी. सरदार के रिवोली में घुसते ही लड़का सड़क के किनारे बैठे अपने परिवार की तरफ भागा. उसने कोकाकोला की बोतल अपनी दादी के हाथ में थमाई और फिर से अपनी जगह आ कर खड़ा हो गया. इसी बीच भीख मांग रही उसकी मां एक ऐसे आदमी के पीछे भागने लगी जिसके हाथ में केलों से भरा एक थैला था. आदमी उसकी मां को अपनी जबान से लतिया रहा था. 'गंदी औरत मैं तुझे एक केला नहीं दूंगा.' उसने आधा दर्जन बार इस बात को इतनी उंची आवाज में कहा कि वहां मौजूद हर आदमी को पता लग गया कि बाल हनुमान की मां एक गंदी औरत है. इसके बाद वो रिवोली के पास वाली गली की तरफ मुड़ गया. मां भी पीछे-पीछे भाग रही थी. 

इसके बाद गली से हल्ले की आवाज आने लगी. हनुमान ने गदा छोड़ कर गली की तरफ दौड़ लगा दी. मेरे दिमाग ने बन्दर के बच्चे और उसकी मां का दृश्य एक बार फिर ताजा हो गया.

Monday, May 26, 2014

एक आदमी बनना भूल गये हैं.......

एनडीटीवी पर चली एक खबर का स्क्रीन शॉट सोशल साइट पर खूब शेयर हो रहा है। उसमें मोदी के गांधी की समाधि पर फूल चढ़ाने जाने की खबर है। बस गलती इतनी है कि गाँधी की जगह मोदी टाइप हो गया है और खबर बन गयी है- मोदी की समाधि पर नरेन्द्र मोदी।

इस स्क्रीन शॉट को लेकर लगातार लोग मीडिया को गरिया रहे हैं। कोई मोदी के मीडिया के साथ संबंधों की ले रहा है तो कोई चूंकि एनडीटीवी है तो उसकी ले रहा है।

और इन सारे बहसों, चुटकुलों, मजाकों के बीच सबसे ज्यादा जिस आदमी के पीड़ित होने का खतरा है वो है इस कार्यक्रम के टिकर पर बैठकर लिखने वाला आदमी। टिकर या फिर हेडलाइन जो भी हो। फेसबुक पर चले इस अभियान की आखरी सफलता क्या होगी- चैनल इसके लिए माफी मांग लेगा बस।

लेकिन सोचिये जरा, इस तरह की टाइपिंग मिस्टेक करने वाले उस टीवी कर्मचारी के साथ चैनल में बैठा बॉस क्या बिहेव कर रहा होगा, पूरे दफ्तर में आज उसके साथ लोग कैसा बिहेव कर रहे होंगे, हो सकता है एनडीटीवी में ज्यादा संवेदनशील लोग बैठे हों तो हल्की-फुल्की डांट लग जाये और बात रफा-दफा हो जाय लेकिन होने को यह भी हो सकता है कि उस कर्मचारी को नौकरी से ही निकाल दिया जाय।


लेकिन हमलोगों का क्या है?  हम लोग मोदी आलोचक हैं, हमलोग एक खास विचारधारा में लिपटे आदमी हैं, हम अपना काम कर रहे हैं, हमारी संवेदनशीलता लार्जर मास के साथ जुड़ी हुई है, उस एक अदने से टीवी कर्मचारी की नौकरी रहे या जाय हमें क्या मतलब।


वो जो बारह-चौदह घंटे बैठकर कभी टिकर, कभी ब्रेकिंग लिखता रहता है, हो सकता है अभी नया आया हो, पत्रकारिता के जज्बे से लैस। लेकिन उसे टीवी पर टिकर लिखने बैठा दिया गया हो, हो सकता है वो पांच साल से टीवी का टिकर ही लिख रहा हो, उसके भीतर का पत्रकार एक मशीन बन गया हो, उसके काम करने की परिस्थिति बद से बदतर हो, पत्रकारिता के पर्दे पर चमकता हुआ नाम बनने आया वो शख्स हो सकता है कि खुद को एक कम लागत में ज्यादा घंटे काम करने वाला स्किल मजदूर बनना स्वीकार कर लिया हो। लेकिन हमें क्या है। हम उसकी ये परिस्थितियां भला क्यों समझने लगे।


हमें तो आलोचना चाहिए, फेसबुक पर लाइक और ट्रेंड करवाने का ठेका चाहिए, हम तो वहीं करेंगे। मसाला है तो उसकी दुकानदारी जरुरी भी तो है न।

शायद उस टीवी कर्मचारी की ही गलती है, जिसने एक ऐसे काम को चुना जहां छोटी गलतियों के लिए भी स्पेस नहीं। कौन गलती नहीं करता, अपने हर रोज के दफ्तरी काम में, कौन है जो मिस्टर परफेक्टनिस्ट है अपने काम में। लेकिन उस टिकर टाइप करने वाले ने नहीं समझा कि उसका काम भले लोग नोटिस न करे, उसकी गलतियों को उछालने वाले लोग टीवी के बाहर अपना मोबाईल फोन लेकर बैठे हुए हैं।

मैं टीवी का आदमी नहीं हूं लेकिन फिर भी समझने की कोशिश कर रहा हूं। टीवी में लगातार दिन-रात मोदी-मोदी चलता रहता है। टीवी कर्मचारी रात-दिन मोदी-मोदी ही टाइप करता रहता है। पूरा टीवी मोदीमय हो गया है। ऐसे प्रेशर में काम करने वाले आदमी से गलती होना बेहद सामान्य सी बात है। जो टीवी के जानकार हैं समझते हैं इस प्रेशर को, इस गलती को। लेकिन अब काम ऐसा है कि छोटी सी गलती भी दिख जाती है। ठीक है कि हम उस गलती को पकड़ लिये, ठीक है कि हर चीज को अपलोड करने की हमारी आदत है, ठीक है कि इस अपलोड से हमको ज्यादा लाइक्स मिल जायेगा, ठीक है कि हमको मोदी और मीडिया की आलोचना करने का मौका मिल जायेगा।

 लेकिन इन सबके बीच क्या यह सच नहीं है कि हम सब असंवदनशील होते जा रहे लोग हैं जो विचारधारा और जनसरोकारी, बौद्धिक बनने की होड़ में एक आदमी बनना भूल गये हैं.......


कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...