Thursday, November 28, 2024

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है? 

कुछ जो न कहा जा सके, 

जो रहे हमेशा ही चलता भीतर 

एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें,

उन बातों को याद करना

उन बातों के लिये बेचैनी 

उन बातों का रंग कौन सा


उन रंगों में हमारा अपना रंग कौन सा

हमारे रंगों में तुम्हारा रंग कौन सा

तुम्हारे रंग में मेरा रंग कौन सा


हँसते हुए

नीले रंग का दरवाजा और बोगनवलिया के खिल आए फूल

जेरुसेलम शहर 

और गाजा का खंडहर

खंडहरों में दबे लोगों का रंग कौन सा


और मिट्टी बने लोग कौन से

हम कहां दबे 

जब मिले तो 

कौन से फूल खिले

सूखे फूलों का क्या करें

घर में फूलों का आना बंद क्यों 


और तुम्हारा ?


इंतजार में रहते हुए आदमी का रंग क्या 

रंग जो घर भूल आया वो कौन सा

कौन सा कॉफी

और 

जो हमारा चायखाना था 

उसका रंग भी 

नीला क्या नहीं बचा


बुदबुदाने का रंग कौन सा

कौन सी बातें 

कौन सी रंग

कौन सी हँसी

कौन से फूल 

जो 

रह गए

तुम्हारे पास

मेरे पास

हमारे पास

क्या हम दोनों के जाने के बाद भी बचा रहेगा

हमारा 

हम 



मैं चिड़िया होना चाहता हूं...

 बचपन में सोचता था मैं एक चिड़िया बनूंगा. आज इतने साल बीत जाने के बाद भी मुझे लगता है किसी दिन चलते चलते उड़ने लगूं और चिड़िया बन जाउंगा.


हमारी दुनिया के बाहर भी एक दुनिया है क्या?


एक दुनिया जिसमें हम रहते हैं. एक दुनिया जो हम दूसरों को दिखाते हैं. और एक जो छिपा रहता है. कही हमारे भीतर ही चलता रहता है.

जो पुरानी चीजों की याद में रहता है. चले गए लोगों की ललक में. उस दुनिया से हम बिल्कूल अकेले में मिलते हैं. उन गए लोगों को याद करते हैं. उन यादों को याद रखने की कसमें लेते हैं.


शायद, चलते चलते इस दुनिया से उस दुनिया में पहुँच हम उड़ने लगते हैं.


ट्रांजिट करते इस दुनिया और उस दुनिया में हम किसी दिन ऐसे ही थक जायेंगे. और फिर बैठ कर सुस्ताने बैठेंगे तो पता लगेगा कि हमारी कोई जमीन नहीं है, हमारे आसमान को किसी ने रंग दिया है.


Sunday, October 13, 2024

कि हम सवाल की तलाश करें

 जिन्दगी भर हम जवाब खोजते रहते हैं. या फिर एक बना बनाया जवाब हमें थमा दिया जाता है.

हमारे हर व्यवहार के लिये. हम कैसे प्यार करें, हम कैसे काम करें, हम कैसे रिश्ते निभायें, हम कैसे दोस्त बनाये. सबकुछ का एक फ्रेमवर्क है जो समाज औऱ सिस्टम मिलकर तय करते हैं.

लेकिन क्या जवाब खोजने से ज्यादा जरुरी नहीं कि हम सवाल की तलाश करें. सवालों के पीछे भागें. सवालों के लिये मरे. सवालों के लिये जीने की कोशिश करें.

सवाल खोजते रहें, वो सवाल जो रात ठीक तीन बजे जगकर पास चले आते हैं. वो सवाल जो चुपचाप अकेले रहने पर पास आकर बैठ जाते हैं. वो सवाल जिन्हें हम जानते हैं, जिनसे होकर गुजरते हैं. लेकिन उनको छू नहीं पाते. उन तक पहुंच नहीं पाते. फिर वो धूंधले होते चलते हैं. चले जाते हैं. और हम हैं कि चुपचाप पहले से थमा दिये गए जवाबों के साथ इस दुनिया में भटकते फिरते हैं.

Tuesday, April 9, 2024

बेकाबू

 रात के ठीक एक बजे के पहले. मेरी बॉलकनी से ठीक आठ खिड़कियां खुलती हैं. तीन खिड़कियों में लैपटॉप का स्क्रीन. एक में कोई कोरियन सीरिज. दो काफी झिलमिल.

जैसे मेरा मन. झिलमिल. लेकिन झिलमिल के बाद की शांति भी. कबीर को सुनते हुए. पूरी दुनिया एक अजीब से एक तरीके की जिन्दगी में. रिल्स. सीरीज. नौकरी. फाईनेंस. एसआईपी. फिर कहीं लॉन्ग वीकेंड का चक्कर.

इस जाल में फँसे रहने का. जान कर भी. 


छोटे-छोटे दिन कितने खूबसूरत हो सकते हैं. खुद को सजा कर किसी बाजार में घूम आना. उसके न रहने पर मैं कैसे बेकाबू हो जाता हूं. बेकाबू. 


अब तक. इतने सालों में. बेकाबू. भटकता. सयाना बनते रहने की कोशिश. 

फिर क्या करें? खुद को काबू? कहो तो

कितनी शांति है. एक ग्लास आधी भरी वाइन जैसी. एक जलती हुई सिगरेट. जो उँगलियों से मुंह तक आने की कोशिश में है.

उतनी ही शांति. एक उम्मीद की शांति. कुछ खोज लेने की.

Wednesday, September 27, 2023

भटक कर चला आना

 अरसे बाद आज फिर भटकते भटकते अचानक इस तरफ चला आया. उस ओर जाना जहां का रास्ता भूल गए हों, कैसा लगता है. बस यही समझने.

इधर-उधर की बातें. बातें बीतती जाती बातें. समय. लोग. जगह. स्नेह. एहसास. बस नहीं बदलता तो भीतर कहीं धँसा एक मन. मन जो बैचेनियों को लिये फिरता है.

कितना सुकून है इन दिनों. उपर उपर. सेहत खराब होते होने के बावजूद. भीतर धँसा मन इतना भागता क्यों है.

पता नहीं किस सवाल की तलाश में उत्तरों को खोजता रहता है. एक उपर का मन. जो हर रोज की जिन्दगी जीता है या जीने की कोशिश करता है. बिल्कुल सामान्य होने की कोशिश में. दिखने की कोशिश में. पूरी कोशिश किये रहता है. 

बहोत मजबूती से खुद को संभालना. सहेजना मुश्किल है न. कभी कभी सोचता हूं. किसको खोज रहा हूं. क्या सच में कोई सवाल, या कोई लोग. या कोई जगह. या बस ऐसे ही. गुजर जाने की कोशिश को टालते चलते की कोशिश.

बहोत रोमांच में भी खुद को सामान्य होते देखने कितना गिल्ट भरता है. नहीं गिल्ट नहीं. शायद. खुद को देख सकना. खुद के साथ रह सकना.

एक उम्र के बाद

चाहतें 

सिमटी होती हैं

छोटी-छोटी चीजों में

किसी रात एक अच्छी नींद

किसी सुबह गुम गए दोस्त के साथ

एक चाय

किसी दुपहर एक पसंद की जगह पर चुपचाप बैठना

किसी शाम शोर का न होना.

या इनमें से कुछ भी नहीं.


Thursday, September 16, 2021

इतिहास मुड़ मुड़ कर चला आता है

 हमारी आधी जिन्दगी देजावू जैसी ही लगती है. हर रोज उठकर लगता है बीता हुआ कल जी रहे हैं. बीता हुआ कल फिर वापिस चला आता है. कल जो आज को डर में बदल दे.

बहुत पहले जो बीत गया, किसी और के साथ जो बीत गया, वो फिर किसी नये के साथ कैसे हो सकता है?

फिर से पुराना ही किस्सा दोहराया जाता है.

क्या बीत गये से कुछ सीखा जा सकता है

कि जो अब पलट कर आय़े इतिहास को थोड़ा-थोड़ा उस सीख से ठीक रखा जा सकता है?



Friday, May 14, 2021

बाबु जी का जन्मदिन




आज बाबु जी का जन्मदिन है. मैंने उनको सिर्फ तस्वीरों में देखा है. वो भी गिनती के कुछ तस्वीर. उनके साथ की मेरी कोई तस्वीर नहीं. न ही उनकी कोई याद.

उनके बारे में जितना जाना है वो सब सिर्फ किस्सों में. उनके संघर्ष को, उनके आंदोलन को, उनकी आवाम के हक में उठी आवाजों को. सब कहानियों में है. कई बार यकीन नही होता कि मेरे खुद के पिता ऐसे थे. इतने साहसी. सिर्फ उन्नीस साल की उम्र में एक कम्यूनिस्ट कार्यकर्ता बन गए, जमीन बंटवारे की लड़ाई लड़ी, घर-मकान, खेत-खलिहान में लाल झंडा लहराया.

जानते हुए भी कि एक दिन जान चली जायेगी, एक ईंच पीछे नहीं हटे. और एक दिन सिर्फ 31 की उम्र में शहीद हुए. आज भी उनके कॉमरेड्स हर साल उनके शहीद दिवस पर रैली निकालते हैं, उनको याद करने के लिये एकजुट होते हैं. मैंने अपने पिता को उन्ही रैलियों और सभाओं में दिये गए भाषणों से जाना. इसलिये बहुत सालों तक अविश्वास में रहा. और शायद इसलिए हमेशा उनके बारे में बोलने-लिखने औऱ बताने से बचता रहा. उनके बारे में कहे गए किस्सों से भी भागता रहा. सालों साल यही सिलसिला चला. मैं हमेशा खुद की तुलना अपने पिता से करता रहा. उनके साहस की, उनके जुझारुपन की. कुछ भी तो नहीं है मुझमें.


मेरी माँ को लगता है कई बार कि मैं अपने पिता को याद नहीं करता. लेकिन सच बात तो है कि मेरे पास याद ही नहीं. बहुत सालों तक मैंने उनसे सच में अपने पिता के बारे में बात नहीं की, हमेशा लगता रहा कि उनको दुख होगा, बीत चुके के बारे में बात करने से. 

लेकिन अब मैं सुनना चाहता हूं उनके बारे में. उनके बारे में बताना चाहता हूं. उनको ऑउन करना चाहता हूं. क्या पता शायद ऐसा करके मैं भी अपने पिता की तरह बन पाऊं. उनकी तरह हिम्मत और प्यार कर सकने की ललक जगी है.

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक कॉमरेड

लाल सलाम. आपके सपनो को मंजिल तक पहुंचायेंगे.

Friday, January 29, 2021

लाल कमरे में बंद

उस कमरे में लाल रौशनी थी. पूरा कमरा ही लाल था. इतना लाल की चेहरे का रंग भी लाल दिखने लगा. 


वो उस कमरे के एक लाल कोने में बैठी थी. कमरे के ऊपर छत नहीं थी.


छत के ऊपर का रंग काले और लाल रंग का मिक्स था.

आसपास सारे घर टूटे पड़े थे, पूरा शहर टूटा पड़ा था, लोग टूटे पड़े थे, लोगों के टूटने से पहले विचारों का टूटना हुआ था, विचारो के टूटने से पहले संवेदनाएँ बिखरी थीं. संवेदनाओं ने पानी को खत्म किया, पानी ने नदियों को, पहाड़ों को और जंगलों को. नदी, पहाड़, जंगल के लिये जरुरी था पानी का बचे रहना.

फिर पूरा देश ही बिखर गया. जैसे कोई बड़ा युद्ध हुआ हो. बस वो कमरा बचा रह गया था, 

कमरा नहीं बस उसकी दिवारें, लाल दिवारें, उनके बीच लाल रंग और लाल कोना. जहां वो बैठी थी. अपने घुटनों को पेट में घुसाये.

आँखों को घुटनों में घुसाये. सारे बिखराव को आँख मीच कर खत्म कर देने की कोशिशों में.

तभी उसे दूर नदी की आवाज सुनायी पड़ी. उससे भी दूर सरहद के पार एक सूखा हुआ पेड़ जिसमें एक पत्ता लटक रहा था.

पत्ते का रंग लाल था.

जो अभी भी टूटा नहीं था.

उसी लाल रंग से कमरे तक लाल रौशनी आ रही थी. जहां वो अब भी घुटनों में मुंह घुसाये बैठी थी.

Tuesday, August 18, 2020

हमें एवरेज होने से डर क्यों लगता है?

आजकल हर सुबह एक उदास ख्याल के साथ जगता हूं। एकदिन ख्याल आया कि मैं अपने घर पर हूं। इस कमरे, इस शहर से बहोत दूर।

फिर एकदिन लगा, मैं लिखना भूल गया हूं। अब मैं लिखना चाहता भी नहीं। शायद ऐसे ही हम अपने प्रेम को जाने देते हैं। जिन जिन चीजों से एक वक्त में हमें प्रेम रहा, उनके जाने को स्वीकार करने में लंबा वक्त लगता है।

शायद।

मैंने 'शायद' शब्द का खूब इस्तेमाल किया है अबतक। लेकिन वो अब बेतुका बचाव भर लगता है बस।

हां तो आज मैं एक दूसरे ही ख्याल के साथ जगा। खुद के औसत होने को हम क्यों नहीं स्वीकार कर पाते। हम क्यों नहीं स्वीकार पाते कि परफेक्ट होना ही आपका होना नहीं है। हम सब और कम से कम हममें से ज्यादातर औसत, मीडियोकर हैं और यही सामान्य बात है।

फिर मीडियोकर होने को लेकर इतनी घृणा क्यों?

क्यों हर काम में हमें परफेक्ट होने की कोशिश करते रहना है?

बीच बीच में रहकर भी जिन्दगी जीने में कोई हर्ज नहीं।

बहुत रोमेंटिसाइज्ड लाइफ से कहीं बेहतर है एक सामान्य जिन्दगी जीना, उसको सामान्य, सुंदर और सीमित बनाने की कोशिश करते रहना।

मुझे गुस्सा क्यों आ रहा है? यह सब लिखते हुए, किसपर ?

खुद के बीते ख्यालों पर। शायद.


Sunday, May 3, 2020

किसी रोज के बारे में




वो किसी एक जगह क्यों नहीं टिक पाता है? कोई एक बिंदू जहां वो अटक जाये तो कितना अच्छा हो। सुकून हो। लेकिन उस एक बिंदू पर पहुंच कर थोड़ी देर सुस्ता भर पाता है और फिर वहां बेचैनी।

फिर किसी और बिंदू की तलाश। हर तरफ कुछ नया करने की ललक। जो कर रहा हो उससे जल्दी ही असंतुष्टि।





लेकिन क्या ये असंतुष्टि उसके अकेले का है। उसका अपना है। या फिर दुनिया के डर ने पैदा किया है?

क्या यह सबकुछ ही। शर्मनाक चाहतों से नहीं जुड़ा। या कि दमित कुंठाओं से। या कि ऐसी स्मृतियों से जिसका सिरा न पकड़ में आता हो?




वो एकदिन उठकर चुपचाप चला गया। बुदबुदाते हुए अपने ही भीतर। जब लौटा तो उसके हाथों में फूलों की टहनियां थी, और ऊंगलियों में कांटे चुभ रहे थे।


Sunday, March 15, 2020

माँओ के बारे में

मुझे लगने लगा है कि हम माँओं के बारे में कितना कम जानते हैं। उनके बारे में कितना कम लिखा गया है। मां और बेटे या फिर बेटी के बीच के रिश्ते को समझने की कोशिश नहीं की गयी है।

या तो माँ बहुत महान होगी, या फिर बेटा विलेन। फिल्मों से लेकर कहानी तक यही नैरेटिव बिखरा पड़ा है।

क्या ऐसा नहीं होता कि माएँ भी हद तक इरेटेटिंग हो सकती हैं? कि माएँ अपने बारे में अपनी जिन्दगी के बारे में भी हद दर्जे तक स्वार्थी हो सकती हैं।

वो। उनका स्पेस। उनकी जिन्दगी। उनका प्रेम। उनका लोगों से रिश्ता। सबकुछ को अच्छा-अच्छा या महानता के चश्मे से ही देखने का प्रेशर क्यों?

ये त्याग, ये अनकंडिशनल लव क्या हमने दुनिया की सारी माँओ पर थोप नहीं दिया है?

एक ऐसी जंजीर जिसमें वो जिकड़ी रहती हैं। अपने सपनों को कभी जाहिर नहीं करती, अपनी चाहतों पर ताला डाल कर रखती हैं और फिर उन चाहतों की बजाय 'बच्चों की चाहतें' ही उनकी चाहत बन जाती है।

और फिर कई बार ये भी तो होता है कि माँ की चाहतों में बच्चे बंधने जैसा महसूस करने लगते हैं।

कई बार ये भी तो होता है कि हम अपने लिये चाहे गए इच्छाओं में बंद सा महसूस करते हैं.


न हमारी माँओ के लिये अच्छा, न हमारे लिये। फिर ये महानता किसके हक में है?

क्यों महानता की जगह सहजता नहीं होना चाहिए..

माँ के अपने खुद के लिये सपने, चाहतें, सुख उनके बच्चों से अलग हों...

बच्चों की चाहतें, माँओ से अलग रहे.

कोई विलेन न हो, कोई भगवान न हो.

इंसानी फितरत से भरा एक जिन्दा रिश्ता रहे।

क्या ये हो सकना इतना मुश्किल है?


Monday, January 27, 2020

मेरे साथ ऐसा क्यों होता है?

मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि मैं सुख और शांति में लिख नहीं पाता।

कई महीनो से मैं लिखना चाहता हूं। लेकिन ऐसा लगता है लिखना भूल गया हूं। क्या मैं सिर्फ दुख को लिख सकता हूं।

क्या मैं लिखना भूल रहा हूं? लेकिन इस भूलने का कोई अफसोस क्यों नहीं है? क्यों लिखने में इतना सूखापन आ गया है। एकदम रफ।

ऐसा तो नहीं था। क्या मेरा हासिल यही है?

इतनी शांति मे कब रहा? बिना किसी जिम्मेदारियों के। सर्दी में किसी पार्क में धूप सेंकते हुए, रेडियो पर पुराने गाने सुनते हुए, उनींद में डूबे

या

अपने कमरे में। टेबल लैंप की पीली रौशनी में अपने प्रिय सिंगर को सुनते हुए और पसंद का ड्रिंक और अपना एकांत।

हां एकांत ही, अकेलापन नहीं। बिल्कूल एकांत। अब ये खलता नहीं। ऐसा नहीं लगता कि अपने एकांत से भागकर किसी के पास चला जाउं।

पिछले कई महीने से इसी कमरे में लगभग बंद हूं। दिन दिन भर। रात रात भर। कभी किसी के साथ कभी कभी बिल्कूल अकेले।

नयी चुनौतियों से घिरा, नये कामो मे तल्लीन।

ओह, सुख तुम यही तो नहीं हो.?

नशे में डूबा हुआ, दुनिया के तमाम बोझों से दूर, तमाम चर्चों और नारो से इतर।

बेचैनियों के बावजूद।

Thursday, August 15, 2019

कैसी आजादी?

दिन ऐसे ही बीता। चारों तरफ आजादी मुबारक के संदेश लिये। बार-बार ध्यान कश्मीर से आने वाली खबरों की तरफ। लगभग सारे ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया है और यहां तक कि 11 साल के बच्चों को भी।

पूरे कश्मीर को बंद कर दिया गया है। लोग घरों से नहीं निकल पा रहे हैं। लेकिन फिर भी कहा जा रहा है कि सब अच्छा है। कश्मीर के लोग खुश हैं।

अब अपनी आजादी को लेकर, संवैधानिक अधिकारों को लेकर सच में डाउट सा महसूस हो रहा है। आजादी की बात करने वालों को, न्याय की बात करने वालों को, हक मांगने वालों को डराया जा रहा है। सही को सही कहने वालों पर हमले हो रहे हैं। न्याय को राष्ट्र के नाम पर कूचलने की सामूहिक मंजूरी मिल गयी है।

आप प्रिविलेज हैं तो ये लिख लेना, बोल लेना, विरोध जता लेने का जो भ्रम है वो बस बचा हुआ है। जिसे आज न कल टूटना ही है।

Sunday, June 23, 2019

सुबह सुबह की बात है..

सुबह जगा तो। गर्मी कम थी। लगा धूप ने थोड़ी आज नरमी बरती है। चाय बनाया। माँ भी है। मैं मेज पर बैठे-बैठे ये लिख रहा हूं तो वो बॉलकनी में बैठी चाय पी रही है।

कमरे औऱ बॉलकनी को एक पतला पीला पर्दा बांटता है। मां ने पीली साड़ी पहनी है। काली छिट का। माँ को आये कुछ दिन हुए। वो लगातार फोन पर है। उससे लोग छूटते ही नहीं। मैं सोचता हूं।

कमरे में गांधी भजन। लता मंगेश्कर की आवाज में। अल्ला तेरो नाम। फिर किसी ने वैष्णव जन को ते कहिये गाया।

कितना सूकून है। मैं बेड पर लेटे लेटे सामने देखता हूं। आज गमलों में पानी माँ ही देगी। मैं मटन बनाऊंगा। ये अकेले रहने की आदत इतनी अच्छी भी नहीं है। मैं सोचता हूं।

कितना सारा टू-डू लिस्ट की पर्ची मेज के सामने टंगी है। लेकिन कोई हड़बड़ी नहीं। कोई एनजाईटी नहीं। न बाहर, न मन में। बस यही।

Monday, June 17, 2019

मासूमियत का...

कुछ लोग होते हैं बेहद मासूम

इतने मासूम कि अपनी मासूमियत से उन्हें घृणा होने लगे

लेकिन दूसरे उसे समझते हैं ढ़ोगा।

बहुत लोगों को तो ये यकीन ही नहीं हो पाता कि इस दुनिया में मासूम लोग भी हैं।

कई बार ही लगता है मासूमियत का आचार बनाकर इस गरमी में उसे सूखने के लिये छत पर छोड़ आना चाहिए।
गर्मी कितनी है इन दिनों..मतलब पिछले हफ्ते तो ऐसे बीते, कट रहे हों जैसे।

फिर दो दिन से बारिश न होने और आकाश के बादलों को देखकर मुस्कुराने में बीते

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बहुत ज्यादा अंदर से आउटरेज का फील करना बहुत बुरा भी नहीं है, या है बुरा पता नहीं।

कितना कुछ दिमाग में ही है हमारे। अगर उसको कहने लग जाओ तो ज्यादातर चीजें कितनी आसान हो जायेंगी।

नींद के मामले में मैं थोड़ा कच्चा हूं

नींद और मेरा रिश्ता। मेरे साथ रहने वाले मुझसे रश्क करते हैं। उन्हें लगता है मैं नींद का लकी आदमी हूं। बात सच भी है। मैं पांच सेकंड या दस सेकंड के भीतर सो जाता हूं।

बहुत सारे वक्त में ऐसा लगा है लोगों को कि मैं उनकी बात नहीं सुन रहा, या कि मैं बहाना करके नींद में चला जाता हूं। जबकि नींद बहुत तेजी से आती है मुझे।

लेकिन मैं ये भी एक्सपिरियेंस करता हूं कि नींद की एक सीमा है। एक हद। उस हद तक अगर मैं जग जाउं तो फिर मुझे इनसोमैनिक होने से कोई नहीं रोक सकता।
नींद को जीत लेता हूं। उस एक हद को पार करते ही। लेकिन ऐसा बहुत कम ही हो पाता है।

दुर्भाग्य है कि ज्यादातर मामलों में शायद मैं जब अकेले होता हूं तभी ये जीत होती है। बहुत अकेले होने पर ही।

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क्या मैं 
बहुत बेचैनी
मुझे लगता है
मैं इंट्रोवर्ट हूं
ऐसा लोग भी कहते हैं मुझसे
मैं बात ही नहीं करता
मुझे इस बारे में पढ़ना चाहिए
कभी सोचा ही नहीं ऐसा कुछ
कभी किसी ने बताया भी तो नहीं
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बेचैनी का भी हल निकलेगा।
मैं बहुत लिख नहीं पाता तो इसलिए कि अब मुझे कुछ नया लिखना है
और नया लिखने के लिये 
नये अनुभव बेहद जरुरी हैं।

शहर के भीतर 
या शहर से काफी दूर


Thursday, April 25, 2019

हमेशा वॉक ओवर दे देना

हमेशा से यही होता आया है। स्पेस देना। फिर आराम से सामने वाले को वॉक ओवर दे देना।

दूसरों को। दूसरों पर भरोसा करना। और हर बार भरोसे को तुड़वा लेना। हर बार खुद को रिस्क में डालना।


किसी किसी रोज लगता है जिन्दगी के सारे तनाव को एक कागज पर लिखकर कहीं दूर डस्टबीन में डाल आऊँ और फिर फ्रेश लिस्ट बनाऊं। सारे नये सपने। चाहतें। ललक। सबकुछ को एक सादे कागज पर फिर से क्रमवार सजाऊं।

सारी यादें, सारी वर्तमान की उलझने। सारी दिक्कतें। सारी परेशानियों को कह दूं - बॉस बहुत हो गया। अब गुड बाय करते हैं आपको। मन को हारते देखना हर रोज ही, कितना बुरा है। कितना उदास है हर चीज का क्षणिक होना। स्नेह का न होना। सबकुछ व्यवस्थित होने का एक्ट करते रहना।

टुक टुक दुनिया को खिसकते देखना और अपने पैर का एक ही जगह जम जाना।

आईये जी। कुछ परेशानियों का चटनी बनाते हैं। कुछ को करते हैं विदा। चलते हैं नयी उम्मीद की तरफ। देखने का साहस करते हैं पहाड़। रौंदते है पुरानी कसैली यादें।

कब तक दुख ही लिखा जाता रहेगा? कब तक उदासियों के फुटनोट्स दर्ज किये जाते रहेंगे? कब तक सबकुछ अच्छा बने रहने की उम्मीद की जाती रहेगी? कब तक जिन्दा रहने की कोशिश में घुटता जाता रहेगा? कब तक?



Tuesday, February 19, 2019

भरोसा नहीं होना

एक कमाल की बात है। आजतक कोई एक ऐसा नहीं मिला जिसके सामने अपने मन की गांठ खोल पाउं।

बचपन से। कई बार सोचा किसी के साथ इस गांठ को खोला जाये। लेकिन सालों साल बीतते रहे और वो हो नहीं पाया। इस एक गांठ ने लोगों छूटवाये। इस एक गांठ ने पूरा का पूरा गांव उजाड़ा। इस गांठ ने किसी चीज को अपना न होने दिया।

लेकिन अब लगता है धीरे-धीरे उस गांठ के खुलने का वक्त आया है।

Monday, February 18, 2019

पराये शहर में

रातभर कबीर को सुनते रहने के बाद की सुबह। फरवरी की सुबह। सर्दी में बारिश थोड़ी सी उदासी लेकर गिरता है। मन सोचता है। क्या एकदिन ऐसा आता है जब पराये शहर में रहते हुए हम अपने घर को बिल्कुल भूल जाते हैं?

कि सालों साल दूसरे शहर में जीते हुए हमें याद नहीं रहता हम कहां से आय़े थे..हमारा अपना शहर या गांव का रंग कैसा था..


उस खेत को भूल जाते हैं जहां पहली बार छिपकर बीड़ी पी थी या कि उस गली को जहां जोर से चिल्लाकर प्रेम को स्वीकार किया था। या उस नदी को जहां बैठकर कवितायें पढ़ी थीं और प्रेम को करीब से देखा था।


या कि उस शहर को जहां सबसे ज्यादा तपी हुई जिन्दगी देखी और सारी खुश खबरें भी वहीं सुनी। ये याद रहता है कि खेत में मटर तोड़ते वक्त ओस से पैरों में मिट्टी लग जाती है- एकदम कीचड़ जैसा।

यहां इस पराये शहर में तो हर दिन मेला है। फिर वो अक्टूबर याद आता है? पुजा और मेला का दिन?

शायद नहीं।

अच्छा मुझे लगता है ...खैर जाने दो।

मन क्या चाहता है तु बतायेगा कभी।
मैं हवा में बात करने लगा था। औऱ अब जब ये लिख रहा हूं तो आँखे बेंद कर ली हैं। आंख बंद कर टाइपिंग किये जा रहा हूं। ये क्या कोई टैलेंट है या फिर बीमारी। बीमार औऱ गुलाम। इन की बोर्डस का।


Sunday, February 10, 2019

दिल में इक पत्थर लिये चलते हैं

उसे काफी दिनों तक लगता रहा कि उसने ऑपरेट करवा लिया है और अब वो पत्थर वहां नहीं है, जिसे दिल कहते हैं। लेकिन उस दिन अचानक। तेज बारिश हुई थी। ठंड थोड़ी और। शाम के बीतने का वक्त रहा होगा।

वो यूं ही कहीं बैठा था। शहर के किसी एक जंगल में। चाय पी थी। और अचानक दर्द शुरू हुआ। उसे समझ नहीं आया। दर्द तो जाना-पहचाना सा था। अभी कुछ दिन पहले तक तो आदत में शुमार। लेकिन काफी दिन पहले अचानक से गायब भी हो गया था। अचानक नहीं शायद। धीरे-धीरे ही सही।

फिर आज। अचानक। क्यों। वो घबरा गया। हड़बड़ी में तेज चलने लगा। तेज चलने से दर्द कहां जाता है भला। वो जमा रहा।

कराह। आँसू। वो तेज गाने लगा। तेज गाने से दर्द कहां जाता है भला।

क्या दर्द ने फिर से उसे याद किया था। नहीं, नहीं। वो तो ऑपरेट हो चुका था। पत्थर निकाल कर उसने खुद ही तो बहुत दूर समुंद्र में बहाया था।

क्या पत्थर भी तैरना जानते हैं? वो तो काफी भारी होते हैं। भीतर पानी में खो जाते हैं। उन्हें तैरना कहां आता है भला। वो क्या खाक वापिस होंगे।

कहीं किसी हिचकोले में तो नहीं ऊपर आ गए। और फिर किसी ने किनारे में फेंक दिया हो उठाकर।

नहीं। नहीं। दर्द में आदमी क्या क्या सोचने लगता है। लेकिन ये दर्द। उसने तो ऑपरेट करवा लिया था।फिर अचानक। वो भाग कर समुंद्र की तरफ जाना चाह रहा था। उसने दौड़ लगायी। औऱ पहाड़ पर चढ़ गया।


उसे ऊंचाई से बहोत डर लगता था....

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...