Tuesday, December 27, 2011

आम आदमी

मैं आंखे बंद किए दौड़ लगाता हूँ


जे.एन.यू के सुनसान सड़कों पर..


मैं तेज दौड़ लगाता हूँ
और
तेज...


क्योंकि


मैं भूलना चाहता हूँ


जिंदगी के दौड़ में पीछे छूटने के गम को


मैं भूलना चाहता हूं


क्रान्ति न कर पाने के उस बेबसी को


क्योंकि 


मुझे नहीं मिलते किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लाख रूपये-प्रतिमाह


मेरे पास नहीं आते किसी बुकर प्राइज विनर किताब की रॉयल्टी


मैं नहीं कर सकता क्रान्ति की बातें 


क्योंकि 


मैं जानता हूं


बिना रोटी के रात गुजारना क्या होता है...:(


मैं नहीं कर सकता दूनिया बदलने की बातें


क्योंकि 


मैंने नहीं बितायी है
स्कूल की गर्मी की छूट्टियां-किसी हिल स्टेशन पर जाकर


मैं नहीं कोस सकता इस पूंजीवाद को


क्योंकि 


हर शाम मुझे ले जाना होता है
एक झोला सब्जी,माँ के लिए दवा और बच्चों के लिए कागज-कलम
घर में।


और अपनी इसी बेबसी में
जब सर फटा जा रहा है


मैं 
आंखे बंद किए
दौड़ा
जा रहा हूँ


बेतहाशा दौड़ कर मैं इस 
बे

सी 
को भूलाना चाहता हूँ।

Monday, December 26, 2011

मेरे नजर में इंडिया क्या है?

मेरे नजर मे इंडिया


 मेरे लिए इंडिया उस सब्जी बनाते तस्वीर वाले बच्चे की है जो स्कूल जायेगा या किसी चाय दुकान पर यह तय करना मुश्किल है। 



    मेरे लिए इंडिया उस 65 पतझड़ देख चुके आदमी की है जो 15 वर्षो से भूंजा(पॉपकार्न) बेच रहा है लेकिन आज भी पेट-भर ही कमा पाता है।ठीक इतने ही समय में इसी देश के दो भाईयों का उधोग साम्राज्य कई गुणा बढ़ गया है और शासन के अनुसार देश भी विकास कर गया है। 
  
 मेरे लिए इंडिया उस झुग्गी में रहने वाले रणधीर की है जो अहले सुबह उठता तो है लेकिन स्कूल जाने के लिए नहीं बल्कि किसी चाय या होटल के बर्तन साफ करने के लिए।




  मेरे लिए इंडिया उस औरत की है जो कपड़े वहीं धोने को मजबूर है जहां बर्तन

   मेरे लिए इंडिया उस चाय पी रहे मजदूर की है जो चार रूपये की चाय पीकर अपनी भूख मिटाने को बेबस है और रोज गांव पैसे भेजने की चिंता उसे सताये जा रही है




  मेरे लिए इंडिया उस साईकिल मिस्त्री की है जो किसी मार्क्स या पूंजीवाद को नहीं जानता और उसकी विचारधारा रोटी तक सिमट गयी है।


  मेरे लिए इंडिया उस नबालिग लड़के की है जो अपने कंधे पर परिवार का बोझ डाले कहीं किसी शहर में ऑटो चला रहा है।

 मेरे लिए इंडिया उस बच्चे की भी है जो सड़क पर मिले जूते को पहन कर खुश है,भले उसके नाप का न हो।
मेरे लिए इंडिया उन भगवान के मंदिरों की है जो सड़को पर बने हैं और आने वाले समय में उन्हें भव्य बनाने की योजना है।
  

Saturday, December 24, 2011

जीने का नियम

उसने जीने के लिए खाना खाया
उसने खाने के लिए पैसा कमाया
उसने पैसे के लिए रिक्शा चलाया
उसने चलाने के लिए ताकत जुटायी
उसने ताकत के लिए रोटी खाई
उसने खाने के लिए पैसा कमाया
उसने पैसे के लिये रिक्शा चलाया
उसने रोज रोज नियम से चक्कर लगाया
अन्त में मरा तो उसे जीना याद आया
-
गोरख पांडे

Friday, December 23, 2011

एक कविता: युवा मन की


ये उजड़ने का मौसम,
टूट कर बिखर जाने का मौसम है,
यह वह मौसम है
जब क्रान्ति..क्रान्ति चिल्ला कर
मार्क्स को अपना नाना बता कर
दुनिया को बदलना भी है
और जे.एन.यू के किसी हॉस्टल में
दोपहर का भोजन 25 रूपये में पाकर
ठूंस-ठूंस खाना भी है...ताकि रात के खाने के पैसे बच सके
और बचे हुए पैसे से
कोई तीसरी दूनिया की पत्रिका खरीदी जा सके..
लेकिन अपने कमरे में देर रात इसी पत्रिका को पढ़ते-पढ़ते
जब पेट के अंदर की भूख जवाब दे देती है
तब कॉरपोरेटी मीडिया को गलियाते हुए
देर रात गंगा ढ़ाबा पर 4 रूपये के एक पराठे को
किसी लाल रंग के रस में डूबा-डूबा खाना भी है
और भूख को सांत्वना देते हूए
पढ़े हूए किसी उपन्यास के नायक के संघर्ष को याद करते हुए
कमरे पर लौटना भी है..
इस बिखड़ने के मौसम में भी
सच पूछो भगवान
पता नहीं तुम याद भी नहीं आते।

Thursday, December 1, 2011

बीच बहस में

मीडिया का चोचला या विपक्ष का टोटका
आजकल मीडिया में विपक्ष की संसद न चलने देने के कारण कड़ी आलोचना की जा रही है।संसद न चलने देने का सारा दोष विप

क्ष पर ही मढ़ा जा रहा है।
जबकि यह समझने की जरुरत है कि विपक्ष का काम ही सरकार के गलत निर्णयों का विरोध करना और संसद में इसका विरोध करना है। यदि विपक्ष अपनी सजग भूमिका नहीं निभाती है तो यह संसद के लिए ज्यादा खतरनाक होता।यह माना जा सकता है कि संसद की कार्यवाही को चलाने के लिए 1.5करोड़ रूपये एक दिन में खर्च होते हैं। लेकिन मीडिया में ऐसा दिखाया जा रहा है कि जनता के ये पैसे विपक्ष के गैर-जिम्मेदराना व्यवहार से किस तरह बर्बाद हो रहे हैं।

जाने-अनजाने
में मीडिया निश्चित तौर पर जनता में भ्रम की स्थिति पैदा करना चाह रहा है। वो संसद
में खर्च हो रहे पैसे के लिए चिंताकुल तो है।किन्तु, 20 करोड़ लोग जो असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं के भविष्य अधर में लटकने की चिंता नहीं है।
मीडिया की इस परेशानी को भी समझा जा सकता है।आज मीडिया जिस तरह से कॉरपोरेट दबाव में काम करने को मजबूर है।उससे इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। लेकिन जरूरत विपक्ष की भूमिका को फिर से परिभाषित करने की जिम्मेवारी भी करने की जिम्मेवारी भी इसी कॉरपोरेटी मीडिया पर है।

Tuesday, November 29, 2011

आम आदमी की सरकार का हाथ किसके साथ?


धन्य हो कांग्रेस सरकार
एफ1 रेस कराने के साथ ही यह बात पक्की हो गयी थी कि हमारी तथाकथित आम-आदमी की सरकार कैसे आम किसानों को ही इस पूरे व्यवस्था से बाहर धकेल देना चाहती है। और केवल किसान ही क्यूं अब तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले उन 20 करोड़ लोगों को भी हाशिये पर धकेलने की पूरी तैयारी केन्द्र सरकार ने कर ली है। विपक्षी दलों के विरोध के साथ-साथ खुद सरकार में सहयोगी दल और केरल काग्रेंस के विरोध के बावजूद केन्द्र सरकार इस जिद्द पर अड़ी हुई है कि खूदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत एफडीआई को इजाजत दिया जाएगा। सरकार की यह हठ समझ से परे है। आखिर वह कौन सी वजह है जिससे सरकार अपने हठ पर अड़ी हुई?
     सरकार इसके पक्ष में तर्क दे रही है कि इससे मंहगाई कम होगी और खूदरा क्षेत्र को नुकसान नहीं होगा। यह दलील भी समझ से परे है पिछली बार इसी मंहगाई के आड़ में सरकार ने खुदरा क्षेत्र में बड़ी पूंजी निवेश को इजाजत दी थी लेकिन आम लोगों को किसी तरह का राहत मंहगाई से नहीं मिला।
यह माना जा सकता है कि वालमार्ट जैसी कपंनियों के आने के बाद आम-उपभोक्ता को फौरी राहत मिल सकती है क्योंकि उनके पास बेतहाशा पूंजी है और बैंकों से उन्हें कर्ज भी आसानी से मिल सकता है। ऐसे में वो कुछ समय तक घाटे में रहकर भी अपना काम चला सकती हैं लेकिन उनके प्रतिद्वंदी छोटे-छोटे दुकानदार इस खेल से खूद बाहर हो जायेंगे। ऐसी स्थिती में खूदरा बाजार में उन बड़ी कंपनियों का एकाधिकार हो जाएगा। फिर वो अपने हिसाब से कीमतें तय करने को स्वतंत्र होंगे।
   सरकार दुसरा तर्क यह दे रही है कि छोटे-छोटे दुकानदार वालमार्ट जैसी कंपनियों के साथ हाथ मिलाकर खुद को बाजार में बनाए रख सकती हैं। यह तर्क अपने-आप में हास्यस्पद है। पहली बात तो इस बात को मान भी लिया जाए तो इन बड़ी कंपनियों से हाथ भी वही मंडी में बैठे बड़े-बड़े व्यापारी मिलायेंगे न कि हमारी गली का छोटा दुकानदार। दूसरी बात कि अगर ये बड़े व्यापारी हाथ मिलाते भी हैं तो उन्हें वालमार्ट के शर्तों पर ही ऐसा करना पड़ेगा।
   सरकार कह रही है कि यह निवेश केवल 53 शहरों में किया जाएगा। तो अगर मंहगाई कमने की बात सही है तो क्यूं नहीं इसे पूरे देश में लागू क्या जा रहा है? क्या केन्द्र सरकार खूद असमंजस में है? या फिर वो ये सब केवल डब्लू.टी.ओ के दबाव में कर रहा है?
सरकार का यह कहना भी सही नहीं है कि किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। क्योंकि कोई भी कंपनी प्रत्येक किसान के घर पर जाकर फसल नहीं खरीदेगी। वो भी ऐसा उन दलालों के माध्यम से ही करेगी। ,जो अभी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
यह भी खबर आ रही है कि अकेले वालमार्ट ने इस निवेश नीति बनाने के लिए की जा रही लांबिग में कुल 57करोड़ रुपये खर्च किये हैं।
वाह रे देश हित।
धन्य कांग्रेस सरकार।

Tuesday, August 30, 2011






तुम पूछती हो संघर्ष कहाँ है?




अक्सर कहते सुना है तुम्हे




"संघर्ष तो एक रूमानी कल्पना है मेरे मन की ।"




कैसे समझाऊ तुमको




संघर्ष किसी लाल झंडे की जागीर नहीं ,




न ही है वह किसी आन्दोलन की कापी राइट ,




संघर्ष तो गंगा ढाबा के पत्थरो पर दो अंधे जोड़े के कदम-कदम ठोकर खाकर चले जाने में हैं




संघर्ष जे.न.यु में इंकलाब गाने में नहीं,




जे.न.यु गेट पर खड़े ऑटो रिक्सा वाले में है




जो हर आने जाने वाले पर एक निगाह डालता है




और डी टी सी की ऐ.सी बसों को देख सहमत है,




संघर्ष गंगा ढाबे पर काम करने वाले उस छोटू में है




जिसके लिए बड़ी बड़ी किताबी ज्ञान का कोई मतलब नही,




संघर्ष झेलम होस्टल के किसी कमरे में व्यवस्था को कोसने में नहीं ,




सम्पूर्ण सत्ता परिवर्तन की बात करने में नही ,




इस व्यवस्था में जीते हुए , एस सत्ता से लड़ते हुए ,




हर उस आम आदमी में है जो एस व्यवस्था से लड़ता,पिसता,दबता है




फिर भी अपने अस्तित्व की लड़ाई को लादे जाता है,




जिए जाता है




संघर्ष देश के उतर-आधुनिक विश्विदालय में पढ़ने में नहीं




बल्कि यहाँ से पढ़ कर किसी-भी नोकरी में लग जाने में है,




संघर्ष लाल सलाम-लाल सलाम,हल्ला बोल -हल्ला बोल




कहने में नही




संघर्ष तो इस व्यवस्था में रहते हुए ,




अपने जीवन को बचा लेने में है,




जनता हूँ




कोई नयी बात नही बतला रहा तुम्हे




बचपन से सुनती आई हो तुम




"जीवन एक संघर्ष है"




मई भी यही समझा रहा हु तुम्हे




"संघर्ष ही जीवन है"





कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...