Thursday, January 31, 2013

पैदल आदमी ; रघुवीर सहाय

हाल ही में पाकिस्तानी सेना ने दो भारतीय सिपाहियों की हत्या कर दी. जवाब में भारतीय सेना ने भी दो मारे.दूसरी ओर राजनयिक और मीडिया युद्ध पैदा करने वाले बयान और खबर देते रहे. इसी बीच आज सुबह समकालीन जनमत में छपी रघुवीर सहाय की इस कविता पर नजर गई. लगा आप सबसे शेयर करना जरुरी है. युद्ध किसी के फायदे में नहीं होता- कम से कम आम सिपाहियों के हक में तो बिल्कूल नहीं..
अविनाश




जब सीमा के इस पार पड़ी थीं लाशें
तब सीमा के उस पार पड़ी थीं लाशें
सिकुड़ी ठिठरी नंगी अनजानी लाशें

वे उधर से इधर आ करके मरते थे
या इधर से उधर जा करके मरते थे
यह बहस राजधानी में हम करते थे

हम क्या रुख़ लेंगे यह इस पर निर्भर था
किसका मरने से पहले उनको डर था
भुखमरी के लिए अलग-अलग अफ़सर थ

इतने में दोनों प्रधानमंत्री बोले
हम दोनों में इस बरस दोस्ती हो ले
यह कह कर दोनों ने दरवाज़े खोले

परराष्ट्र मंत्रियों ने दो नियम बताए
दो पारपत्र उसको जो उड़कर आए
दो पारपत्र उसको जो उड़कर जाए

पैदल को हम केवल तब इज़्ज़त देंगे
जब देकर के बंदूक उसे भेजेंगे
या घायल से घायल अदले-बदलेंगे

पर कोई भूखा पैदल मत आने दो
मिट्टी से मिट्टी को मत मिल जाने दो
वरना दो सरकारों का जाने क्या हो

Wednesday, January 30, 2013

गांधी शब्द रह जाएगा, बस


30 जनवरी, सुबह से फेसबुक, ट्विटर पर कोई गांधी को श्रंद्धाजलि दे रहे हैं तो वहीं कुछ भगवा खेमे के लोग गांधी के हत्यारे गोडसे की याद में वीरता दिवस मना रहे हैं..इसबीच जे सुशील ने गांधी पर  जो कुछ लिखा है वो समय को थोड़ा करीब ला खिंचता है..फेसबुक और एक सौ चालीस शब्दों की दुनिया में गांधी भी एक शब्द बनने की राह पर हैं- गांधी के विचार..साहित्य के लिए यहां कोई जगह नहीं..फेसबुक से ही उठाया गया ये नोटः-



आज से पांच साल बाद जब लोग किताबें पढ़ना एकदम ही बंद कर देंगे और सारे अखबार पेड न्यूज़ अखबार हो जाएंगे. समाचार पढ़ने के लिए सिर्फ ट्विटर और फेसबुक और लिंक्डइन का इस्तेमाल होगा तब भी गांधी नाम के प्राणी के बारे में लिखा जाएगा..

तो तब 140 या उससे भी कम शब्दों में गांधी के बारे में क्या क्या लिखा जाएगा....


Gandhi is a gay ( #kallenbach papers)

Gandhi is a sexist (sex experiments of Gandhi)

Gandi was a terrorist. (#Al-qaeda)

Gandhi was a freedom fighter. (#freedomatlast)

Gandhi was a naked man, very poor. (#nude)

Gandhi was so poor that he cleaned his own toilet. (#poverty)

Gandhi was vegetarian but he ate meat once and he didn’t like it.(#vegetarian)

Gandhi was a Hindu and a Gujrati and a bania as well. (#gujratipride)

Gandhi is my favourite (#dontknowWhy)

I know Gandhi, He was on my Pocket money (#Pocketmoney.com)

Gandhi was contemporary of Hitler. (#Nazi)

Gandhi wrote too many letters and his handwriting was bad like mine. (#handwriting)

Gandhi was a Mahatma. Actually he was a saint. He lived in jungle. (#mahatma)

Gandhi’s full name Mohandas Karamchand Gandhi. He was related to the carrot chewing spy karamchandjasoos. (#spythriller)

Gandhi was a friend of Meerabai…or was it Meeraben.

Gandhi was a Bhajan singer. He sang Raghupati Raghav raja ram (#coolbhajans)

Gandhi was a Muslim. He supported Pakistan. (#pakistan)

I love Gandhi. He was friend of my great great Grandfather. They fought great grandfathers of my friend Billy. (#Oxfordmusings)

The last words of Gandhi’s were Jai Shri Ram (#HeyRam)

 अच्छा तो आपने पढ लिया...और आपको लग रहा है कि अभी भी यही सब लिखा जा रहा है तो क्या माना जाए कि लोगों ने पढ़ना बंद कर दिया अभी से ही.

ओह तभी महात्मा गांधी रुपयों में, संग्रहालयों में और सरकारी कार्यालयों में टंग कर मुस्कुराते रहते हैं. उनको पता है आने वाले समय में लोग पढ़ेंगे बाद में लड़ लेंगे पहले...

Tuesday, January 29, 2013

दरअसल कई बार एकतरफा होना बेहतर है।

दरअसल कई बार एकतरफा होना बेहतर है। कम से कम लगता तो ऐसा ही है। हालांकि, फैसला आपका होने के बावजूद सजा भी तो उतनी ही आपकी हो जाती है। पेंडुलम की तरह झूलते हुए हर पल कभी दिल, कभी दिमाग को छूकर लौटना किसी यातना की तरह ही तो है। जो अपके भीतर के ही किसी जेल में घट रही होती है। उस वक्त लगता है कि काश एकतरफा हुआ जा सकता। और यही सब चलता रहता है। अरसे तक। वक्त तक। और हम खुद को ऐसे ही नापते रह जाते हैं। तय न हुए किसी लम्हे तक।


अपने आप में चाहिए, नहीं चहिए की कई तख्तियां टंगी होती है। इन तख्तियों के इर्द गिर्द घूमते हुए कई बार आप चंदन से टकरा जाते हैं। सब उसे ‘गुनाहों का देवता’ बोलते हैं। यह समझ आ रहा होता है कि आप भी खुद को करना चाहिए की संभव सीमा तक धकेल रहे हैं। आप सोचते हो। उसे। खुद को। उसे। कि कितना पागलपन भरा है कुछ सोचना। ये भी कि मुझे कुछ नहीं सोचना। या मैं कुछ नहीं सोच रहा। उस वक्त आप महूसते हैं। एक मनोभाव, कुछ कदम, कई सारे शब्द उन आसुंओ जैसे हो चुके हैं जो गले में अटके हैं।
इन तमाम बातों जैसा वो दिन भी बावला था। मैं हर कुछ घंटों में देखती थी। मैं खुद को रोक नहीं पाती थी लास्ट सीन देखने से। (last seen today at 11:33 pm)। पता था हर बार देखने से और चिढ ही होनी है पर..। मैं वक्त बदलते देखते थी। वक्त मुझे। बहुत कुछ था जो मुझे नाप रहा था। मैं शायद यह देखना चाहती थी कि मैं इस समय को कैसे तय करती हूं। क्या बचा पाती हूं? क्या इकट्ठा कर पाती हूं? क्या जी पाती हूं? क्या छोड़ पाती हूं? मैं चाहती हूं कि बताऊं कि मैं उस दिन कहना चाहती थी कि ‘कैन आई हियर यू’। मैं चाहती थी किसी अननोन नंबर से तुम्हारी आवाज, हलो सुनना। बेशक दिवानापन है, था।  तुम याद कर सकते हो कि उस दिन क्या हुआ होगा? कुछ नहीं हुआ  दरअसल।
एक जिद थी जो भीतर लगातार पुख्ता हो रही थी। जो सिखाना चाह रही थी कि अपनों को जगह देना सीखो। उतनी जगह जिनमें वो एक गहरी सांस ले सकें। एक लंबी सांस जो अगली बार की एक लंबी डुबकी से पहले सीने में भर जाए। एक जगह जो खाली होने के बावजूद तुम्हारे भरोसे और प्यार से भर पाए। एक जगह जो इत्मिनान दे। जगह जो वक्त दे। एक जगह जो किसी को उसकी जगह दे। एक दूरी जो लौटा भी लाए उसे तुम तक। इस सब के बावजूद।
मेरी सारी तख्तियां कह रही थीं यह सब। वो समझा रही थीं। मैं समझ भी गई थी। लिखते लिखते समझ आ रहा है कि उस समय मैं भी एकतरफा हो ही गई थी। और ये भी कि एकतरफा होना आसान तो पता नहीं कितना पर बेहतर ही है।
 
साभार- शोभा के की-बोर्ड से (ब्लॉग मेरा जहां से )

Sunday, January 27, 2013

मुझको इतने से काम पे रख लो...


मुझको इतने से काम पे रख लो...
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

मुझको इतने से काम पे रख लो...

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दो
आह चुभता है ये अलग कर दो

मुझको इतने से काम पे रख लो....

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है

मुझको इतने से काम पे रख लो...

Gulzar

Friday, January 25, 2013

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं- गुलजार


हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं


एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है


एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है


फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है


‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!


आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है


साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!


हिन्दोस्तान उम्मीद से है..

''सबकुछ का एक दिन''


एक सूरज उगा है आज, किनारों को सुकून देता
धुएं से झांकता, विशाल झीलों के चेहरों का अभिवादन करता,
एक सहज सत्य फैलाता विशाल मैदानों में, रॉकी पर्वतों के पार
एक रोशनी, छतों को जगाती, हर छत के नीचे, एक कहानी
हमारी मूक भंगिमाएं कहती, खिड़कियों के पीछे जाते हुए.
मेरा चेहरा, तुम्हारा चेहरा,लाखों चेहरे सुबह के आईने में,
जम्हाई से जीवन में उठते, दिन में बढ़ते अपनी ऊंचाई तक:
पेंसिल सी पीली स्कूल बसें, ट्रैफिक लाइटों की लय,
फलों के ठेले: मौसम्मी और संतरे इंद्रधनुष की तरह सजे
हमसे तारीफ मांगते. चांदी रंगों की भारी ट्रकें- लदी कागज़ या तेल से- ईंट या दूध से, हाईवे पर जगमगाती हमारे साथ,
हमारे रास्ते में मेजें साफ करने को, पर्चियां पढ़ने को, या
ज़िंदगियां बचाने को- ज्यॉमेट्री पढ़ने को, या राशन पानी लाने को जैसे मेरी मां लाती थी बीस साल तक
ताकि मैं ये कविता लिख सकूं.
हम सब ज़रुरी हैं उस एक रोशनी की तरह जो हमसे गुज़रती है,
वही रोशनी जो ब्लैकबोर्ड पर दिन का सबक पढ़ाती है:
समीकरण सुलझाने का, इतिहास पर सवाल उठाने का और परमाणुओं की कल्पना का, कि ‘‘ मेरा भी एक सपना है’’
हम सपने देखते रहते हैं,
या वो दुख की नामुमकिन शब्दावली जो ये नहीं बताएगी कि
बीस बच्चों की डेस्क खाली क्यों हैं जो गैरहाज़िर हैं आज
और हमेशा, हमेशा के लिए. कई प्रार्थनाएं, लेकिन एक रोशनी
शीशे की खिड़िकियों में रंग भर देती हैं, कांस्य प्रतिमाओं में जान डाल देती है, गर्माहट भर देती है हमारे संग्रहालयों की सीढ़ियों पर और हमारे पार्कों की बेंचों पर
जहां मांएं बैठ कर अपने बच्चों को दिन में फिसलते देखती हैं.
एक खेत, हमारा खेत, हमें जोड़े रखता है हर तने से
मकई के, हर उस गेंहूं की बाली से जिसे पसीने और हाथों ने
बोया है, हाथ कोयला बीनते या बनाते पवनचक्कियां
मरुस्थलों में और पहाड़ियों पर जो हमें गर्म रखते हैं, हाथ
जो गड्ढे खोदते, पाइप बिछाते और केबल डालते हैं, हाथ
जैसे मेरे पिता के हाथों की तरह कटे फटे,
जो गन्ने काटा करते थे
ताकि मेरे भाई को और मुझे किताबें और जूते मिल सकें.
धूल खेतों की और रेगिस्तान की, शहरों की और मैदानों की
एक ही हवा में फैलती-हमारी सांस में. सांसें. सुनो इसे दिन भर
चिल्ल पों करते कारों की सुहावनी आवाज़ों के बीच,
बसें जो उतरती हैं पेड़ों से ढकी सड़कों पर, कदमों की आवाज़ों का संगीत, गिटारों और सबवे की चीखों के बीच,
अपने कपड़ों के तार पर चिड़िया का गाना जिसकी उम्मीद नहीं होती.
सुनो: खेल मैदानों में झूलों की चरमराहट, ट्रेनों की सीटियां,
या कॉफी टेबलों के बीच की फुसफुसाहट, सुनो: दरवाज़े जो हम खोलते हैं हर दिन एक दूसरे के लिए, कहते हैं: हैलो, सैलोम,
ब्योन ग्योरनो, हाउडी, नमस्ते, या ब्यूनोस डायस
उस भाषा में जो मुझे मेरी मां ने सिखाई है- हर भाषा में
बोलती उस एक हवा में जो हमारी ज़िंदगी को ढोती है
बिना किसी पूर्वाग्रह के, जैसे ये शब्द निकल रहे हैं मेरे होठों से.
एक आकाश: अपालाचियन और सियेरा ने जिसकी बादशाहत पर दावा किया था, और मिसीसिपी और कोलोरेडो ने अपना रास्ता बनाया था समुद्र तक. शुक्रिया करो अपने हाथों की उपलब्धियों का वक्त रहते:
जो स्टील से पुल बुन देते हैं, एक और रिपोर्ट पूरी करते हैं
अपने बॉस के लिए, एक और घाव सिलते हैं
या यूनीफॉर्म, किसी पेंटिंग पर ब्रश की पहला स्पर्श
या फ्रीडम टावर का आखिरी तल
आकाश में प्रवेश करता जो हमारे लचीलेपन का नतीज़ा है.
एक आकाश, जिधर हम कभी कभार आंखें उठा के देखते हैं
थक कर काम से: किसी किसी दिन अपनी ज़िंदगी के मौसम
का अंदाज़ा लगाते हुए, किसी दिन शुक्रिया करते उस प्रेम का
जो बदले में प्रेम देता है, कभी तारीफ करते हुए मां की
जो जानती है कि देना कैसे है, या माफ करते पिता को
जो वो नहीं दे पाता जो आप चाहते हैं.
हम घर की तरफ चलते हैं: बारिश में भीगे या बर्फ से भारी,
या गोधूलि की पकी-लालिमा में, लेकिन हमेशा- घर,
हमेशा एक आकाश के नीचे, हमारा आकाश. और हमेशा एक
चांद जैसे कि मूक नगाड़ा थाप दे रहा हो हर छत पर और
हर खिड़की पर, एक देश के- हम सभी-
सितारों को देखते
उम्मीद- एक नया तारामंडल
इंतज़ार कर रहा है हमारा कि हम उसे माप लें
इंतज़ार कर रहा है हमारा कि हम उसे नाम दें-
एक साथ मिल कर.

कवि रिचर्ड ब्लैंको
(अंग्रेज़ी से अनुवाद सुशील झा)
sabhar- bbchindi.com

Monday, January 21, 2013

किताबें झाँकती हैं ; गुलज़ार


किताबें झाँकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाक़ातें नही होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थी 
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के परदे पर 
बड़ी बैचेन रहती है किताबें 
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

जो ग़ज़लें वो सुनाती थी कि जिनके शल कभी गिरते नही थे
जो रिश्तें वो सुनाती थी वो सारे उधड़े-उधड़े है
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े है
बिना पत्तों के सूखे टूँड लगते है वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मानी उगते नही है

जबाँ पर ज़ायका आता था सफ़्हे पलटने का 
अब उँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुज़रती है
बहोत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
क़िताबों से जो ज़ाती राब्ता था वो कट-सा गया है

कभी सीनें पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रहल की सूरत बनाकर 
नीम सज़दे में पढ़ा करते थे 
छूते थे जंबीं से 

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी
मगर वो जो उन क़िताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रूक्के
क़िताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने जो रिश्ते बनते थे
अब उनका क्या होगा...!!

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...