Friday, April 11, 2014

हर रोज खुद को राख में बदलते चले हम

कबीर के राम याद आ रहे हैं

"हमें समय-समय पर अनेक ‘वादों’ और आदर्शों ने उम्मीदें दी थीं, जिन पर ठिठुरते हुए हमने अपने हाथों को सेंका था। आज उनके कोयले मद्धिम हो चले हैं, सिर्फ राख बची रह गयी है जो फूँक मारने से कभी दायीं तरफ जाती है, कभी बायीं तरफ- जिस दिशा में जाती है हम उस तरफ भागते हुए कभी दक्षिणपंथी हो लेते हैं, कभी वामपंथी। लेकिन राख राख है, उसके पीछे अधिक दूर नहीं भागा जा सकता है। आखिर में अपने पास लौटना पड़ता है।
ऑस्ट्रियन लेखक और पत्रकार कार्ल क्रौस ने एक बार कहा था, “मनुष्य को अन्त में वहीं लौटना पड़ता है, जहां से वह शुरू होता है- इसी में उसकी सार्थकता निहित है।”
इस शुरू को पकड़ने के लिए हमें सदैव अपनी स्मृति और भाषा की अँधेरी जड़ों में रास्ता टटोलना होगा"।

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निर्मल वर्मा

पढ़ते-पढ़ते निर्मल वर्मा के लिखे इन शब्दों तक पहुंच गया। नहीं, नहीं।  मैं किसी निराशा में नहीं। न ही विचारधाराओं से मोहभंग तक पहुंचा हूं लेकिन कुछ है जो पिछले कुछ दिनों से मथ रहा है।
शायद इसलिए निर्मल के इस लिखे में खुद का भविष्य भी देख रहा हूं। डर रहा हूं।


कई चीजें चल रही है भीतर। विचारधारा, विचाराधारा की दुकानदारी। मैं किसी पर सवाल नहीं उठा रहा, खुद को ही कटघरे में खड़ा कर रहा हूं।


हर रोज एक ऐसी दुनिया देखता हूं जहां निराशा, हताशा, मजबूरी के सिवा और कुछ नजर ही नहीं आता।

लेकिन कुछ रोज ऐसा भी आता है जब अचानक से सामने एक भयानक रौशनी में नहलायी दुनिया आ खड़ी होती है।
उसका सामना करना मुश्किल नहीं होता, जितना लौट कर इस अँधेर दुनिया में आना और वहां की स्मृति को समेटे रखना।


सोचता हूं कुछ दिन परमानेंट यहीं रह जाऊं। सिंगरौली।
दिल्ली को स्थगित करना जरुरी है।

कबीर के राम को पढ़ रहा हूं। शायद कुछ अदृश्य-सा मिल जाय......

Thursday, April 10, 2014

दो साल और इत्ता कुछ

(बहुत मजेदार नहीं है, इसको नहीं भी पढ़ा जा सकता है)


9 अप्रैल, 2014। दो साल हुए। नौकरी करते। हर महीने घर से पैसे नहीं मंगवाते। हर महीने की पांच तारीख को एटीएम पर जा पैसे का इंतजार न करते। दो साल भी एक-एक साल में बंटा। शुरुआती एक साल रिपोर्टर की नौकरी करते गुजारी तो दूसरे साल शहर-गांव-कस्बों में घूमते हुए जंगल बचाओ, जंगल बचाओ चिल्लाते।



शुरूआत के एक साल। हमारा दिन गुजरता जाता है, जिन्दगी की गाड़ी बढ़ती जाती है और गुजरे हुए की याद भी मिटती जाती है। दिमाग का इरेजर अगर काम न करे तो न जाने कितनी चीजें अटकी-फंसी रह जाये। तो वो शुरूआती एक साल एक रुटिन वर्क का हिस्सा ही लगता है मुझे।
सुबह के 11 बजे अपने दफ्तर पहुंच जाना। रुटिन आईडिया लिखकर फोल्डर में सेव करना और फिर निकल पड़ना कुछ खबरों की तलाश में। कभी प्यार कभी गुस्सा और कभी हल्का-सा डर पैदा कर  अफसरों, चपरासियों, क्लर्कों, छपास रोग से पीड़ित शहर के माननीयों से खबरे निकलवाने का सिलसिला। गाहे-बगाहे बाइलाइन खबर। कभी रुटिन वर्क में भी बाइलाइन तो कभी स्पेशल स्टोरी में भी अपना नाम नदारद देखने से हमारी खुशी और सफलता तय हो जाती जबकि सच्चाई है कि अखबारों में बाइलाइन आपके डेस्क के सीनियरों से रिश्ते तय कर दिया करते हैं।



मुझे लगता है। शायद खुद को ओवर करके आंक रहा हूं। मेरे कलीग और कमलेश सर बेहतर बता पायें। लेकिन महीने-दो महीने के भीतर ही नगरपालिका का चुनाव कवर करते-करते, जनता से संवाद कार्यक्रम के बहाने तेजतर्रार रिपोर्टर की पहचान बना ही ली थी ऑफिस के भीतर।



पहले पहल तो कोई बीट ही नहीं मिली। जहां भी किसी डेली असाइनमेंट में भेजा जाता हम तीनों-चारों साथ ही हो लेते। हम मतलब- मैं, नेहा, सरोज और रिमझिम। आईआईएमसी से बाहर निकल कर हमारे बीच जो मजबूत रिश्ता बना वो आज भी मुझे लगता है कम-से-कम बची तो है ही। एक ही धंधे में रहते हुए अपने समकालीनों से रिश्ते बेहतर हालत में बची रहे यही खुद को शाबासी देने के लिए कोई छोटा बहाना थोड़े न है।


और जब हमें बीट मिली भी तो क्या- स्पोर्ट्स। क्लचरल, रेलवे, हेल्थ, एजुकेशन कुछ नहीं बचा था मेरे लिए तो उठाकर खुद ही पटक लिया खुद को इस बीट में।
बिहार में भले स्पोर्ट्स रिपोर्टिंग का स्कोप बहुत न हो लेकिन पटना के खेल पत्रकार खुद को दूसरों के मुकाबले थोड़े ऊंचे दर्जे का जरुर समझते हैं। भले दूसरे बीट के लोग स्पोर्ट्स वालों को भाव दे या न दे।


तो कैसे हो? दिमाग इन्हीं सवालों में उलझा था कि हर एक खेल पर रिपोर्टिंग शुरू करो। अगर अच्छे की रिपोर्टिंग नहीं हो सकती तो बुरा क्यों है इसी पर शुरू हो जाओ- कहते हुए संपादक केके सर ने मामले को सुलझा ही दिया।


बिहार का एक अखबार। अखबार हिन्दुस्तान। और अखबारी दुनिया का वो समय जब नीतीश शासन काल में मीडिया का आपातकाल घोषित किया जा चुका हो। शुरू हुई यात्रा। बीच में सरोज-अविनाश नाम से छपे कुछ एकाध दर्जन रिपोर्ट को जानबुझकर स्किप कर रहा हूं क्योंकि डर है कि कहीं सरोज को नागवार न गुजरे। करीब दो साल की अटूट दोस्ती के बाद हमारे रिश्ते में फिलहाल एक ठहराव आ गया है। हम दोनों उस ठहराव को वहीं छोड़ आगे बढ़ चुके हैं लेकिन सच बात तो है कि दोनों ने मिलकर खूब स्टिंग किए, खूब घूप में खड़े हुए और खूब माथा पच्ची खबरों के पीछे भी करते रहे।



खैर, थोड़ा बोर कर रहा हूं। इत्ता लंबा लिखने का मन नहीं था। इन सोर्ट बोलूं तो शुरुआत के एक साल में मिले कुछ दोस्त, कुछ खेल से जुड़े लोग जो अभी भी फोन कर-कर मिस करते रहते हैं, कुछ रिपोर्ट्स जिन्हें किसी को दिखाने में अच्छा लगता है कि देखो मुख्यधारा में रहते हुए, स्पोर्ट्स जैसे बीट पर भी जनसरोकारी खबरें कर पाया मैं (थोड़ा आत्ममुग्घ साउंड करने के लिए सॉरी)



पिछले एक साल से आदिवासियों के बीच। जंगल-जमीन बचाने के अभियान में लगा। न जाने कितने रिपोर्ट्स लिखे, कितने पन्ने बर्बाद किए। लड़ाई अभी भी जारी है। जंगलों को, आदिवासियों को दिल्ली में बैठे बहसों-सेमिनारों से इतर सामने से देखने-समझने का मौका मिल रहा है। बीच-बीच में कई शहरों को भी जानने का सो अलग।




किस्सा बहुत लंबा है। ज्यादा लिख नहीं पा रहा। (एक खास बात है, मुझे लग जाता है कि मैं अच्छा नहीं लिख रहा हूं। यहां भी लग रहा है। इट्स नॉट सो इंटरेस्टिंग। इसलिए इस पोस्ट को यहीं  बीच में ही खत्म कर रहा हूं।)

Monday, April 7, 2014

इत्ती सी हँसी, बड़ी सी उम्मीद

बेफिकरी भरी स्माईल
 महान का एक जंगल है। हजार हेक्टेयर में फैला। वहां महुआ है, तेंदू है और है करीब 164 प्रजाति के पेड़-पौधे, जड़ी-बुटी। करीब 54 गांवों के 85000 लोग बसते-रचते हैं इसी महान जंगल पर। आजकल इन जंगलों पर साया मंडरा रहा है।
कभी-कभी आँखे भी हंसती हैं
 साया न भूत का न प्रेत का। उस मुए कंपनी का। कंपनी महान कोल लिमिटेड को सरकार ने महान जंगल कोयला खदान के लिए दे दिया है। जंगल कटेगा, लोग उजड़ेंगे। विस्थापन, पलायन, मजदूरी, मजबूरी, हताशा, गुस्सा और आंदोलन।

देखो तो, मेरी तस्वीर लेता है



बचपन में हमारा मन भी नंगा होता है
गांव के लोग संगठित हो रहे हैं। बना लिया है महान संघर्ष समिति। महान जंगल को बचाने के लिए महान संघर्ष समिति।
अब लोग नारा लगाते हैं- लड़ेंगे, जीतेंगे।
जंगल हमारा आपका नहीं किसी के बाप का।



लोगों में उम्मीद है, बच्चों में उम्मीद है। इसलिए इनकी हँसी बनी हुई है। सारी साजिशों को नकाम करती मुस्कान।

उन्हीं चंद मुस्कान को क्लिक किया है मेरे कैमरे ने।

उम्मीद, नये सपने, प्रेरणा, एकता, संघर्ष की सफलता को समेटे कुछ हँसी।
मैं भी हंसता हूं कर लो कैद






इस हँसी को समेटे है-
बुधेर गांव का आदिवासी बच्चा।
बूढ़ी अम्मा, छोटी सी बच्ची और 
किशुन दयाल सिंह जी - महान संघर्ष समिति के सक्रिय कार्यकर्ता।


इनकी लड़ाई को सलाम, इनकी हँसी को सलाम।

जिन्दाबाद

Saturday, April 5, 2014

जी हां, ये गीत बेचते हैं

अपनी टोली के साथ देवेन्द्र विश्वकर्मा
पिछले दिनों सोनभद्र के हेडक्वार्टर  रॉबर्ट्सगंज में देवेन्द्र विश्वकर्मा मिल गए। अपनी मंडली के साथ। मिर्जापुर के पास के रहने वाले देवेन्द्र का पूरा गांव गाना-बजाना करता है। लगभग घूमंतु किस्म की इनकी टोली यूपी-बिहार और राजस्थान तक चली जाती है गाते-बजाते।
देवेन्द्र बताते हैं कि उनका ये पुश्तैनी धंधा है। लोग भले उन्हें इज्जत से न देखते हों लेकिन देवेन्द्र को अपने काम से बहुत प्यार है। उत्साह से बताते हैं कि हमारा पूरा गांव दूसरा काम नहीं करता है। हम अपने बच्चों को स्कूल भेजने की बजाय संगीत की शिक्षा देते हैं।
कितना कुछ बदल गया है? मेेरे पूछने पर देवेन्द्र कहते हैं कि हमारे से पहले की पीढ़ी तक के लोगों को मान सम्मान ज्यादा मिलता था।
लेकिन अब फिलिम के आने के बाद सबकुछ बदल गया है।
लोक गीत भी गाते हैं ?
देवेन्द्र की टोली ने बेहतरीन निर्गुण गीत गाकर सुनाया। लोक के रंग में बसा हुआ। जाते-जाते कह गए- आप जैसे लोग बहुत कम हैं जो लोक गीत का फरमाईश किए हैं। यहां तो अब फिलमी गजल चलता है और अब तो भोजपुरी का डिमांड बढ़ गया है।

अश्लील गानों के शोर में लोक गीत का स्वर कहीं गुम सा गया है।

Tuesday, April 1, 2014

फेसबुक डराता है

मैक्सिको सिटी की एरेंडी एलिजाबेथ रगुतिएरेज को जब यह पता चला कि उसकी बेस्ट फ्रेंड एनेल बेज ने दोनों की न्यूड फोटोग्राफ्स सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपलोड कर दी है, वो गुस्से से पागल हो गई। एरेंडी ने बेज से कहा कि अगर वो इस साल के अंत तक जीवित रह पाई तो लकी होगी। बेज ने इसे मजाक में लिया और उसे सुलह के लिए मैक्सिको के गुआमुचिल स्थित अपने घर बुलवाया।
लेकिन एरेंडी इतनी नाराज थी कि उसने ब्रेज को उसके घर में ही 65 बार चाकू घोंप कर मार दिया। फिलहाल एरेंडी को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

बेज और एरेंडी की ये कहानी किसी अनचाहे की शुरुआत का आहट भर है। बेज और एरेंडी जो सिर्फ 16 साल की लड़की थी। नाबालिग। नये-नये सपनों को देखने की उम्र में दोनों ने खुद को खत्म कर लिया। हमारे समाज में फिलहाल फेसबुक इस हद तक शायद नहीं पहुंचा हो लेकिन हर रोज कुछ न कुछ ऐसी खबरें आती दिखती हैं, जहां फेसबुक की वजह से लोगों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं।
फेसबुक। माने लोगों को मिलवाने का एक जरिया। अपने व्यस्त जिन्दगी से कुछ समय निकाल-हंसने-बोलने और थोडी सी भड़ास निकालने का एक कोना।
लेकिन इन घटनाओं की आहटें बता रही हैं कि मामला इतना भर ही नहीं रह जायेगा। दरअसल फेसबुक की डोर हमारे हाथ से छूट चुकी है।
मिलना-मिलवाना खत्म। अब उसके बायप्रोडक्ट आने शुरू होंगे।

तैयार रहिये। हो सकता है -हमारा-आपका कोई दोस्त छूटने वाला हो फेसबुक की वजह से। चौबीस घंटे साथ रहने के बाद की उबन का बहुत कुछ रिजल्ट आना अभी बांकि है।

Thursday, March 27, 2014

इलेक्शन वाया रोड डायरी से कुछ फूटनोट्स




रोड डायरी से कुछ फूटनोट्स

पिछले 15 दिनों में करीब चार राज्यों में जाने का मौका मिला। फिलहाल पांचवे राज्य मध्यप्रदेश में बैठ कर उन अनुभवों को समेटने की कोशिश कर रहा हूं जो गांव-गांव, शहर-दर-शहर भटकने के बाद समझा है। इन अनुभवों में मैंने ज्यादा से ज्यादा चुनावी समीकरणों को समझने की कोशिश की है, सैकड़ों लोगों से बात करने की कोशिश भी। संयोग से ये अनुभव हाइवे पर चाय बेचने वाले ढाबे, तारी बेचने वाले पासीखाने से लेकर हवाई जहाज में सफर कर रहे लोगों तक फैल गया है।
चुनाव 2014 मेरे लिए खास है। पांच साल पहले हुए चुनाव के समय मैं ग्रेजुएशन में था। कॉलेज में अजीब-अजीब सपने देखने में लगा था। चुनाव को इतने करीब से देखने का मौका नहीं मिल पाया। ये चुनाव कई मायनों में खास है। अब लड़ाई कांग्रेस-बीजेपी के साथ-साथ आप पार्टी के हाथ में चली गयी है। ढ़ेर सारे लोगों से बात करने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये चुनाव सांप्रदायिकता के मुद्दे पर ही लड़ी जा रही है। लोगों के बीच धर्म को लेकर बेहद गहरी खाई पैदा करने की कोशिश की जा रही है। नरेन्द्र मोदी जैसे कम्यूनल फेस चाहे लाख विकास के झूठे नारे उछाल लें लेकिन असली कार्ड वो हिन्दुत्व वाला ही प्ले करने की कोशिश में लगे हैं।
मेरे यात्रा की शुरुआत हुई- बिहार से। कहते हैं दिल्ली का रास्ता बिहार-यूपी से होकर ही जाता है। शायद यही वजह है कि राहुल-केजरीवाल-मोदी तीनों बिहार-यूपी से चुनावी मैदान में कूद कर वैतरणी पार करना चाह रहे हैं। करीब-करीब चार सौ किलोमीटर बाइक से बिहार की सड़कों पर दौड़ने के बाद कुछ चीजें बहुत क्लियर हुई हैं, जो शायद ही मीडिया मुझे कभी बता पाए।
मोदी की लहर बिहार में है तो सही लेकिन सिर्फ और सिर्फ अपर कास्ट तबके में। रामविलास पासवान की पार्टी के एक नेता हैं, होदा साहब। दरभंगा के रहने वाले। पटना में मिल गए। कहते हैं- नीतीश का वोट बैंक साइलेंट है। हवा-अफवाह तो अपर कास्ट वाले बनाते हैं। वैशाली के एक तारी खाने में जब देवेन्द्र दास मुझे समझाते हैं कि- हमलोग पिछड़ा जात वाले सबको बोलते हैं-हां, देंगे वोट तुम्हीं को। लेकिन वहां जाकर वोट तो नीतीश को ही देंगे। तो मुझे वहां होदा साहब की साइलेंट वोटबैंक वाली बात याद आती है। नीतीश को हल्के में ले रहे चुनावी मीडिया विश्लेषक शायद उसके इस साइलेंट वोट बैंक को इग्नोर करने की गलती कर रहे हैं।
कोई भी पार्टी संगठन हो अपने आम कार्यकर्ताओं के भावनाओं के साथ खेलने का काम ही करते हैं। होदा साहब धर्म से मुस्लिम हैं। रामविलास पासवान के मोदी के साथ जाने से दुखी हैं लेकिन पार्टी नहीं छोड़ना चाहते- आठ साल का मोह है-ऐसे नहीं छूट पायेगा पार्टी हमसे। बाद में रामविलास की मजबूरी समझाने लगते हैं। मैं उनकी मजबूरी समझने लगता हूं।
पटना में है-दरोगा राय पथ। बिहार के माननीय विधायकों का रिहाईशी इलाका। वहां पप्पु जी हैं। जितनी मेरी होश संभालने की उम्र है उतने साल से उन्हें वहां चाय बेचते देख रहे हूं। मोदी के बारे में पूछने पर  हंसते हैं- कहते हैं, तुम तो ललका झंडा से थे, मोदी के बारे में काहे पूछ रहे हो। हंसी के बाद अचनाक गंभीर हो जाते हैं- मोदी आया था यहां रैली करने। सुनने में आता है- 50 करोड़ रुपया खर्च हुआ उसके रैली में। भर रैली अपने को चाय बेचने वाला बताता रहा। कभियो नहीं जान पायेगा इ मोदी कि चाय बेचने वाला का दर्द का होता है। पचास करोड़ के मंच पर चढ़ कर उ चाय दुकानदार का दर्द बेच रहा है। चीनी मंहगा हो गया, चायपत्ती भी। दूध आठ रुपये किलो से 40 रुपये किलो मिलने लगा। और चाय का दाम वहीं का वहीं रह गया- चार रुपया-पांच रुपया। कभियो सुने हैं मोदी को इ सब बोलते। उसको तो हमरा दर्द बेचने से मतलब है, हमारे दर्द से नहीं

बिहार के नेशनल हाइवे 28 पर सुबह के सात बजे।  समस्तीपुर के आसपास का इलाका। एक ढाबेनुमा चाय दुकान पर हम अपनी बाइक रोकते हैं। एक अधेड़ उम्र के बाबा। किसका हवा है- पूछते ही बोलते हैं- मोदी का। काहे? ‘नीतीश सिर्फ गरीबों ( दलितों) के लिए काम किया है। हम किसानों को गरीब लोग भाव देना बंद कर दिया है। खेती के लिए मजदूर तक नहीं मिलता है। एक चाय वाला गरीबों की भलाई पर गुस्सा हो रहा था। ये अद्भूत सीन था मेरे लिए। मैं न चाहते हुए भी चलते-चलते उनसे उनकी जाति पूछ बैठता हूं- भूमिहार।
मार्क्स का क्लास स्ट्रगल इस देश में अभी बहुत दूर की चीज है- बाइक स्टार्ट करते-करते मैं अपने साथ वाले से कहता हूं।
आगे हाइवे 28 से कटकर पटना के लिए स्टेट हाइवे की सड़क है। हम अपनी बाइक उस तरफ मोड़ देते हैं- हाजीपुर से पहले एक गांव है हरपुर। हमारी बाइक एक पासीखाने में रुकती है। किसकी हवा है’?
काहे बतायें किसकी हवा है। भोट-भाट (वोट) की बात पासीखाने में बैठकर नहीं की जाती। सवाल थोड़ा जल्दी पूछ लिया लेकिन कुछ देर गांव-जहान की बात करते-करते सभी वोट और राजनीति की बात ही करने लगते हैं।
पासीखाने का मालिक पासवान जाति का है। हाजीपुर रामविलास पासवान का गढ़। लेकिन पासीखाने का पासवान मालिक इस बार रामविलसा को वोट नहीं करेगा। उ पासवान के लिए कुच्छो नहीं करता है, हर बार जीत कर शादी कर लेता है। नीतीश रेडियो दिया है, सुरक्षा दिया है, सड़क दिया है। अस्पताल टाइम से खुलता है। हां, डॉक्टर रोज नहीं बैठता हैतो क्या नीतीश रोज आएगा चेंकिग करने- एक उसकी बात को काटता है। बांकि नयका लड़का में मोदी का हवा है- सुरज दास बोलता है तो बीच में ही बात को काट कर एक बूढ़ा कहता है- इ नयका सब अगड़ा जाति का आत्याचार नहीं देखा है। इसलिए कमल को भोट देने का बात करता है। कमल को भोट देना मतलब उपरका जात के चूतड़ सहलाना। या तो नीतीश और न तो लालू। तीसरा किसी को वोट नहीं- न कांग्रेस, न बीजेपी
अगला पड़ाव- बिहार की राजधानी पटना। फिर एक चाय वाला। मोदी के चाय ब्रांड ने मीडिया वालों से लेकर चुनावी विश्लेषकों तक में चाय वाले की डिमांड बढ़ायी है। मोदी छाप का टीशर्ट पहने- राजेश। मोदी को वोट करेंगे?’ नहीं, केजरीवाल को। काहे कि सब नेतवा चोर हो गया है-मोदी-नीतीश-लालू एक्के थैली के चट्टा-बट्टा है
तो फिर इ मोदी वाला टीशर्ट काहे पहने हैं?’  उ तो रैली में गए थे न सर। वहीं मिला था। टीशर्ट पहनने से भोट थोड़े न खरीद लिया है हमरा
मैं पटना से दिल्ली जाने वाले एयर इंडिया की फ्लाईट में बैठा हूं। अमूमन हवाई जहाज में मुझे कोफ्त होती है कि कोई एक-दूसरे से बात क्यों नहीं करता। लेकिन मैं हूं कि अपनी लंपटई से बाज आने का मन ही नहीं होता। साथ वाले से पूछता हूं- दिल्ली जा रहे हैं’?  नहीं, सउदी  गोपालगंज से सउदी की उड़ान। नीतीश को वोट करेंगे? ‘ नहीं। कुच्छो नहीं किया नीतीशवा। फिर?  लालू। अबकी लालू को भोट जाएगा। आखिर कब तक उड़-उड़ कर कभी दिल्ली तो कभी सउदी जाते रहेंगे। हमको भी घर पर रहना है, अपना गांव, अपना परिवार के साथ

खामोशी। हमारे बीच दिल्ली तक खामोशी है। जाते-जाते बस चलता हूं कह सका। दरअसल ज्यादातर बिहारी विस्थापित हैं। हम बिहारियों के विस्थापन को कई दर्ज नहीं करता। हम आपस में ही बांटते हैं- हमें विकास के लंबे-लंबे वादे नहीं चाहिए। एक अदद नौकरी चाहिए- अपने घर, गांव में। जिससे ठीकठाक गुजर बसर हो सके हमारा। खामोशी।
देश की राजधानी। दिल्ली के ऑटोवालों का सुर बदला-बदला सा है। जो कल तक केजरीवाल-केजरीवाल गा रहे थे। आज मोदी-मोदी कह रहे हैं। केजरीवाल ने सीएम की कुर्सी छोड़कर अच्छा नहीं किया। हमारी परमिट से लेकर ठेके पर बहाल मजदूरों के परमानेंट तक के मुद्दे को छोड़ भाग गया- एक लोकपाल ही तो था। थोड़े ठंड रख लेता- कुछ दिन बाद पास करवाता। जाने से पहले हम गरीबों-मजदूरों की भलाई का काम कर जाता। लेकिन नहीं, इ तो व्यवस्था पर हमला करते-करते व्यक्ति पर हमला करने लगा। क्या मतलब था इसको मोदी से। पहले दिल्ली को सुधार लेता फिर निकलता देश को सुधारने। ठीक नहीं किया। हमारे विश्वास को धक्का मारा है। अब तो नहीं भोट देंगे सर
मैं बस हां-हूं करता हूं। दिल्ली के ऑटोवाले बहुत वोकल हैं। उनसे सिर्फ सुनता हूं, वहां ज्ञान लेने की जरुरत महसूस होती है, देने की सोचता भी नहीं।
हरिद्वार उत्तराखंड में। एक ढाबा। इस बार तो हर-हर मोदी है बाबू। हिन्दु धर्म को इ कांग्रेस वाले बेच रहे हैं तो बचाना पड़ेगा न। मैं बताता हूं- कांग्रेस भी तो साधुओं का खूब ख्याल रखती है, सोनिया गाहे-बगाहे अचार्यों से मिलने जाती ही हैं
न, कभी नहीं,- वो तो देखो बेचारे रामदेव बाबा को कैसे दौड़ा-दौड़ा के पिटवाया था। बीच में ही एक दूसरा साधु टोकता है- नहीं सही कह रहे हैं, बाबा रामदेव हमारे समाज का नहीं है, उ साधु नहीं व्यापारी है। हमलोग अघौड़ी हैं- लेकिन वोट इस बार मोदी को ही जाएगा। ब्लाइंट सपोर्टर। मेरी एक साथी मुझसे बोलती है।

मैं वापस लौट रहा हूं। दिल्ली टू वाराणसी। ट्रेन शिवगंगा एक्सप्रेस। मेरे साथ वाले बोगी में अरविंद केजरीवाल भी अपनी पूरी टीम के साथ सफर कर रहे हैं। मीडिया और लोगों की भीड़। मीडिया बारबार अगेंस्ट केजरीवाल सफर कर रहे लोगों से बाइट लेने में व्यस्त है। और लोग अरविन्द केजरीवाल की फोटो खिंचने में। एक इवेंटफूल जर्नी मेरे साथ सफर कर रही एक अंग्रेजी अखबार की एडिटर कहती हैं। बोगी के दूसरे यात्री बीच-बीच में जाकर एकबार केजरीवाल को देख आते हैं- नमस्ते। एक फोटो। एक मेरे बच्चे के साथ फोटो। लौट कर वही लोग केजरीवाल भगोड़ा है कह रहे हैं। रास्ते भर मोदी-केजरी ही छाये रहे। वोट बैंक। मोदी शेर की तरह गरजता है। मोदी में आग है। (यहां जलना किसको है भाई)
एक डिसेंट महिला हैं-वाराणसी में टीचर। कहती हैं- आई सपोर्ट मोदी। बिकॉज ऑल्ड इज गोल्ड मेरे पूछने पर मुस्लिम वोट का क्या होगा बनारस में। इफेक्टिव हैं? कुछ देर बाद यही महिला- बाप रे। बनारस में मुस्लिम बहुत हो गए हैं। फलां मोहल्ले की तरफ जाईये दिमाग पागल हो जाएगा। मुस्लिमों के मोहल्ले में जाने से दिमाग का कौन सा तंत्र फेल हो जाता है मैं पूछना चाहता हूं। मोदी समर्थक साम्प्रदायिक होते हैं तमाम विकास के झूठे-हवाई पुलिंदों के बावजूद।
केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर दिल्ली वालों को बीच मझधार में छोड़ा है, ठेके पर बहाल कर्मचारियों को नियमित नहीं किया है जैसे मुद्दे जायज से लगते हैं लेकिन यही लोग केजरी के खिलाफ तर्क देने लगे- हवाई जहाज से चलता है, मीडिया को गरिया कर ठीक नहीं किया। अरे मीडिया को कैसे गलत बोल सकता है। फिल्म नायक में अनिल कपूर ने कितना कुछ कर दिया था एक दिन में। ये तो 49 दिन में भी कुछ नहीं कर पाया। बिजली-पानी मुफ्त किया लेकिन उसपर भी रोक लग गयी ( क्या केजरीवाल ने रोक लगायी है?), केजरीवाल भी पार्टी टिकट को खूब बेचा है, फोर्ड फाउंडेशन का पैसा है( तो क्या मोदी के पास अंबानी-अदानी का पैसा नहीं है?) एक ही तर्क में एक को स्वीकार और एक को नकारने की समझदारी (?)। एक मोदी भक्त दिल्ली के हैं- कहते हैं- बनारस के लोगों को जानता हूं, मोदी को ही जितायेंगे। क्यों?  केजरीवाल बहुत ईमानदार था जबतक वो मोदी के खिलाफ नहीं बोल रहा था। उसको मोदी के खिलाफ नहीं बोलना चाहिए था। उसे कांग्रेस के खिलाफ ही बोलकर काम चलाना चाहिए था। कांग्रेस का दलाल है-बी टीम
एक केजरी फैन महिला कह रही हैं- मोदी ने हम बनारस वालों के सेंटिमेंट के साथ खेला है। बताईये-हरहर महादेव की जगह खुद की हर हर करवा रहा है। महादेव सबक सीखायेंगे उसको जरुर देख लीजिएगा
चार राज्यों में मोदी-केजरी-राहुल मिले। नीतीश-लालू मिले। अखिलेश-मायावती मिले। मैं सीपीआई-सीपीएम को खोजता रह गया। मुझे याद आता है पासी खाने में पूछे सवाल का जवाब- ललका झंडा भी है इधर। किसी ने कहा- न, सीपीएम वाला तो बंगाल में है
मैं उसको एडिट करके लिख रहा हूं- ललका झंडा वाला बंगाल की खाड़ी में कूद गया है।

Friday, March 7, 2014

मार्च का गीत




मार्च का गीत


मैं फूलों को उछालता चलता हूं
हर चीज में कोंपलें आ रही हैं
मार्च में

मैं रास्तों को उछालता चलता हूं
बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे हैं
मार्च में

मैं गीत को उछालता चलता हूं
चिड़िया गा रही हैं
मार्च में

मैं सिर्फ प्रेम को सीने से लगाए चलता हूं
दर्द, भय और
तुम्हें

तुम्हारी हंसी
मार्च में.

.

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...