Saturday, May 3, 2014

महुआः कुछ क्लिक्स

महुआ बीनती एक छोटी बच्ची
महुआ बीनकर लौटता एक परिवार

शाम को जंगल से टोकरी में महुआ लाता एक जंगलवासी



एक परिवार महुआ बीनता


दीपचंद साकेत अपने बच्चों के साथ महुआ बीनने के दौरान

महुआ के मौसम में जंगल में ही डेरा जमाया है, एक डेरे की तस्वीर

महुआ बीनना एक कला है जो पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर होता आया है, अपने बच्चे को देखता एक पिता


भाई-बहन और महुआ
पूरी कहानी यहां http://kharinews.com/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF/item/21666-2014-04-30-07-48-45

Wednesday, April 30, 2014

तुम्हारी दोस्ती पर खर्च कुछ शब्द


 न हर रोज के  फोन, न ऑफिस से लेकर निजी जिन्दगी में होने वाली घटनाओं का
ब्यौरा और न ही मिलने और बात करने का वैसा कुछ इंतजार।
वैसा कुछ भी नहीं है जो हमदोनों को दोस्ती के सामान्य परिभाषा में फिट
करता हो। हां, उसका लिखा मुझे अच्छा लगता है। अपना लिखा उसको पढ़वाना
चाहता हूं। जानते हुए कि वो अच्छा बोलेगी बजाय इसके कि ईमानदार फीडबैक
दे। फिर भी एक अजीब सा भरोसा है लगता है उसने अच्छा बोल दिया तो फिर
बांकि दुनिया भले खराब बोले ये अच्छा ही होगा। अच्छी तस्वीर, अच्छे शब्द।

हां, इत्ता जरुर है कि जब पूरी दुनिया मेरे खिलाफ खड़ी हो, वो चुपके से
मेरे बगल में आ खड़ी होती है। बिना हल्ला किए, शोर मचाये वो साथ होती है।
उस समय भी जब कथित बेस्ट फ्रैंड हँसी उड़ा रहा होता है और उस समय भी जब
लोगों की बातों से मैं निराश अपनी उड़ान कम करना चाहता हूं।

कभी-कभी जब हमारी बात होती है तो बस बातें होती है। पता नहीं क्या-क्या
बातें करता हूं। मन के गांठ खुलते हैं।

जब हम मिलते हैं तो बस मिलते हैं। उस समय हमारे आसपास  सिर्फ हमारी
मुलाकात होती है। न जाने किस इशारे में, किसके लिए, किस को इमेजिन कर-कर
के हम बतियाते रहते हैं।

हमदोनों एक-दूसरे के प्रायवेट स्पेस को बचाये रखना चाहते हैं। कई बार
लगता है उस स्पेस को बचाये रखने की वजह से कुछ छूट रहा है, कुछ है जो
नहीं कहा जा रहा है, कुछ है जो शायद कह दे तो बोझ हल्का हो जाये...
वो कई बार कुछ ऐसा लिखती है जिसपर ‘अच्छा लिखा है’ नहीं कह पाता। बस, उस
लिखे की प्रक्रिया को समझना चाहता हूं, उन बेनींद बीती रातों को समझना
चाहता हूं जब वो लिखा गया, उन हदों को समझना चाहता हूं जहां बिना लिखे
इमोशन स्थूल हो जाते हैं.....लेकिन उसके रहस्य को छूना नहीं चाहता इसलिए
समझने की कोशिश नहीं करता, बस चाह कर रह जाता हूं।

बावजूद इसके इक भरोसा है। जब बोझ बढ़ेगा तो हम एकदूसरे के कंधे पर डाल
आगे बढ़ेंगे....
बिना थोपे पैदा हुआ विश्वास है, बिना बोले महसूस किया गया अपनत्व है...

Monday, April 28, 2014

इमोशनल होना

इमोशनल होता हूं तो लिखता हूं। रोता हूं। लेकिन बोल नहीं पाता।

आज सुनील भाई की याद में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में कुछ ऐसा ही हुआ।

Friday, April 25, 2014

कितना बेकार है न लिखना !!!

लिखने-पढ़ने का काम खुद को खुश करने का जरीया है-  बस। एक रिपोर्ट लिखकर मन कितना संतुष्ट होता है।
लेकिन इससे कुछ नहीं बदलता....कुछ भी नहीं। न तो उनके लिए जिसके बारे में लिखो और न दुनिया के लिए जो उसको पढ़ते हैं। बस, लिखिये, खुश होईये और भूल जाईये।
इससे बेहतर था कि डॉक्टर बन जाता, वकील बन जाता या फिर किसी स्कूल में टीचर ही सही। लिखने से ज्यादा बेहतर तो था न डॉक्टर बनकर रामाधार साकेत के बेटे की जान बचा लेता, वकील बन  उस आदिवासी गणेश खैरवार की जमीन का मुकदमा लड़ लेता जिसकी जमीन ठाकुरों ने सालों पहले कब्जा कर लिया है और अब गणेशी जी वकील-दर-वकील, कोर्ट-दर-कोर्ट भटक रहे हैं।

पता नहीं कब पत्रकार बनने का ठान लिया था। शायद होश संभालने के बाद ही। लगता था खूब लिखूंगा, लोगों के साथ हो रहे अन्याय पर, समाज के हाशिये पर ढकेल दिए गए लोगों के लिए- खूब लिखूंगा।

आज, सबकुछ बेकार लग रहा है। सारा लिखा-पढ़ा कचरे का एक विशाल ढ़ेर। उससे ज्यादा कुछ नहीं।
आह L अब तो लिखा भी नहीं जा रहा.....

फीलिंग- निरर्थक, बेकार, डिप्रेसन L

Thursday, April 24, 2014

मोदी डराता है, सेकुलर डर दिखाता है



टीवी पर हर इलेक्शन डेट से पहले नरेन्द्र मोदी नजर आने लगे हैं। वही मोदी जिनपर बीच इंटरव्यू को छोड़ कर जाने का आरोप लगता रहा है। जिनके बारे में कहा जाता था कि वो भीड़ में भले बोल लें लेकिन इंटरव्यू में नहीं बोल सकते।

शायद मोदी पीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। इसलिए अब लगातार टीवी पर नजर आते हैं। बिना डरे, बिना झिझके हर सवाल का हंसते हुए जवाब देते।

अलबत्ता। अब पक्षकार सॉरी पत्रकार ही डरे-डरे से नजर आने लगे हैं। एकदम संकोच से सवाल पूछते, कहीं बुरा न मान जाये के भाव से ओतप्रोत। इंडिया टीवी, एएनआई, जीन्यूज या फिर एबीपी। हर शो में पत्रकारों को संकोच करते हुए मोदी से सवाल करते देख रहा हूं।

ये सिर्फ मोदी के उन हजारों करोड़ रुपये का कमाल है जो मोदी ने पीआर एजेंसी को दिया है। जो पीआर एजेंसी हर दूसरे दिन मोदी का पेड इंटरव्यू करवाने का इंतजाम करवा रही है या फिर उससे आगे कुछ और बात है।

कहीं देश का तथाकथित चौथा खंभा मोदी से डरा तो नहीं है। हल्की सी सख्त सवाल पर मोदी का लाल चेहरा कहीं मीडिया को डराने के लिए तो नहीं बनाया जाता है। अगर ऐसा न होता तो मोदी से चुनावों में खर्च किए गए विज्ञापनों का हिसाब लिया जाता, गुजरात दंगों पर लीपापोती वाले सवाल पूछे जाते हैं, उनके विकास के कॉर्पोरेटी मॉडल पर सवाल नहीं उठाया जाता। ये सब सवाल गौण कर दिए गए हैं।

कुछ सवाल सेकुलरों से

देश की आजादी के छह दशक बाद भी अगर मुसलमान सिर्फ और सिर्फ अपनी सुरक्षा के डर के आधार पर वोट दे रहे हैं तो यह क्यूं न माना जाय कि देश की सेकुलर पार्टियों ने सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को वोट बैंक बने रहने दिया है। इसी गणित से सेकुलर और बीजेपी दोनों पार्टियों को फायदा पहुंचता आया है। इसलिए कोई सच्चर कमिटि की बात नहीं करता, मोदी का डर दिखाता है। मुसलमानों के विकास की बात नहीं होती, उन्हें दंगा मुक्त भारत के सब्जबाग दिखा कर ही खुश कर दिया जाता है।


मोदी डराता है, सेकुलर डरे रहने को मजबूर करता है। और जनता बेहतर विकल्प न होने पर कभी हिन्दु बनकर बीजेपी को तो कभी मुस्लिम बनकर कांग्रेस में वोट डाल आते है।

Tuesday, April 22, 2014

सुनील भाई का चले जाना


स्तब्ध हूं। हमसब। हमारी पूरी टीम। महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता। सभी। सुनील भाई नहीं रहे। महान की लड़ाई को सिंगरौली से लेकर भोपाल तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा करने वाले सुनील भाई। महान संघर्ष समिति को लेकर उनकी चिंताओं, उनके सुझावों की जरुरत आज भी है लेकिन वो नहीं हैं। हमारे बीच से उठकर चल दिए। बिना कहे।

पिछले कुछ दिनों से एम्स में भर्ती थे। रात 11.30 बजे उनके निधन की खबर मिली। उसी समय मन आसूँओं से भींग गया। कुछेक लोगों को खबर करके बैठा तो बहुत कुछ सोचने लगा। मन हुआ कुछ लिखूं । लेकिन वो भी नहीं लिखा पाया।

अभी जब उनके चले जाने को कुछ घंटा बीत चुका है। और जब  मैं यह लिख रहा हूं तो उसी समय दिल्ली में उनका शरीर भी हमसे विदा हो रहा होगा।

लेकिन सुनील भाई जैसे लोग क्या सच में इस दुनिया से चले जाते होंगे ? क्या उनके शरीर के जाने भर से वो प्रेरणा चली जायेगी जो उनके केसला में संघर्ष से पैदा हुआ है, या फिर वो ऊर्जा खत्म हो जायेगी जिसने उन्हें जेएनयू जैसे संभ्रांत विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद भी किसी सरकारी नौकरी में जाने की बजाय केसला में आदिवासियों की लड़ाई के लिए प्रेरित किया होगा।

नहीं।

सुनील भाई जैसे लोग सिर्फ एक शरीर थोड़े न हैं कि जिसके चले जाने से सुनील भाई का अस्तित्व भी चला जायेगा। आज अगर सिंगरौली से लेकर केसला तक, भोपाल से लेकर दिल्ली तक आदिवासियों और हाशिये पर खड़े लोगों की आँखों में आँसू है तो सुनील भाई उन्हीं आँसूओं में कहीं जरुर बैठे हैं।

सुनील भाई जेएनयू में अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे। जेएनयू का यह वह जमाना था जहां से हरेक पढ़ने वाला छात्र या तो सीविल सेवाओं में या फिर बड़े यूनिवर्सिटि में प्रोफेसर बनता था।
अभी तक के जेएनयू की तरह ही उस समय भी वहां कई ऐसे युवा थे जिनके सपनों से लेकर बहसों तक में हाशिये के लोग हुआ करते थे। लेकिन कैंपस के बाद बहस छूट जाता और सपने बदल जाते थे।

लेकिन सुनील भाई ने कैंपस की समतल धरती से निकल मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों को अपना कार्य  क्षेत्र बनाया। विस्थापितों की लड़ाई लड़ी। किशन पटनायक को अपना आदर्श मानते हुए सामायिक वार्ता जैसी पत्रिकाओं का संपादन करते हुए जनसरोकारी पत्रकारिता को जारी रखने का जोखिम उठाया।

सुनील भाई ने वह सब किया जिसका हम जैसे तमाम नौजवान कैंपस में रहते हुए सपने  देखा करते हैं। और कैंपस से निकल भूल जाया करते हैं।

सुनील भाई से पहली मुलाकात पिछले साल ही अगस्त में हुई। सिंगरौली में महान संघर्ष समिति की तरफ से आयोजित वनाधिकार सम्मेलन में आए हुए थे। दो दिन तक उनके साथ रहा था। कई मुद्दों पर बात हुई थी। अभी पिछले महीने सामायिक वार्ता में एक लेख के लिए काफी देर तक बात हुई थी। बहुत समझाये थे। कैसे करना है...क्या करना है...किस दिशा में आगे बढ़ा जाय।


उनसे सीखने का सिलसिला अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था कि बीच में ही टूट गया। उनकी आवाज की सौम्यता, समझाने का सहज तरीका, जीने का सादा ढंग। कितना कुछ है जो प्रभावित करता है।

जानता हूं। सुनील भाई चले गए हैं। लेकिन इसके बावजूद उनका जीवन, संघर्ष, सौम्यता, सहजता, सपने, ऊर्जा हमारे बीच रह गया है।

लगता है अभी सुनील भाई अपने गर्दन पर लटकते चश्मे को आँख में लगायेंगे और चश्मे के भीतर से झांकते हुए कहेंगे- बचा कर रखना। कुछ सपने, असीम ऊर्जा, संघर्ष का साहस। जिन्दाबाद।





(सुनील भाई समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय महामंत्री थे। साथ ही सामायिक वार्ता के संपादक भी।)

(दोस्त इकबाल अभिमन्यू से दिल्ली आने के एकाध महीने बाद ही संयोगवश मुलाकात हुई थी। करीब तीन साल पहले। उसकी बातों ने काफी प्रभावित किया था। फिर कुछेक मुलाकात और लगातार बातचीत होती रही। पिछले साल ही पता चला कि वो सुनील भाई के बेटे हैं। फिर इकबाल का कहा याद आया- जेएनयू से निकल मध्यप्रदेश के गांवों में ही जाने का इरादा है। उनके दुख को समझना मुश्किल है, हिम्मत नहीं हो रही उनको फोन भी करने की। इस मुसीबत के वक्त हजारों लोग उनके साथ खड़े हैं, शायद यही बात उन्हें ताकत दे)

Monday, April 21, 2014

shades of love

प्यार के गहन क्षण में ही इतना लाड़ आता है कि आप किसी की कान खींच उसे वापस घर की तरफ ले चलते हो...बिल्कूल माँ की तरह
उपर की तस्वीर में माँ का गुस्सा और यहां माँ सा लाड़ देता एक बच्चा









ये दोनों तस्वीरें महान जंगल की है। महान वही जंगल है जहां कोयला खदान का आना सरकार ने तय कर दिया है।

दो अलग-अगल गांव। दो अलग-अलग तस्वीर। बस, इतना जतलाना चाह रहा हूं कि प्यार के जिस रंग में इस जंगल का बच्चा-बच्चा जन्म के साथ डूब चुका है उस प्यार को कोयला खदान के नाम पर खत्म करने की साजिश का विरोध तो करना ही पड़ेगा। उम्मीद है इनका प्यार और गहरा हो..जिंदाबाद



कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...