Wednesday, July 23, 2014

एक उदास दिन में मन की बात

20 जूलाई 14
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सुबह से पहले की रात ही परेशान करने वाली रही। सुबह उठा तो कई सारे ख्याल आये मन में। उसे नोट डाउन किया तो ये कुछ शब्द और वाक्य उभरकर आए भीतर से।

मैं लिखता जाता हूँ। और मेरे भीतर कुछ घटता जाता है।।
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फिर मैं दुःख को भी एन्जॉय करने लगता हूँ।। लिखने की वजह मिलती जाती है।।।।

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अपना कोई नहीं है। कोई नहीं है पराया।।
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मैं लिखता जाता हूँ। और मेरे भीतर कुछ घटता जाता है।।

फिर मैं दुःख को भी एन्जॉय करने लगता हूँ।। लिखने की वजह मिलती जाती है।।।।

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मैं लिखकर खुद को सही साबित करना चाहता हूँ। अपने हर गलत को शब्दों से ढकना चाहता हूँ।
अपनों से सहानुभूति चाहता हूँ। अपने हर सही और गलत को तर्क में बदलने की कोशिश करता हूँ।।

जानते हुए भी कि its doesn't work
 
 

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मैं बहुत इमोशनल आदमी हूँ। मेरे पास बस यही है।।

और अब मैं इसे ही बेच कर खाने लगा हूँ।।

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एक घोर व्यक्तिवादी आदमी हूँ।
हमेशा खुद के आसपास एक दुनिया बुनने में लगा रहता हूँ।
दोस्त, दुश्मन, कारोबार
सबकुछ मेरा सोचा हुआ

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मुझे हमेशा लगता है कि लोग मुझे नहीं समझते।।

जबकि सच्चाई है कि मैं लोगों को नहीं समझता।।।

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मैं हर रोज थोड़ा थोड़ा मरता हूँ।

मै हर रोज फिर से जी उठता हूँ।।

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मेरा मन करता है कि एक दिन सारे दोस्तों से कट्टिस कर लूँ।।

वैसे ही जैसे कभी कभी सुसाइडल टेंडेंसी आ जाता है और मरने की इच्छा सबसे ज्यादा होने लगती है।।

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एक दोस्तनुमा दुश्मन है।
कभी कभी रात को फ़ोन करता है। कुछ कमेंट और टोंट कसकर सो जाता है। और इधर मेरी रात हराम।।

दुसरे को ख़ुशी दे नहीं सकते तो ये लोग दुखी भी क्यों कर जाते हैं।। पता नहीं।।।।

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ऐसा अचानक ही हुआ।
कल तक जो लड़का सबसे खुश और जिन्दा था, आज हर पल मरते और घिसटते जी रहा है।।

नजर लगा दियो रे बाबा किसी ने 

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लोग ऐसे ही हैं।
हमेशा आपके फटे में टांग अड़ाने वाले।।

अगर दो समस्याएं हैं तो कोशिश करेंगे 4 और दें जाएँ।।।

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और अंत में, प्रेम निभे तो जिन्दगी कटे    

Sunday, July 13, 2014

खुद से बात #4

कभी कभी लगता है किसी ऊंचाई से गिर रहा हूँ। बहुत ऊपर आसमान के बिलकुल पास से। 
जहां से लगता है कि आसमान पकड़ में आ सकता है। ठीक उसी समय गिरने लगता हूँ। ये गिरना धड़ाम से गिरने जैसा नहीं होता। सब कुछ धीरे धीरे होता है। हौले हौले नीचे की तरफ गिरना ज्यादा खतरनाक सा हो जाता है। 
गिरते हुए आप महसूस कर रहे होते हैं कि आप गिर रहे हैं। बहुत नीचे खाई की तरफ आप बढ़ रहे होते हैं। बीच रास्तें में रुकना चाहो भी तो कोई टिकने की जगह नहीं मिलती। 
डर, मज़बूरी और कुछ न कर पाने की हताशा सबकुछ फील होता है।
और अंत में गिरते हुए भी बस यही चाह बची रह जाती है कि काश धड़ाम से गिरे होते....बिना महसूस किये।

Thursday, July 10, 2014

आह लगेगी तुम्हें मिस्टर मार्केट !!

खरीद ले, बेच डाल !

मिस्टर मार्केट,

तुम अपने टारगेट पूरा करने के चक्कर में हमें क्यों टारगेट बनाते हो। हम छोटे लोग हैं- लोअर मीडिल क्लास। लेकिन हमारी संवेदनाएँ, प्यार की संभावनाएँ बड़ी और अपार हैं। हम उसे संभाल कर बचा कर चलते हैं और तुम हो कि बार-बार आकर उसे ही अपना टारगेट बना लेते हो।
कभी किसी खूबसूरत महिला की आवाज में, कभी बुढ़ी दादी की सलाह में तो कभी माँ के प्यार में। तुम हमेशा वक्त-बेवक्त हमें अपना टारगेट बनाते हो, हमारे बीच से ही किसी को उठा एक अदद नौकरी और एमबीए की डिग्री दिलवाकर उसे हमारे ही खिलाफ खड़े कर देते हो और हम हैं कि उस बिके आदमी की मजबूरी भी समझते हुए, उसे अपना मानते हुए बड़े आराम से तुम्हारा टारगेट बनना स्वीकार कर लेते हैं।

हम लोअर मीडिल क्लासी लोगों के पास खोने को कुछ नहीं है और पाने को पूरी दुनिया। मार्क्स ने तुम्हारे फायदे के लिए थोड़े न कहे थे, ये शब्द। ये नारे, तुम्हारे खिलाफ उछाले गए थे लेकिन तुमने बड़ी ही चालाकी से उसे अपने पक्ष में खड़ा कर लिया।

और हमने सबकुछ पाने के चक्कर में, पूरी दुनिया हासिल करने में फ्रिज, टीवी, एसी नहीं तो कूलर ही सही, वासिंगमशीन से लेकर गाड़ी और बड़ी गाड़ी से अपने वन-टू-डुप्लेक्स बीएचके घर को भरते चले गए। कभी ये पैकेज, कभी वो सेल, कभी बाय टू गेट वन के चक्कर में हमारी जिन्दगी  के मायने तुमने ईएमआई भरने तक समेट दिया।

मिस्टर मार्केट तुम भूल गए, हमारे पास खोने को भी था बहुत कुछ। बहुत सी संवेदनाएँ, खूबसूरत रिश्ते, कुछ प्यार, दुख-सुख को अनुभव करने का एहसास, एक समाजिक चेतना, दया-करुणा और महसूस करने की ताकत। हम धीरे-धीरे जो था उसे खोते चले गए, और जो तुमने बताए उसे पाने के लिए हँसने-रोने-अवसाद-ईर्ष्या-टारगेट पूरा करने लगे।

पहले तुमने हमसे सबकुछ खरीदवाए और अब उसे कहते हो-बेच डाल। पहले हमने खरीदा। घड़ी, रेडियो, एमपी3, टीवी, सीडी, बाइक, गाड़ी, फ्रीज, टूर पैकेज, गोरे होने वाली क्रीम, जूते, चप्पल, महंगे कपड़े, लड़कियों को लुभाने वाले डियो, युवा दिखाने वाले हेयर कलर, मोबाईल, स्मार्ट फोन, मैकडी-बर्गर। हमने जमकर खरीदारी की। डेबिट कार्ड नहीं तो क्रेडिट कार्ड से। ईएमआई से। जैसे भी हुआ। इतना खरीदा कि घर कबाड़खाना या गोदाम हो गया। उसपर विंडबना कि जितना बड़ा गोदाम, उतना बड़ा आदमी। जितना जिसके पास कबाड़ वो उतना बड़ा दिलदार। खरीदते-खरीदते ही  हमने खरीदना शुरू कर दिया दोस्ती, प्रेम, दुश्मनी, गुस्सा, घृणा, प्यार-मोहब्बत। और हमें पता भी न चला।

जब खरीद लिया तो फिर तुमने कहना शुरू किया बेच डाल। हमने बेचना शुरू किया। ओएलएक्स, क्विकर सबपर बेचा। सारा कुछ बेचते-बेचते हमें फिर पता न चला। हमने शुरू किया खुद को बेचना, दोस्ती, प्यार, नफरत, आंदोलन, क्रांति, बदलाव, सोशल एक्टिविज्म। हमने सबकुछ बेचा। लिखना-पढ़ना, भाषण देना, बड़े-बड़े नारे, नारों की तख्तियां हमने सबकुछ बेचा। बदलाव की सामुहिक-सामाजिक चेतना को भी बेचा। बेचने का मंच कम पड़ा तो तुमने दिया- फेसबुक, ट्विटर, टम्बलर, इंस्टाग्राम। यहां भी जमवा दी तुमने हमारी दुकान। हमने  पोस्ट-ब्लॉग अपडेट करने को भी बेचना ही नाम दे दिया। हमने सेट किए अपने-अपने एजेंडे, कभी सेलेक्टिव, कभी कलेक्टिव होकर खुद को बेचा।

हमने बेचा ताकि फिर से खरीद सकूं। लेकिन इस खरीद और बिक्री के बीच हमने अपना बहुत कुछ खो दिया, बिना कुछ पाये....जिसे न तो कहीं खरीदा जा सकता और न ही अब किसी को बेचा जा सकता.. जानते हुए कि अभी बचा है बहुत कुछ खरीदना-बेचना। अब थकने लगा हूं खरदीते-बेचते मिस्टर मार्केट !!
थैंक्स तुम्हारा। मिस्टर मार्केट !
एक दिन तुम बिकोगे, एक दिन भरभरा कर गिरोगे।
आह लगेगी तुम्हें मिस्टर मार्केट !!



( बैकग्राउंड में रेडियो पर गाना बज रहा है- जाने कहां मेरा जिगर गया जी। सच्ची-सच्ची कह दो दिखाओ नहीं चाल रे। तुने तो नहीं चुराया मेरा माल रे)

Thursday, July 3, 2014

चाईबासा एक कस्बे के खत्म होते जाने की कहानी भाग 2


मंगला हाट अब दम तोड़ रहा है. 


कतार से आती साईकल पर सवार आदिवासी महिलाओं की झुण्ड मंगला हाट के जीवंत होने का सबूत पेश कर रही थी. साईकिल पर टंगे सब्जियों की थैलियां और बांस से बने घरेलु डलिया, टोकरी मंगला हाट में जाती महिलाओं की स्वतंत्रता और मंगला हाट का प्रतिक है। आबादी के दवाब के बावजूद भी पूरा हाट बाज़ार मन मोह रहा था नज़रे बार- बार हरी सब्जियों जैसे टमाटर, कद्दू , हरे साग, भिंडी, करेला के तरफ जाकर टिक जाती रही हमेशा की तरह शायद इसलिए की शहरी रिलायंस फ्रेश के ओवरडोज का असर रहा होगा, जो भी हो ये बाज़ार सजीवता का अनूठा उदहारण पेश कर रही थी जिसे कोई और शहरी बाज़ार नहीं कर सकता। फ्रेश होने के सौ फीसदी सबूत दे रहे इन सब्जियों को मामूली रकम में खरीदना अच्छा लगता है मैंने भी खेजे के भाव में तैयार ऑर्गनिक सब्जियां खरीदी शायद दिल्ली, मुंबई में होता तो इन सब्जियों को कभी नहीं खरीद पाता।

सजीवता की मिसाल पेश करने वाला मंगला हाट बाज़ार अब धीरे - धीरे खत्म होने की कगार पर है, आधुनिक्ता की चौतरफा घेरेबंदी ने ज्यादातर स्पेस को छीन लिया है. पिछले एक दसक में सबसे ज्यादा कोई बाज़ार इंक्रोच हुआ तो वो थे इन आदिवासियों के. बाज़ार माफियाओं ने दबंगई कर इनके ही हाट से बेदखल कर दिया है, ये लोग जहाँ अपनी सामन बेचा करते थे वहां के ज्यादातर जगहों पर अब एयरटेल, वोडाफोन,जींस, नोकिया, सैमसंग और आधुनिक मंडी डीलरों का कब्ज़ा हो गया है. ऊपर से आबादी का बढ़ता दवाब और महंगाई आदिवासियों की ताज़ी सब्जियों और अन्य सामानों पर भारी पड़ रहे है. इनके परंपरागत हाट बाज़ार अब मार्केट की मंडी भाव से कंपीट नहीं कर पा रही है. ऊपर से बिचैलियों, व्यपारियों के दवाब ने इनके छोटे से सिकुड़ते हुए हाट को भी कब्जा कर लिया है।

हम उम्र देव सिंह चंपिया को पिछले 10 सालों से जानता हूँ, अब भी वही बैठते है जहाँ पहले बैठा करते थे. चंपिया बताते है की अब मंगला हाट बदल चुका है सब्जियों को छोड़ दी जाय तो अब हमारे परंपरागत सामनों के मार्किट के लिए शायद अब कोई जगह नहीं है. ऊपर से शहरी हाट माफियाओं का रोज दिन का कब्जा हमारे हौशले कमजोर करता है. बाप दादा तो झाड़ू से लेकर खटिया,मचियां, हल, मुर्गा, बकरा- बकरी और सब्जी तक बेचते थे पर हम बस इस बदले हुए हालात में सिर्फ सब्जी तक सिमित है. चंपिया के पास करीब एक एकड़ जमीन है इसी जमीन पर सालों भर जीतोड़ मेहनत करते है और तरह - तरह की सब्जियां उगाते है. बिन्स, भिन्डी, करेला से लेकर अमरुद और तुंत तक की खेती करते है और सब्जियों को जीतोड़ मेहनत कर बाजार लाते है जितने में उनके घर का खर्च चल जाए. चंपिया बताते है की हम लोग जंगल के आदमी है यही जीना है यही मर जाना है जिंदगी जंगल है इसलिए मुनाफा नहीं कमाना है. चंपिया कहते है की रोज पांच से 8 किलों तक सब्जी तोड़कर बाज़ार में बेचते है उसी से अपना काम चल जाता है. चंपिया जैसे हज़ारों लोग इस इलाकें में है जो अपनी जरूरत के हिसाब से खेती करते है और जरूरत के हिसाब से बेचते है जिन्हे मुनाफा कमाना नहीं पेट और घर चलना होता है. और शायद मंगला हाट के जीवंतता को बनाये रखना है.

पर बीते कुछ सालों में इस छोटे से कस्बें के मंगला हाट पर भी उदारीकरण और भूमंडलीकरण का प्रभाव पड़ा है, अब मंगला हाट बटा- बटा सा लगता है बिल्कुल भारत और पाकिस्तान के बॉर्डर टाइप से. करीब तीस एकड़ में फैले इस बाज़ार के एक तिहाई हिस्सों में अब उनका कब्जा हो गया है जो आधुनिक विकास को पसंद करते है. ये वो लोग है जो ब्रांडिंग टिकिया से लेकर मोबाइल तक बेचते है, अगर इनके बाज़ार में मंदी आ जाए तो ये लोग ब्रोएलर मुर्गे से लेकर जहरीले सब्जी तक बेचते है. अब बाज़ार के चारों ओर आधुनिक साजों सामान भरे पड़े है. जहाँ तक नज़रे जाती है वहां - वहां जींस,टीशर्ट, मोबाइल,और आधुनिक तौर तरीके का बनता बाज़ार नज़र आता है.

वही दरकिनार होते बाज़ार और आदिवासी मूलवासी लोगो आज भी अपने इतिहास को ज़िंदा रखे बाज़ार के कोने में बांस से बने विभिन्न तरह के सामान बेचते नज़र आ रहे थे. स्टाइल स्पा और गोदरेज से बने घरेलु फैंसी आइटम के दौर में भी इस हाट बाज़ार में बिना बाहरी दवाब के बीजा लकड़ी से बने खटिया (चौकी) और मचिया (कुर्शी ) उपलब्ध है . यही इसी हाट के कोने में बचे हुए साल के पत्तों का बाज़ार भी है जो दसकों पुराना इको फ्रेंडली है. प्लास्टिक के इस दौर में भी मंगला हाट बायोडायवर्सिटी का अनोखा उदारहण पेश करती है शायद इसलिए ही आज भी चाईबासा के सड़कों पर मिलने वाले खाने के सामन को पत्तों में ही रख कर बेचा जाता है. फैबर और प्लास्टिक से बने प्लेट नहीं। 



कहानी का पहला भाग यहां पढ़े

चाईबासा एक कस्बे के खत्म होते जाने की कहानी भाग 1

हम सब अपने-अपने घर लौट कर जाते हैं। घर जो कहीं इन मेट्रो शहरों से दूर किसी गाँव-कस्बे में बसा हुआ है। हर साल हम घर लौटते हैं और हर साल हमें कुछ नया, कुछ बदलता सा दिखता है। बदलाव जिसे हम महसूस कर पाते हैं, बदलाव जिसे हम देख-समझ पाते हैं और बदलवा जो हमें नॉस्टलैजिक करके अपनेे पुराने दिनों में पहुंचा देते हैं।
इन्हीं बदलावों पर, ऐसे ही किसी अपने कस्बे की कहानी लिखी है- मुन्ना कुमार झा ने। इसमें बाहरी बनाम भीतरी भी है, स्मार्ट फोन भी और एक कस्बे का ग्लोब होते जाने की कहानी भी। फिलहाल कहानी का पहला भाग-
(अविनाश)

दो लाख के आसपास की आबादी वाला यह कस्बा पुरे पश्चिम सिंहभूम का केंद्र है. यहाँ कोर्ट भी है और कमिश्नर, कमिश्नरी भी. लंम्बी लड़ाई के बाद अब एक कोल्हान यूनिवर्सिटी भी है जो आदिवासियों के अस्मिता का प्रतिक है मगर वीसी से लेकर दूसरे पदाधिकारी सब हिंदी भाषी है सब बाहरी है. डेढ़ किलोमीटर के भीतर सिमटे इस कस्बें की सड़कों पर तेज रफ़्तार से आप नयी चमचमाती गाडी भागते हुए देख सकते है. गाड़ियों के कलर और मॉडल को देख कर थोड़ी देर आपकों दिल्ली और मुंबई में होने जैसा एहसास होने लगता है.

एक दसक पहले जब चीन में ओलोम्पिक गेम की तैयारी के लिए निर्माण हो रहे थे तब इन ही इलाकों से आयरन पत्थर एक्सपोर्ट हुए थे. विकास के एकदसकीय दस्तक ने कस्बें के सड़कों के दोनों ओर बड़े छोटे कई बाज़ार खड़े कर दिए है ये और बात है की आजकल मंडी में मंदी का दौर अनवरत चल रहा है. सीडी से लेकर साडी जींस तक की सैकड़ों दुकानों में फैसन जोर मार रहा है. अब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यह के कई दूकान और रेस्त्रां वातनुकूलित हो गए है. वैसे कस्बें ने जब से शहर का आकार लिया है तब से गर्मी ज्यादा बढ़ी है इसलिए अब यहाँ लोग अपने घरों में भी एसी लगा रहे है. कस्बें के दो पुराने बाज़ार सदर और बड़ी बाज़ार विकास का हिस्सा बन गयी है अब बड़े शोरूम और बड़े - बड़े बैंक इन इलाकों में है, गंभीरता से देखने पर नेहरू प्लेस टाइप फील होने लगता है.

स्मार्ट फ़ोन का असर यहाँ भी है जो दोस्त मिले सब फेसबुक पर है और नहीं मिले वो भी समार्ट फ़ोन लिए नज़र आते दिखे . एयरटेल और वोडाफोन के टॉवरों की तरह बाहरी जनसंख्या भी दिन दोगिनी रात चौगुनी हो रही है. हिंदी भाषा और हिंदी भाषी इधर कुछ सालों में "हो' भाषी और लोगों पर असर कर गए है। शिक्षा के स्वीट होप ने इन इलाकों में अपनी जड़े जमा ली है अब यहाँ कोई अपने बच्चे को एसपीजी मिशन स्कूल और लुथेरन नहीं भेजना चाहता है. सब को अब डीएवी, संत विवेका, संत ज़ेवियर जाना है वहां इंग्लिश जो पढ़ना है।



कहानी का दूसरा भाग यहां पढ़े-  

Sunday, June 29, 2014

हेयर कटिंग का इमोशनल हो जाना


गौरव मुनिरका में हेयर कटिंग सैलून चलाता है। मथुरा के रहने वाले गौरव का एक जमाने में मुझ से करीब-करीब दुगुने लंबे बाल थे। गौरव के गांव में एक तालाब भी था। इतना गहरा कि चार हाथी एक-दूसरे पर खड़े हो जायें तो भी पानी में डूबेंगे ही।

इसी पोखर में गौरव अपने दोस्तों के साथ हर रोज नहाने जाता- घर वालों से चोरी-छिपे।  लेकिन उसकी चोरी हर बार पकड़ी जाती। उसके भीगे लंबे बालों की वजह से।
एक दिन गौरव और उसके दोस्तों ने फैसला किया- लंबे बाल जाय तो जाय लेकिन तालाब में नहाना नहीं छूटना चाहिए।
और अंत में, गौरव ने मन मसोस कर गंजा होना कबूल किया।

मेरी कहानी गौरव से नहीं मिलती फिर भी आज उसके दुकान पर मैंने अपने बाल कुर्बान कर दिये हैं ताकि समाज के प्रचलित मानकों में फिर से 'शरीफ आदमी' बन सकूं।

वही शरीफ आदमी जो मैं आज से एक साल पहले हुआ करता था- अपने गांव में, घर में, रिश्तेदारों में। अब मुझे अपने बालों को हर रोज तेल लगाने की जरुरत नहीं, हर पांच-दसेक मिनट पर अपने बालों को सहलाने की जरुरत नहीं, अब बालों को समेट कर पीछे चोटी बाँधने की जरुरत नहीं रही, अब उस बंधे चोटी से होने वाले दर्द से भी मुक्ति मिली।
बालों को लेकर पुलिस वाले का कमेंट भी नहीं सुनना पड़ेगा, मेरे लंबे बालों पर नाना-मामा-मौसा को लंबे-लंबे भाषण नहीं देने पड़ेंगें, उन्हें अब मुझ में कुसंस्कारी लक्षण नहीं दिखेंगें।
गांव के बच्चे भी अब डर कर भागेंगे नहीं, कुत्ते भौकेंगे नहीं, कुछ टीनएजर मेरे पीठ पीछे मुझे सलमान-हिरो- संजय कहकर नहीं चिढ़ायेंगे।
पड़ोसी की भाभियां नचनियाँ कहकर खिचला भी नहीं पायेंगी। और न ही माँ को मेरे बालों में उग आए जट्टा (उलझे-बेतरतीब बाल) के लिए रोना पड़ेगा, रात को बालों में रोते हुए तेल लगाने से भी वो मुक्त हुयी।

अब कोई पटना स्टेशन पर मेरे पास आकर यह नहीं कहेगा कि- 'भैया आप डांस सिखाते हो'?
न ही मैं उसे डांट कर कहूंगा- 'गो,गो, भागता है कि नहीं यहां से'।

अब मुझे अपने रिश्तेदारों और गांव वालों से, कथित सभ्य समाज से अपने बालों को छिपाने के लिए गमछा सर पर बाँधे भी नहीं रहना पड़ेगा। अब खाने के वक्त बालों को संभाले रखने की चिंता नहीं होगी। अब मेरे लंबे बालों को देखकर रेस्तरां में बैठे लोग मुझे घूरेंगे नहीं, सड़कों पर मुझे अजनबी नजरों से नहीं देखा जायेगा, बैंक में जाने पर कोई कर्मचारी मजाक नहीं उड़ायेगा, 'क्या हुलिया बना रखा है' जैसे सवाल हर रोज नहीं सुनने को मिलेंगे। अब मुझे कंघी करने की चिंता नहीं होगी, बिना बाल भिंगाये नहाने के बाद बिना नहाया सा नहीं लगेगा।
अब मैं अपने बालों को प्यार नहीं कर पाउंगा, अपने बालों को कई तरह से बांध कर तो कभी हवा में उछाल कर फोटो के लिए पोज भी नहीं दे पाउंगा।

कोई गांव में यह नहीं कहेगा कि- 'फलां के बेटे ने अपनी माँ से लड़ाई कर ली है और अब अलग रहने लगा है, कि अब साधु बनेगा'। न ही ट्रेन में कोई सदाकत आश्रम में 35 सालों से कांग्रेस कार्यकर्ता अंकल मिलेंगे जो पहले तो मेरे लंबे बालों को फिलॉसफर, साहित्यकार, लेखकों से जोड़ मुझ में महानता के गुण खोजेंगे और फिर जाते-जाते वैराग्य न अपनाने की सलाह देते हुए घर वालों की खातिर बालों को कटवाने की सलाह भी देते जायेंगे।

अब मैं शरीफ हूं, मैं अपने लंबे बालों से मुक्त हूं, मैं ऐसे समाज में रहने को अभिशप्त हूं जो आपके बालों की लंबाई, आपके पहनावे और आपके तमाम दिखावे की चीजों से आपके चरित्र, आपकी भलमनसाहत को नापता है।

इस बीच उन सबका शुक्रिया जिन्होंने लंबे बालों के बावजूद लफुआ नहीं समझा, टिन्ही हिरो भी नहीं। माँ जिसने कभी कटवाने की सलाह को जिद नहीं बनने दिया, वो लड़की जो हमेशा मौका मिलते ही मेरे बालों में चोटी बाँधती रही, वो भाई जिसे उम्मीद थी कि इत्ते लंबे बाल किए हैं तो अब इसे किसी बढ़िया से सैलून में जाकर लूक देगा...
आदमी अपने बालों को लेकर भी इमोशनल हो सकता है अब ही जाना........
                                                    ।।सबका आभार।।

Tuesday, June 10, 2014

मुंबई का एक दिन


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प्रेस क्लब में कॉफ्रेंस खत्म होते ही फियेट लिया। कुछ दूरी पर लाल झंडा लिये रैली में लोगों को जाते देखा तो उतर देखने चला गया। जाकर पता चला एनसीपी की मजदूर रैली है। मजदूरों के संगठन का झंडा लाल ही होता है-देख अच्छा लगा। खैर, मैं फिर फियेट में जा बैठा। फियेट या पद्मिनी मुंबई की सिगनेचर टोन माफिक है। उसमें बैठे-बैठ मुंबई को देखते चलना बेहतरीन अनुभव है खासकल मुझ जैसे रेट्रो लवर के लिए।
फियेट वाले से बात करते-करते चौपाटी पहुंच गया। कोई खास मकसद था नहीं। फियेट वाले ने पूछा भी कहां उतारुं, मैंने कहा-जहां मर्जी उतार दो। चौपाटी पर एक तस्वीर ली। कुछ देर बैठा रहा। हवा के साथ समुद्र की लहरें बार-बार किनारे आ जाती। अपनी बांहों को किनारे पड़े चट्टान में डालती और पीछे भाग जाती। काफी देर तक दोनों के इस खेल को देखता रहा। हर बार चट्टान और ज्यादा उदास होता दिखता रहा।
सर में दर्द और सर्दी ने ज्यादा देर तक वहां बैठे रहने नहीं दिया। धीरे-धीरे मैं टहलता हुआ चौपाटी से मरीन ड्राइव की ओर मुड़ गया। चौपाटी और मरीन ड्राइव के बीच समुंद्र के किनारे-किनारे सीमेंट के बने चबुतरे पर लोग बैठे रहते हैं। इनमें ज्यादातर कपल्स। इनमें एक जोड़े की फोटो मेरे साथ हो लिया- दोनों ने एक-दूसरे के लगभग उपर चेहरा रख छोड़ा था लेकिन एक धागा भर स्पेस बचा रह गया था- दोनों अपनी जीभ से उस स्पेस को बार-बार भर दे रहे थे। 
मन हुआ इनकी तस्वीर उतारी जाय। लेकिन प्यार के इतने खूबसूरत और गहरी अभिव्यक्ति को सामाजिक अश्लिलता के दायरे में धकेल दिया गया है।
खैर, दिमाग पर जो फोटो उतार लाया हूं वो काफी हैं महीनों अपने प्यार को खूबसूरत बनाते रहने के लिए।
मरीन ड्राइव से जहांगीर आर्ट गैलरी की तरफ पैदल ही निकल गया। आर्ट गैलरी से निकलने पर शाम का झुरमुट आ धमका था। थोड़ी दूर पर टी-सेन्टर देखा हुआ था। अंदर का माहौल पूरा इंटेलक्चुअल टाइप। मंहगी चाय और रुमानियत माहौल। सड़कों पर जिस चाय की वैल्यू बढ़ती मंहगाई भी छह रुपये से ज्यादा नहीं कर सका, वही चाय टी-हाउस में एक सौ बीस रुपये में मिल रही है। मेरे सर में दर्द है। मैं चाय पीउंगा। अभी मेरे पास कुछ नोट पड़े हुए हैं। चाय का प्लेट आते ही मैं उसे सूंघता हूं, फिर चम्मच से टेस्ट भी- कोई खास अंतर तो नहीं लग रहा है- शायद असम की चाय है। इससे पहले दूरदर्शन भोपाल के डायरेक्टर ने पिलायी थी बीस हजार किलो की पत्तियों वाली चाय। शायद सर्दी होने की वजह से मुझे सुगंध महसूस नहीं हो रहा (रही)।
होटल ताज के बगल में खड़ा था गेटवे ऑफ इंडिया

टी हाउस

मरीन ड्राइव


मैं संभ्रांत तौर-तरीके से चाय पीना चाहता हूं लेकिन चीनी उछल कर टेबल पर गिर ही जाता है। चाय तो मैं धीरे-धीरे ही पीता हूं- तिस पर इतनी मंहगी चाय और भी इंटलेक्चुअल फीलिंग के साथ पीने में मजा आता है।
मेरे मेज पर सामने वाली कुर्सी खाली है- अकेला होने कई बार मेरे लिए अच्छा होता है अगर बेहतर पार्टनर न हो तो। मैं कुछ इंटेलक्चुएलनुमा लोगों को देख सोचता हूं- अब मुझे एक चश्मा खरीद लेना चाहिए। पास में तीन लड़कियां बात कर रही हैं-अंग्रेजी में दो और एक सिर्फ स्माइली से काम चला ले रही है। वो भी मेरी तरह अंग्रेजी को स्माइली से झेलना जान गयी हो शायद, क्या पता। मैं चाय पीने और उसकी वेरायटी से हर आदमी के बैकग्राउंड का पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं। टी-हाउस के सबसे कोने वाली सीट पर बैठे-बैठ ये अतिरिक्त सुविधा मुझे मिल गयी है। एक कप चाय के दौरान काफी कुछ सोचा जा सकता है- एक जिन्दगी जी और मरा भी जा सकता है।
टी-हाउस से निकल फियेट का इंतजार करने लगता हूं। फियेट अब मुंबई में कम हो गए हैं। सरकार ने एकाध सालों में इसे हटाने का फैसला कर लिया है। फियेट की जगह सेंट्रो ने ले ली है। हालांकि मैं फियेट का इंतजार करुंगा- उसकी सवारी मुझे विरासत की सवारी लगती है। काफी देर हो गया है लेकिन कोई फियेट नहीं आयी। मैं थोड़ा निराश हो सेंट्रो में बैठता हूं- गेटवे ऑफ इंडिया।

परिवार के लोग, कुछ पर्यटक जो गेटवे और ताज के गुंबदों को छूने के अहसास वाले पोज में फोटो खिंचा रहे हैं। मैं चुपचाप बैठ जाता हूं। चाय वाला- चाय, चाय,चाय कहकर वहां से गुजरता है लेकिन मेरी तरफ देखता भी नहीं । शायद उसने जान लिया हो- ये काईयां इन्सान है। नहीं पीयेगा चाय। मैं उसे बताना चाहता हूं- मेरे मुंह में अभी तक एक सौ बीस की चाय घुली हुई है, मैं उसे बताना चाहता हूं लेकिन वो मुझे इग्नोर मार निकल लेता है।
ये दस रुपये में कितना चना दे देता है- खत्म ही नहीं हो रहा- एक-एक दाना कुतरा जा रहा हूं। चलो खत्म तो हुआ। अब चला जाय। गेटवे से बाहर निकलने पर एक मार्केट है- इंडियनों के लिए सस्ता, विदेशियों को मंहगा।
एंटीक, कुर्ता, शर्ट सबकुछ। उसके लिए कुछ ले लेता हूं लेकिन कुछ भी पसंद नहीं हो रहा। अपने लिए एक टी-शर्ट लिया है-मुंबई के लोगो वाला। कुछ चक्कर लगा चर्च गेट के लिए टैक्सी ले लेता हूं। शुक्र है इस बार फियेट ही मिली है।

लोकल से संताक्रुज आना है मुझे। लोकल में अब मैं भी सीट पर नहीं बैठता। कई बार तो लटकने या गेट से बाहर झांकने में सुख की तलाश करता हूं, वही सुख जो लाखों मुंबईकरों को हर रोज मिलता है।
इस बीच मैंने लोकल में चढ़ने-उतरने की एक तरकीब खोज निकाली है। आप खुद को भीड़ में घुलने दो। भीड़ की लहरों में खुद को छोड़ दो- धक्का खाते कब बाहर और कब अंदर। बस ख्याल रहे कहीं किसी तीसरे स्टेशन पर अंदर से बाहर मत हो जाना।
इस बीच कुछेक दोस्तों का फोन, कुछ मैसेज का जवाब देते हुए भी मन अच्छा नहीं रहा। कई चीजें एक साथ उभर कर आड़ी-तिरछी खिंच सी गय हैं- काश, कोई दोस्त पेंटर होता- मैं उसे अपनी मन के इस आड़े-तिरछे बातों को बताता और वो इस पेंट करता।
उन एब्सट्रैक्ट रेखाओं से जो चित्र तैयार होती शायद उसमें मैं समझ पाता अपनी जिन्दगी के पन्ने को।

सी लिंक
ऑटो वाले ने ज्यादा घूमा दिया है। रास्ता मुझे याद नहीं रह पाता। पैसा देते समय शायद मैंने पचास का नोट ही थमाया है लेकिन लगा है कि सौ का दिया। ऑटो वाले ने मना किया है मैं बिगड़ गया हूं उसकी जेब पर हाथ डाल दिया है। लेकिन फिर गलती का अहसास हुआ है। शर्म से हाथ पीछे खिंच लिया है। क्या हुआ थोड़ ज्यादा पैसे ही ले लिया तो...वो भी ठीक नहीं कि लिया ही हो। मैं भी उसी सोच का शिकार हो गया- कि ऑटो वाले या गरीब लोग चोर ही होते हैं।
करता रहूं बड़ी-बड़ी बातें- क्या फर्क पड़ जाता है। व्यवहार में नंगई दिख ही जाती है। मैं चुपचाप लिफ्ट में आता हूं- बारहवें फ्लोर की बटन दबा देता हूं।
कल मेरे बाकी साथी फ्लाईट से दिल्ली जा रहे हैं, मैं ट्रेन से। खुद मना कर दिया है फ्लाईट की टिकट के लिए।
शायद एक किताब पढ़ने का लोभ है, या शायद..पता नहीं।

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...