Monday, February 19, 2018

सुख़न के साथी, संघर्षों में गुम गए

सब कुछ बड़ा हो गया था। वो ख़ुद भी। मौसम भी और जीवन भी । सुख हाँ सुख ही था दुनियादारी के सारे ही सुख।
सुख तो था लेकिन भरोसा न था। बिना भरोसा का सुख और साथ सब मिट्टी।

तुम थे तो संघर्ष था। ख़ूब सारे संघर्ष। दुःख और अभाव भी। लेकिन तुम बचे रहे दुःख की , उदासी की सारी नदी में, उम्मीद के सागर में।
तुम एक तिनका थे और तिनके पर ही था कितना सारा भरोसा।

अब के सुख में कई साथी दौड़े चले आते हैं लेकिन संघर्ष है नहीं , तो भरोसा भी नहीं।
तो सबकुछ अधूरा पड़ा है।

Thursday, February 15, 2018

प्रेम की तितलियां और सुअर सा चेहरा

पहले वो सामान्य था। सामान्य से थोड़ा बेहतर ही। बिल्कुल बिल्लियों को तरह। उसकी आँखे थी। और मूंछ भी बिल्लियों की तरह उगे थे। बिल्लियों की तरह ही चंचल था। बिल्लियों की तरह ही घर की रसोई से दुध चुरा लिया करता था। और भागता रहता था।

फिर एक जूलाई की बात है। करीब करीब दो साल पहले वाले जूलाई। उस साल शादियां खूब हुई थीं। शादियों में उसका आना जाना भी हुआ था। कुर्ते खरीदे गए थे। खुश खुश में खूब नाचा गया था।
फिर वो थककर सो गया। उसकी नींद खुली तो वो एक बड़े शहर में था। बीच सड़क पर लेटा हुआ था। उसने झटपट अपनी नींद को विदा किया और सामने लिखे सुलभ शौचालय की तरफ भागा।

वहां एक गंदा सा पुराना सा आईना रखा था। आईने में उसने खुद को देखा। वो देखता क्या है कि उसका चेहरा अपनी जगह से गायब है। वहां चेहरे की जगह सुअर सा कसैला मुंह लिये कोई खड़ा है। उसने अपने हाथ टटोले, पैर को आगे-पीछे किया। नहीं वही था। वही और उसी का चेहरा बिल्लियों सा नहीं रह गया था। सुअर हो चुका था। फिर उसने जैसे-तैसे एक गंदी-फटी-मटमैली जगह तलाशी। वहां बहुत सारी उल्टियां थी।

जब वो बिल्ली था तो एक चिड़िया उसकी दोस्त हुआ करती थी। सुअर वाला चेहरा लेकर उसने सोचा पहले चिड़िया के पास चला जाये। लेकिन फिर उसकी हिम्मत नहीं हुई। उसने सुअर वाले चेहरे को लटकाया। उसके दिमाग में भी सुअर की गंध भरने लगी थी। वो अब सुअर था।

उसने सुअरों जैसा करना शुरू कर दिया। उसने सुअर जैसा ही चुमा। सुअर जैसा ही भागदौड़ मचायी। लोग उसके सुअरपने को देखते हुए भागने लगे।

वो काफी अकेला पड़ गय़ा। लेकिन सुअरपने को नहीं छोड़ा।
अब क्या...

एकदिन एक तितली उस सुअर की पीठ पर आकर बैठ गयी। सुअर के पेट में भी तितलियां चलने लगीं।
सुअर को अपने चिड़ियां दोस्त की याद आयी।
तितली पीठ पर बैठी रही। तमाम डर, आशंकाओं और चिंताओं के बावजूद।

Tuesday, February 13, 2018

ज़िंदगी का नशे में डूब मरना

आसान रहा ज़िंदगी को नशे में डूबते देखना और वजह किसी और को बता देना।
आसान समझता रहा तुम्हारा रोना। कि किसी बटन का दबाने जितना ही। ज़िंदगी को जितना सोचो, बस बीते हुए कल की याद आना।
ये सोचना कि क्यूँ ! और उस बड़े से क्यूँ का यूँ ही डूब मरना।
ज़िंदगी सिल्वीअ और वर्जिन्या के बीच झूलता रहा। लोग अपने हमसफ़र तय कर आगे बढ़ते रहे।
सिल्वीअ तुम कहाँ रह गए। क्या सच में किसी रोज़ दवा खाकर मर गए। या मैंने मारा।
वर्जिन्या भी तो मर रही है हर रोज़ थोड़ा थोड़ा।
बस बचा रह गया मैं पूरा पूरा - हर रोज़ नशे में होश खोता।
चिट्ठियाँ भेजी जाती रहीं। कोई सिरा पकड़ में न आ सका। डाइअरी की एंटरियाँ ठीक शहर में सर्दी शुरू होने से पहले बंद कर दी गयीं।
सर्दियाँ अब जाने को है । प्यार का महीना बीत रहा। लेकिन क्या मज़ाल कि एक पन्ने पर भी कुछ लिखा जा सका हो।

और ये दोस्त ये बुलबुले। ये अर्नस्ट ये बूकाउस्की। ये थे भी कि ख़ाली था भ्रम पाश के होने का, जिसने कहा था ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना।
जबकि उसे कहना था सबसे ख़तरनाक होता है प्रेम का न रह पाना और उससे ज़्यादा उसका न हो पाना और उससे भी ज़्यादा उसे न कर पाना।

भाक साला ज़िंदगी!!

प्यार मुझसे जो किया तो कितना खोया तुमने.....

हवा कनकनी है। फरवरी है और पेड़ पत्तों के बावजूद उदास लटके हैं। ठंड न जाने का नाम ले रही है और न रहने का। याद का भी यही हाल है। जमा है। हर रोज बीच बीच में आता रहता है।
मौसम के मुताबिक उसे अब यहां नहीं होना चाहिए। दुनियादारी भी यही कहती है। मौसम बदलता रहता है। हर किसी को उसके आगे आगे तैयारी करनी पड़ती है।
लेकिन मन कहां मानता है। थोड़ा सा जलाता है. थोड़ा सा प्रतिशोघ की आग से क्षणिक सुख तलाश लेता है। लेकिन फिर लौट आता है वहीं।

कितना भी कर लो जतन आगे नहीं बढ़ पा रहे हम। ईशारों इशारों में बात करने की आदत।
प्यार जो तुमने मुझसे क्या किया पाया...
प्यार जो मुझसे किया तो क्या पाओगे के बीच हम कहीं अटके रह गए।
आँसू भी नहीं निकलते अब जोर जोर से। क्योंकि मौसम को तो बदलना है। हवा में कुछ कुछ बुदबुदाना है। जो दुश्मन समझे मुझे, उसे भी मेरे हिस्से का प्यार मिले..

आमीन आमीन आमीन

Friday, February 9, 2018

प्रेम न कर पाना ही प्रे और म है...

प्रेम को न भूल सकना ही प्रेम है। इतना ही नहीं प्रेम को न कर पाना भी तो प्रेम ही है। और हर रोज जो ख्याल में आये, उसके बारे में लिख न सकना भी प्रेम है।
और जिसे लिख न पाया जा सके और सिर्फ याद ही याद हो...वो भी प्रेम ही है।
और जब जिसे लिखना चाहो और न लिख सको, और जिसे कहना चाहो उसे कह न सको, या उसके बारे में न कह सको तो उस प्रेम में कुछ भी न लिख पाना भी प्रेम ही है।
न कह सको तो चुपचाप सहो...भी प्रेम ही है। याद आये भी और उसे भूलाने की कोशिश में जुटे रह जाना भी प्रेम ही है।
और कुछ न समझ आ सकना भी एक तरह का प्रेम है। शब्दों को भूलना, जीवन का एक ही मकसद न लिख पाने की स्थिति को पाना भी प्रेम ही है, या है प्रतिशोघ।
प्रेम तक जाने वाले सारे पुलों को तोड़ लेना भी प्रेम है। और जहां हो वहां न रह पाना और वापिस न लौट पाना दोनों प्रेम ही है।
जहां हो वहां रह सकना भी प्रेम हो सकता है, बस उसे स्वीकार करने की हिम्मत न भर पाना ही प्रेम है।

प्रेम के इस महीने में एक प्रेम को याद करते हुए, दूसरे प्रेम को जीते हुए...प्रेम न कर पाने का अफसोस लिये...प्रेम के जिन्दाबाद बने रहने का नारा लगाना ही प्रेम है।
आमीन

Friday, November 24, 2017

सोनम गुप्ता नहीं, जिन्दगी बेवफा है...

सुनो
आसान है, किसी सोनम गुप्ता को बेवफा बता देना और अपने रास्ते हो चलना। लेकिन नहीं, वक्त ज्यों ज्यों बीत रहा है समझ में आ रहा है कोई सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है, कोई लड़की प्रेम में सबकुछ हो सकती है लेकिन बेवफा नहीं होती..
वो तो ये स्साली जिन्दगी है जो बेवफाई पर उतर आती है। जिन्दगी ही धोखे देती है, जिन्दगी ही बनाकर निकल जाती है..
मैं तय नहीं कर पाता कई बार, क्या वो सचमुच जिन्दगी थी. या फिर सिर्फ एक लड़की।
लड़की जो प्रेम में डूबी रही...और प्रेम में ही डूब गयी...

कोई दरवाजा तो होगा न...
कोई कविता भी हो सकती है भला
या कोई कहानी
कि कहानी को एक वाक्य में यूं कह दूं...
कि अब तुम याद नहीं आती..

है तो सही झूठ ही
लेकिन झूठ जिन्दगी है और जिन्दगी बेवफा है...

हवा में तैरते हुए सबकुछ कितना सुन्दर है..कितना आसान

सुनो....सुनो...सुनो
कुछ नया शुरू किया है..नये से प्रेम है मुझे, जैसे तुम्हें था मुझसे प्रेम। था कि नहीं...
याद है कि नहीं...
अलविदा

Thursday, November 9, 2017

खुद में गुम होना, बुलंद होना है...

अक्सर मैं खुद को दोषी मानता रहा। हर रिश्ते में, हर दोस्ती में खुद को कम आंकता रहा। मन अजीब से अपराधबोध से ग्रस्त रहा..

धीरे-धीरे वो कमजोर भी पड़ने लगा..लेकिन अब दूसरों की गलतियों को, क्रूरताओं को देख समझ पा रहा हूं..
जाने-अनजाने मैंने खूब सारे लोगों को अपनी जिन्दगी में स्पेस दिया..वे आये, बड़े मजे से रहे और गये तो एक हिस्सा मेरे भीतर का भी लेते गए..

आज भी ऐसे लोग आते रहते हैं, लेकिन मन अब ऊबने लगा है..इन लोगों से और खुद से भी...
मन बहुत गुस्से में है..
गुस्सा है तो एक ताकत भी है...ताकत ये कि अब बस...
दुनिया को स्पेस देना बंद, कोई ईंट फेंके तो उसे जाकर पत्थर तो नहीं मारूंगा..लेकिन दूर से मिडल फिंगर जरुर दिखाउंगा..

और अपने रास्ते आगे बढ़ जाउंगा...


Tuesday, October 24, 2017

गम और खुशी में कोई फर्क महसूस न हो जहां...

सुनो दगाड़िया,
आजकल फर्क पड़ना बंद हो गया है। रात-रात भर लोग पकड़ कर रोते रहते हैं और मुझे अंदर एक इंच भर भी फर्क नहीं पड़ता।

तुम्हारी दिवाली अच्छी रही, ये अच्छा लगा देखकर ।

मैं सोचता हूं दिवाली जैसे वक्तों में क्या तुम्हें याद आती होगी...
मैं तो हमेशा से इन चीजों को तबज्जो नहीं देता था...तुम भी तो उसमें साथ हो जाया करता।
अब तो वो साथ भी नहीं...तो फर्क भी नहीं..

क्या तो लिखने के लिये बैठा था, याद ही नहीं रहता आजकल..
भूल बैठा।
एक अँधेरे में जाकर बैठ गया हूं..न सुख और दुख, न धूप न शाम, बस एक उदासी रहती है..

तुम्हें विदा करने का ख्याल आता है कभी-कभी मन से, पूरा का पूरा
लेकिन मुश्किल है..नहीं शायद नामुमकिन..

प्यार तो था ही हमारे बीच, है भी, साथ हो न हो क्या फर्क पड़ता है- फर्क पड़ता तो है ही.. है न!


आजकल मरने का ख्याल आता है तो सोचता हूं आखरी बात क्या लिख कर जा रहा हूं..क्या वो तुम्हारे लिये लिखा रहेगा...क्या वो आखिरी बात पढ़कर तुम्हें रोना आयेगा..

मरने से पहले भी तुम्हें ही लिखने का ख्याल रहता है...


मैं कितना बुरा रहा..मनोरोगी..क्या तुमने इतना लंबा साथ एक मनोरोगी के साथ बिता दिया...

क्या तुम्हें उन साथ के दिनों में ये ख्याल आया, भान हुआ..या तुम जानबूझकर इग्नोरेंट बने रहे..

रोग का ईलाज करवा रहा हूं वैसे...
मन का क्या किया जाये..अभी समझ नहीं आया है..

Friday, October 20, 2017

पहाड़ों से लेकर खेतों तक तुम याद आये..

सुनो दगड़िया
अभी रात को पंजाब से लौटा हूं। तीन दिन में 900 किलोमीटर बाइक से। खेत-खेत, शहर-कस्बा घूमता रहा। अच्छा अनुभव था, लेकिन एक छोटा सा डर भी।

इस बीच तुम बहुत याद आये। तुम होते तो तुम भी डरते। मुझे मना करते, बाइक से नहीं जाउँ, ऐसा कुछ बोलते। हर दूसरे घंटे तुम्हारा फोन आता और मैं गुस्सा दिखाता, चिढ़ता। अब कोई नहीं है मेरे लिये उस डर को जीने वाला। अब कहीं चला जाता हूं, जंगल, पहाड़, हवा, पानी, आकाश कहीं भी। लेकिन कोई फोन नहीं आता, कोई नहीं पूछता कि कहां पहुंचे?
मैं तो यही चाहता था, मुझे तो अच्छा लगना चाहिए था, लेकिन नहीं लगता। पता नहीं क्यों।
एक मन में ख्याल आता रहा कि अगर इस सफर में कुछ हो जायेगा तो...फिर लगा क्या ही फर्क पड़ता है हो जाने दो...

जीने और मरने का फर्क अब मिटने लगा है धीरे-धीरे।

पंजाब जाने से पहले पहाड़ गया था। वहां भी तुम जहन में बने रहे। हमने साथ कितनी कम यात्राएँ की। तुम हमेशा कहते रहे और मैं डरता रहा और जाने से बचता रहा। अब समझ आता है, तुम्हें खोने से पहले कम से कम खूब सारी यात्राएँ ही कर ली होती, साथ पहाड़, समुद्र, नदी, जंगल देख लिया होता जीभर कर।

खैर, पहाड़ से उतरते हुए वो पुल दिख गया, जहां शायद तुम थे कुछ दिन पहले।
मन कैसा तो हो गया...पुल पर गया और अंदर से जोर से रोना आ गया...
अच्छा लगता है कि तुम जिन्दगी के हजारों रंग को पकड़ने की कोशिश में हूं...
मेरे साथ के बदरंग यादों को उम्मीद है वे हजारों रंग भुला पायेंगे...
शायद

खैर, फिर कभी...

PS- आजकल एक और बेवकूफी कर रहा हूं...तुम्हारे होने के हर संभव पतों पर जाकर तुम्हारी तस्वीरें देखता हूं..

Friday, October 13, 2017

अपनो से दूर होने की अजीब सी जिद्द

सुनो दगाड़िया,
खूबसूरत चीजें ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती, कम से कम मेरे हाथों में तो नहीं। या तो वो खुद चली जाती हैं या फिर मैं जाकर उन्हें बिगाड़ आता हूं।

ये भान तो बहुत पहले से था मुझे, लेकिन तुम्हारे जाने के बाद ये लगभग पक्का हो गया। अजीब होता जा रहा हूं। एक शून्य सा लगता है अंदर। बहरहाल, बाहर भी कम उथलपुथल नहीं है। सबसे करीबी दोस्त ने कल मैसेज किया हम अब दोस्त नहीं बने रह सकते। तुम अपने दुख नहीं साझा कर रहे।
मैं चुप रहा, दोस्ती शायद खत्म हो गयी, लेकिन मैं शून्य में हूं। कोई फर्क नहीं पड़ रहा। कुछेक और अपने मुझसे परेशान हो चले हैं, मनाते हैं, रोते हैं, और फिर चुप होकर चले जाते हैं। मैं शून्य में ताकता रहता हूं। कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

क्यों, ये समझ नहीं आता। कहीं अंदर दम घुटने जैसा लगता है। इस दफे अजीब सी जिद्द पाल ली है। सबसे दूर जाने की।

इधर सोच रहा था, तुम होते तो इस बात पर बहस करता, उस काम को साथ करते।
कहीं बाहर जाते, ये करते वो करते...कितना कुछ किया जाना रह गया...
खैर,
फिर कभी

Monday, October 9, 2017

प्रेम में बचे रह गए सवाल

सुनो दगाड़िया,
तीन दिन से ये चिट्ठी लिखने की सोच रहा हूं। मन में बहुत उहापोह है इसे लिखे जाने को लेकर। लेकिन दूसरी तरफ लगातार मन इसी के बारे में सोचता रहा है। कि ये लिखना है, वो लिखना है...

क्यों लिखना है..दरअसल इस बीच जितनी भी घबराहट, उदासी, बेचैनी हुई है उसकी एक वजह है तुमसे बात न हो पाना। प्रेम से पहले हम दोस्त थे। काफी गहरी दोस्ती थी। तो सारी बातें तुम्हें बताने की आदत थी। सबकुछ बांट कर हल्का हो जाने की प्रैक्टिस रही सालों। हालांकि पिछले कुछ साल में ये कम होता चला गया।

खैर, पहले इन चिट्ठियों में जो लिख रहा हूं उन्हें डायरी में दर्ज कर लिया करता था। क्योंकि पता था तुम उसे पढ़ोगी। अब वो उम्मीद नहीं है, तो डायरी में लिखनेे का भी कोई मतलब नहीं समझ आता।

इसलिए यहां लिख ले रहा हूं...

कमजोर पड़ने लगा हूं। दो दिन पहले एक दोस्त से मिलने गया। चाय पीते-पीते फूट-फूट कर रोने लगा। रास्ता चलते भी पता नहीं क्यों झर-झर आँसू बहने लगते हैं। कोई खास वजह समझ नहीं आता। बस रोना आता है। छोटी-छोटी चीजों पर भी औऱ बिना किसी चीज के भी। पंखे को ताकते-ताकते रोने लगता हूं।

उसी दिन एक और दोस्त के यहां गया। फोन पर किसी को जोर से डांटने लगा और फिर उसके सामने आधा घंटा रोता रहा। आजकल आईने में देखता हूं खुद को और रोने लगता हूं। क्या हालत हो गयी...
खैर, अब कंघी करने के लिये भी आईना देखना बंद कर दिया है।


दोस्तों को, घर को सबको डांटकर, भगाकर नाराज कर दे रहा हूं। सबकी चिंता समझता हूं खुद के लिये लेकिन मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है ऐसा लगता है।

खैर, डॉक्टर से आज टाइम लिया है...दिखवाउंगा..

फिलहाल लग रहा है जितना लोगों के बीच हूं उतना अकेला हूं, इन दिनों तुम्हें बहुत याद करता हूं..हर सेकेंड लगभग।

प्रेम में अगर सवाल बचे रह जायें तो वो प्रेम समाप्त नहीं होता...
खैर, क्या मैंने कभी प्रेम किया भी था ?

या सिर्फ गलतियां की?
खुद से ही पूछता रहता हूं...

मेरा ईगो और गुस्सा जीत रहा है, मैं हार रहा हूं...प्रेम करना नहीं आया..

तब भी समझता था, आजकल ज्यादा समझ आ रहा है...मेरे जैसे 'मर्द' को प्रेम करने से बचना चाहिए..जो अपने जिये में भयानक रूप से 'दोगले' हो चुके हैं.

बाकी फिर कभी...


Friday, October 6, 2017

तुम्हारे राहों तक जाती है सारे कदम मेरे

सुनो दगड़िया,
परेशान हो गया हूं। रात दिन तुम्हें ही याद करता हूं। तुम्हारे प्रेम को शायद उतना नहीं लेकिन दोस्ती को। हमारी दोस्ती बहुत याद आती है साथी। आजकल पुराने दिनों को याद करता हूं। शुरूआती दिन जब हम दोस्त थे। जब हमारे बीच प्रेम था, लेकिन प्रेम वाला रिश्ता नहीं था। दो-तीन साल तो रहे होंगे ऐसे।

उन्हीं दिनों जब यूनिवर्सिटी के आसपास चलते हुए मन में एक छिपी हुई उम्मीद चलती थी कि तुम ऐसे ही राह चलते टकरा जाआगी। और हम मिलेंगे, तुम हड़बड़ी में रहोगी, मैं हाल-चाल पूछूंगा और तुम अपने रास्ते चली जाओगी।

कैसे न दिन थे वे। कितना कुछ उन दिनों का स्मृतियों में जा फंसा है। साथ के सात सालों में कभी तुम्हें बताया नहीं। काश कि बता पाता। काश कि....खैर जाने दो।

तुम अक्सर

मुझे समझ नहीं आ रहा। पूरी दुनिया से लड़ाई जैसी हालत हो गयी है। न किसी से मिलना, न किसी से बात करना, कुछ भी ऐसा नहीं जिसका मन रह गया हो।

बस अकेले कमरे में बैठे रोते रहने में ही सुकून नजर आने लगा है।
ये चिट्ठी बहुत चोरी-छिपे लिख रहा हूं, कि नहीं चाहता इन चिट्ठियों तक कभी तुम पहुंचो...कभी नहीं...

ख्याल बना रहता है....तुम्हारा ही
तुम्हारी तबीयत का
तुम्हारे गुस्से की अब कोई याद नहीं आती, रोना याद आता है..
जनवरी की वह दोपहर याद आता है, जब लौट रहा था इस शहर से और तुम रो रहे थे...

यहां अकेला पड़ता गया हूं...ऐसा नहीं कि लोग नहीं हैं...बहुत लोग हैं..बहुत सारे
कोशिश करते रहते हैं मिलने की, बात करने की, अपनी खुशी में शामिल करने की...लेकिन मैं एक-दो-तीन कदम चलकर फिर लौट आता हूं...
नहीं चल पाता उनके साथ...


लगता है तुम नहीं हो तो फिर कुछ भी नहीं...किसी के भी होने का कोई मतलब नहीं..शायद इसलिए अपने आसपास के सारे लोगों से भी कटता चल रहा हूं..
खैर,
मन भर रहा है इतना लिखने में ही...

फिर कभी
और
विदा

Thursday, June 22, 2017

बदलते गाँव

21वीं सदी का गाँव मजेदार है। बहुत से परिवार में लड़कियां पहली बार मैट्रिक बोर्ड दे रही हैं। पढ़ने के लिए वे अपने घर में लड़ रही हैं। साइकिल से बाजार-शहर सब जा रही हैं। वे सिर्फ़ प्रेम ही नहीं कर रही हैं बल्कि पसंद के लड़के से शादी भी कर रही हैं।

मोबाइल ने क्रांति लायी है। रेडियो बीते जमाने की बात हो चली है। अब घर-घर टीवी आने लगा है। दूरदर्शन नहीं केबल चैनल है। दुनिया-जहान की लोगों को खबर है। लगभग हर दूसरे-तीसरे  घर में मोटरसाइकिल खरीदा जाने लगा है। मनरेगा और भोजन का अधिकार जैसी योजनाओं ने मजदूरों के जीवन-स्तर को बदल कर रख दिया है। ठीक है योजनाओं में जबरदस्त भ्रष्टाचार है। लेकिन इसी मनरेगा ने गाँवों में मजदूरी बढ़ायी है। अक्सर कथित ऊंची जातियों के लोग आपको इन प्रगतिशील योजनाओं का विरोध करते दिख जाते हैं।
उनको गुस्सा है बंधुआ मजदूरी खत्म हो गया।

गाँव में स्कूलों की संख्या बढ़ी है। गरीब बच्चों को स्कॉलरशिप दिया जा रहा है। 
गाँव के पुराने लोग बताते हैं- पहले गरीब के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। आज वे सरकारी अस्पताल में पैदा होते हैं। डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध है। महिलाओं को चक्की नहीं पीसनी पड़ती , उसके लिए गली-गली आटा मिल है। पानी के लिए एक किलोमीटर दूर किसी के कुंए पर नहीं जाना पड़ता, अब घर-घर सरकारी हैंडपंप है।

गरीब शहर जा रहा है। नौकरियों में जा रहा है। मेहनत-मजदूरी करके लौटकर छोटे-छोटे जमीन खरीद रहा है और अपना जीवनस्तर बेहतर कर रहा है।
अपने बच्चों को पढ़ाने की चिन्ता कर रहा है। उनको कानून की समझ है। पंचायत चुनाव में महिलाओं-दलितों-पिछड़ों को आरक्षण है। भले अभी महिलाओं के पति ही चुनाव-पोस्टर पर दिखते हैं, लेकिन इसी बहाने हजारों सालों से घर में कैद औरतें घर की दहलीज लांघ रही हैं। एक चुनाव-दो चुनाव के बाद वैसा वक्त भी आने वाला ही है जब ‘मुखिया पति’ पोस्टर से गायब होंगे। सवर्ण जातियों में इस बदलाव को लेकर गुस्सा है। अभी उनकी स्थिति खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे जैसी है। उनके लिए तो जितनी जल्दी इस बदलाव को समझ लें, उतना अच्छा है।
कानून और संविधान ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को बहुत मजबूत बनाया है और उसमें आर्थिक पहलू को भी जोड़ा है।

शहरी नजरिए से देखो तो ये सब हो सकता है छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन करोड़ों बहुजन के जीवन में असल परिवर्तन आया है। सवर्ण जाति के लोग इन सब परिवर्तनों से चिढ़ते हैं। उनकी शिकायत है- जमाना खराब हो गया है। घोर कलियुग आ गया है, जबकि बहुजनों के लिए ये असल सुराज है। इस सुराज के असल हीरो अंबेडकर हैं, उनका लिखा संविधान है।

भले हमारा समाज, गाँव आधा भी नहीं बदला है। अभी बहुत कुछ बदलना है। बहुजनों की हिस्सेदारी और मजबूत होनी है। उन्हें नये मकाम बनाने हैं। लेकिन इन सब चुनौतियों के बीच इन छोटे छोटे बदलावों को दर्ज करना जरुरी है।

लोहाघाट की तस्वीरें



















Monday, June 19, 2017

थोड़ा सा बाहर भी टहलिये..

फेसबुक से बाहर झांकने की जरुरत है। अपने आसपास की रोजमर्रा की जिन्दगी से भी बाहर ताक-झांक करना जरुरी है। अपने तरह के, अपने ही सर्कल के, काम-धंधे के लोगों से इतर लोगों से मिलना जरुरी है।
शहर में हो, दिल्ली में हो तो थोड़ा बाहर निकलना बहुत जरुरी है। वीकेंड में नये लोगों से मिलना जरुरी है। दिल्ली में हो तो बस्तियों में जाना जरुरी है, लोगों की जिन्दगी देखना जरुरी है, उनकी कहानियों को सुनना जरुरी है। अजनबी लोगों से मिले प्यार आपको अंचभित कर देंगे- फेसबुक पर वो स्नेह खोजे नहीं मिलेगा। वीकेंड में शहर की सीमा से थोड़ा दूर निकल जाईये...खेतों में जाईये, नदी के पास जाकर बैठिये, नये-नये लोगों से मिलिये, फेसबुक वाले दोस्तों से बार-बार मिलने से बचिये।
देखिये जिन्दगी देखने का नजरिया बदल जायेगा। सही-गलत से परे, लेफ्ट-राईट से इतर, मोदी-फोदी से बहुत दूर एक खूबसूरत दुनिया है, उसे भी जानना जरुरी है। उस दुनिया की मुश्किलें हैं उन्हें जानना जरुरी है। आपके लिखे में सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया से प्राप्त ज्ञान है तो दिक्कत है, सिर्फ और सिर्फ किताबी अनुभव है तो दिक्कत है।
बदलिये...बदलिये क्योंकि बदलना जरुरी है। नहीं तो ये पॉपुलर कम्यूनिकेशन के सारे टूल्स आपको बिमार बना रहे हैं।
सोशल मीडिया बहुत जरुरी है, बहुत अहम है, लेकिन ऑफ्टरऑल बैलेंस उससे भी ज्यादा जरुरी है।