Thursday, November 9, 2017

खुद में गुम होना, बुलंद होना है...

अक्सर मैं खुद को दोषी मानता रहा। हर रिश्ते में, हर दोस्ती में खुद को कम आंकता रहा। मन अजीब से अपराधबोध से ग्रस्त रहा..

धीरे-धीरे वो कमजोर भी पड़ने लगा..लेकिन अब दूसरों की गलतियों को, क्रूरताओं को देख समझ पा रहा हूं..
जाने-अनजाने मैंने खूब सारे लोगों को अपनी जिन्दगी में स्पेस दिया..वे आये, बड़े मजे से रहे और गये तो एक हिस्सा मेरे भीतर का भी लेते गए..

आज भी ऐसे लोग आते रहते हैं, लेकिन मन अब ऊबने लगा है..इन लोगों से और खुद से भी...
मन बहुत गुस्से में है..
गुस्सा है तो एक ताकत भी है...ताकत ये कि अब बस...
दुनिया को स्पेस देना बंद, कोई ईंट फेंके तो उसे जाकर पत्थर तो नहीं मारूंगा..लेकिन दूर से मिडल फिंगर जरुर दिखाउंगा..

और अपने रास्ते आगे बढ़ जाउंगा...


Tuesday, October 24, 2017

गम और खुशी में कोई फर्क महसूस न हो जहां...

सुनो दगाड़िया,
आजकल फर्क पड़ना बंद हो गया है। रात-रात भर लोग पकड़ कर रोते रहते हैं और मुझे अंदर एक इंच भर भी फर्क नहीं पड़ता।

तुम्हारी दिवाली अच्छी रही, ये अच्छा लगा देखकर ।

मैं सोचता हूं दिवाली जैसे वक्तों में क्या तुम्हें याद आती होगी...
मैं तो हमेशा से इन चीजों को तबज्जो नहीं देता था...तुम भी तो उसमें साथ हो जाया करता।
अब तो वो साथ भी नहीं...तो फर्क भी नहीं..

क्या तो लिखने के लिये बैठा था, याद ही नहीं रहता आजकल..
भूल बैठा।
एक अँधेरे में जाकर बैठ गया हूं..न सुख और दुख, न धूप न शाम, बस एक उदासी रहती है..

तुम्हें विदा करने का ख्याल आता है कभी-कभी मन से, पूरा का पूरा
लेकिन मुश्किल है..नहीं शायद नामुमकिन..

प्यार तो था ही हमारे बीच, है भी, साथ हो न हो क्या फर्क पड़ता है- फर्क पड़ता तो है ही.. है न!


आजकल मरने का ख्याल आता है तो सोचता हूं आखरी बात क्या लिख कर जा रहा हूं..क्या वो तुम्हारे लिये लिखा रहेगा...क्या वो आखिरी बात पढ़कर तुम्हें रोना आयेगा..

मरने से पहले भी तुम्हें ही लिखने का ख्याल रहता है...


मैं कितना बुरा रहा..मनोरोगी..क्या तुमने इतना लंबा साथ एक मनोरोगी के साथ बिता दिया...

क्या तुम्हें उन साथ के दिनों में ये ख्याल आया, भान हुआ..या तुम जानबूझकर इग्नोरेंट बने रहे..

रोग का ईलाज करवा रहा हूं वैसे...
मन का क्या किया जाये..अभी समझ नहीं आया है..

Friday, October 20, 2017

पहाड़ों से लेकर खेतों तक तुम याद आये..

सुनो दगड़िया
अभी रात को पंजाब से लौटा हूं। तीन दिन में 900 किलोमीटर बाइक से। खेत-खेत, शहर-कस्बा घूमता रहा। अच्छा अनुभव था, लेकिन एक छोटा सा डर भी।

इस बीच तुम बहुत याद आये। तुम होते तो तुम भी डरते। मुझे मना करते, बाइक से नहीं जाउँ, ऐसा कुछ बोलते। हर दूसरे घंटे तुम्हारा फोन आता और मैं गुस्सा दिखाता, चिढ़ता। अब कोई नहीं है मेरे लिये उस डर को जीने वाला। अब कहीं चला जाता हूं, जंगल, पहाड़, हवा, पानी, आकाश कहीं भी। लेकिन कोई फोन नहीं आता, कोई नहीं पूछता कि कहां पहुंचे?
मैं तो यही चाहता था, मुझे तो अच्छा लगना चाहिए था, लेकिन नहीं लगता। पता नहीं क्यों।
एक मन में ख्याल आता रहा कि अगर इस सफर में कुछ हो जायेगा तो...फिर लगा क्या ही फर्क पड़ता है हो जाने दो...

जीने और मरने का फर्क अब मिटने लगा है धीरे-धीरे।

पंजाब जाने से पहले पहाड़ गया था। वहां भी तुम जहन में बने रहे। हमने साथ कितनी कम यात्राएँ की। तुम हमेशा कहते रहे और मैं डरता रहा और जाने से बचता रहा। अब समझ आता है, तुम्हें खोने से पहले कम से कम खूब सारी यात्राएँ ही कर ली होती, साथ पहाड़, समुद्र, नदी, जंगल देख लिया होता जीभर कर।

खैर, पहाड़ से उतरते हुए वो पुल दिख गया, जहां शायद तुम थे कुछ दिन पहले।
मन कैसा तो हो गया...पुल पर गया और अंदर से जोर से रोना आ गया...
अच्छा लगता है कि तुम जिन्दगी के हजारों रंग को पकड़ने की कोशिश में हूं...
मेरे साथ के बदरंग यादों को उम्मीद है वे हजारों रंग भुला पायेंगे...
शायद

खैर, फिर कभी...

PS- आजकल एक और बेवकूफी कर रहा हूं...तुम्हारे होने के हर संभव पतों पर जाकर तुम्हारी तस्वीरें देखता हूं..

Friday, October 13, 2017

अपनो से दूर होने की अजीब सी जिद्द

सुनो दगाड़िया,
खूबसूरत चीजें ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती, कम से कम मेरे हाथों में तो नहीं। या तो वो खुद चली जाती हैं या फिर मैं जाकर उन्हें बिगाड़ आता हूं।

ये भान तो बहुत पहले से था मुझे, लेकिन तुम्हारे जाने के बाद ये लगभग पक्का हो गया। अजीब होता जा रहा हूं। एक शून्य सा लगता है अंदर। बहरहाल, बाहर भी कम उथलपुथल नहीं है। सबसे करीबी दोस्त ने कल मैसेज किया हम अब दोस्त नहीं बने रह सकते। तुम अपने दुख नहीं साझा कर रहे।
मैं चुप रहा, दोस्ती शायद खत्म हो गयी, लेकिन मैं शून्य में हूं। कोई फर्क नहीं पड़ रहा। कुछेक और अपने मुझसे परेशान हो चले हैं, मनाते हैं, रोते हैं, और फिर चुप होकर चले जाते हैं। मैं शून्य में ताकता रहता हूं। कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

क्यों, ये समझ नहीं आता। कहीं अंदर दम घुटने जैसा लगता है। इस दफे अजीब सी जिद्द पाल ली है। सबसे दूर जाने की।

इधर सोच रहा था, तुम होते तो इस बात पर बहस करता, उस काम को साथ करते।
कहीं बाहर जाते, ये करते वो करते...कितना कुछ किया जाना रह गया...
खैर,
फिर कभी

Monday, October 9, 2017

प्रेम में बचे रह गए सवाल

सुनो दगाड़िया,
तीन दिन से ये चिट्ठी लिखने की सोच रहा हूं। मन में बहुत उहापोह है इसे लिखे जाने को लेकर। लेकिन दूसरी तरफ लगातार मन इसी के बारे में सोचता रहा है। कि ये लिखना है, वो लिखना है...

क्यों लिखना है..दरअसल इस बीच जितनी भी घबराहट, उदासी, बेचैनी हुई है उसकी एक वजह है तुमसे बात न हो पाना। प्रेम से पहले हम दोस्त थे। काफी गहरी दोस्ती थी। तो सारी बातें तुम्हें बताने की आदत थी। सबकुछ बांट कर हल्का हो जाने की प्रैक्टिस रही सालों। हालांकि पिछले कुछ साल में ये कम होता चला गया।

खैर, पहले इन चिट्ठियों में जो लिख रहा हूं उन्हें डायरी में दर्ज कर लिया करता था। क्योंकि पता था तुम उसे पढ़ोगी। अब वो उम्मीद नहीं है, तो डायरी में लिखनेे का भी कोई मतलब नहीं समझ आता।

इसलिए यहां लिख ले रहा हूं...

कमजोर पड़ने लगा हूं। दो दिन पहले एक दोस्त से मिलने गया। चाय पीते-पीते फूट-फूट कर रोने लगा। रास्ता चलते भी पता नहीं क्यों झर-झर आँसू बहने लगते हैं। कोई खास वजह समझ नहीं आता। बस रोना आता है। छोटी-छोटी चीजों पर भी औऱ बिना किसी चीज के भी। पंखे को ताकते-ताकते रोने लगता हूं।

उसी दिन एक और दोस्त के यहां गया। फोन पर किसी को जोर से डांटने लगा और फिर उसके सामने आधा घंटा रोता रहा। आजकल आईने में देखता हूं खुद को और रोने लगता हूं। क्या हालत हो गयी...
खैर, अब कंघी करने के लिये भी आईना देखना बंद कर दिया है।


दोस्तों को, घर को सबको डांटकर, भगाकर नाराज कर दे रहा हूं। सबकी चिंता समझता हूं खुद के लिये लेकिन मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है ऐसा लगता है।

खैर, डॉक्टर से आज टाइम लिया है...दिखवाउंगा..

फिलहाल लग रहा है जितना लोगों के बीच हूं उतना अकेला हूं, इन दिनों तुम्हें बहुत याद करता हूं..हर सेकेंड लगभग।

प्रेम में अगर सवाल बचे रह जायें तो वो प्रेम समाप्त नहीं होता...
खैर, क्या मैंने कभी प्रेम किया भी था ?

या सिर्फ गलतियां की?
खुद से ही पूछता रहता हूं...

मेरा ईगो और गुस्सा जीत रहा है, मैं हार रहा हूं...प्रेम करना नहीं आया..

तब भी समझता था, आजकल ज्यादा समझ आ रहा है...मेरे जैसे 'मर्द' को प्रेम करने से बचना चाहिए..जो अपने जिये में भयानक रूप से 'दोगले' हो चुके हैं.

बाकी फिर कभी...


Friday, October 6, 2017

तुम्हारे राहों तक जाती है सारे कदम मेरे

सुनो दगड़िया,
परेशान हो गया हूं। रात दिन तुम्हें ही याद करता हूं। तुम्हारे प्रेम को शायद उतना नहीं लेकिन दोस्ती को। हमारी दोस्ती बहुत याद आती है साथी। आजकल पुराने दिनों को याद करता हूं। शुरूआती दिन जब हम दोस्त थे। जब हमारे बीच प्रेम था, लेकिन प्रेम वाला रिश्ता नहीं था। दो-तीन साल तो रहे होंगे ऐसे।

उन्हीं दिनों जब यूनिवर्सिटी के आसपास चलते हुए मन में एक छिपी हुई उम्मीद चलती थी कि तुम ऐसे ही राह चलते टकरा जाआगी। और हम मिलेंगे, तुम हड़बड़ी में रहोगी, मैं हाल-चाल पूछूंगा और तुम अपने रास्ते चली जाओगी।

कैसे न दिन थे वे। कितना कुछ उन दिनों का स्मृतियों में जा फंसा है। साथ के सात सालों में कभी तुम्हें बताया नहीं। काश कि बता पाता। काश कि....खैर जाने दो।

तुम अक्सर

मुझे समझ नहीं आ रहा। पूरी दुनिया से लड़ाई जैसी हालत हो गयी है। न किसी से मिलना, न किसी से बात करना, कुछ भी ऐसा नहीं जिसका मन रह गया हो।

बस अकेले कमरे में बैठे रोते रहने में ही सुकून नजर आने लगा है।
ये चिट्ठी बहुत चोरी-छिपे लिख रहा हूं, कि नहीं चाहता इन चिट्ठियों तक कभी तुम पहुंचो...कभी नहीं...

ख्याल बना रहता है....तुम्हारा ही
तुम्हारी तबीयत का
तुम्हारे गुस्से की अब कोई याद नहीं आती, रोना याद आता है..
जनवरी की वह दोपहर याद आता है, जब लौट रहा था इस शहर से और तुम रो रहे थे...

यहां अकेला पड़ता गया हूं...ऐसा नहीं कि लोग नहीं हैं...बहुत लोग हैं..बहुत सारे
कोशिश करते रहते हैं मिलने की, बात करने की, अपनी खुशी में शामिल करने की...लेकिन मैं एक-दो-तीन कदम चलकर फिर लौट आता हूं...
नहीं चल पाता उनके साथ...


लगता है तुम नहीं हो तो फिर कुछ भी नहीं...किसी के भी होने का कोई मतलब नहीं..शायद इसलिए अपने आसपास के सारे लोगों से भी कटता चल रहा हूं..
खैर,
मन भर रहा है इतना लिखने में ही...

फिर कभी
और
विदा

Thursday, June 22, 2017

बदलते गाँव

21वीं सदी का गाँव मजेदार है। बहुत से परिवार में लड़कियां पहली बार मैट्रिक बोर्ड दे रही हैं। पढ़ने के लिए वे अपने घर में लड़ रही हैं। साइकिल से बाजार-शहर सब जा रही हैं। वे सिर्फ़ प्रेम ही नहीं कर रही हैं बल्कि पसंद के लड़के से शादी भी कर रही हैं।

मोबाइल ने क्रांति लायी है। रेडियो बीते जमाने की बात हो चली है। अब घर-घर टीवी आने लगा है। दूरदर्शन नहीं केबल चैनल है। दुनिया-जहान की लोगों को खबर है। लगभग हर दूसरे-तीसरे  घर में मोटरसाइकिल खरीदा जाने लगा है। मनरेगा और भोजन का अधिकार जैसी योजनाओं ने मजदूरों के जीवन-स्तर को बदल कर रख दिया है। ठीक है योजनाओं में जबरदस्त भ्रष्टाचार है। लेकिन इसी मनरेगा ने गाँवों में मजदूरी बढ़ायी है। अक्सर कथित ऊंची जातियों के लोग आपको इन प्रगतिशील योजनाओं का विरोध करते दिख जाते हैं।
उनको गुस्सा है बंधुआ मजदूरी खत्म हो गया।

गाँव में स्कूलों की संख्या बढ़ी है। गरीब बच्चों को स्कॉलरशिप दिया जा रहा है। 
गाँव के पुराने लोग बताते हैं- पहले गरीब के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। आज वे सरकारी अस्पताल में पैदा होते हैं। डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध है। महिलाओं को चक्की नहीं पीसनी पड़ती , उसके लिए गली-गली आटा मिल है। पानी के लिए एक किलोमीटर दूर किसी के कुंए पर नहीं जाना पड़ता, अब घर-घर सरकारी हैंडपंप है।

गरीब शहर जा रहा है। नौकरियों में जा रहा है। मेहनत-मजदूरी करके लौटकर छोटे-छोटे जमीन खरीद रहा है और अपना जीवनस्तर बेहतर कर रहा है।
अपने बच्चों को पढ़ाने की चिन्ता कर रहा है। उनको कानून की समझ है। पंचायत चुनाव में महिलाओं-दलितों-पिछड़ों को आरक्षण है। भले अभी महिलाओं के पति ही चुनाव-पोस्टर पर दिखते हैं, लेकिन इसी बहाने हजारों सालों से घर में कैद औरतें घर की दहलीज लांघ रही हैं। एक चुनाव-दो चुनाव के बाद वैसा वक्त भी आने वाला ही है जब ‘मुखिया पति’ पोस्टर से गायब होंगे। सवर्ण जातियों में इस बदलाव को लेकर गुस्सा है। अभी उनकी स्थिति खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे जैसी है। उनके लिए तो जितनी जल्दी इस बदलाव को समझ लें, उतना अच्छा है।
कानून और संविधान ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को बहुत मजबूत बनाया है और उसमें आर्थिक पहलू को भी जोड़ा है।

शहरी नजरिए से देखो तो ये सब हो सकता है छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन करोड़ों बहुजन के जीवन में असल परिवर्तन आया है। सवर्ण जाति के लोग इन सब परिवर्तनों से चिढ़ते हैं। उनकी शिकायत है- जमाना खराब हो गया है। घोर कलियुग आ गया है, जबकि बहुजनों के लिए ये असल सुराज है। इस सुराज के असल हीरो अंबेडकर हैं, उनका लिखा संविधान है।

भले हमारा समाज, गाँव आधा भी नहीं बदला है। अभी बहुत कुछ बदलना है। बहुजनों की हिस्सेदारी और मजबूत होनी है। उन्हें नये मकाम बनाने हैं। लेकिन इन सब चुनौतियों के बीच इन छोटे छोटे बदलावों को दर्ज करना जरुरी है।

लोहाघाट की तस्वीरें



















Monday, June 19, 2017

थोड़ा सा बाहर भी टहलिये..

फेसबुक से बाहर झांकने की जरुरत है। अपने आसपास की रोजमर्रा की जिन्दगी से भी बाहर ताक-झांक करना जरुरी है। अपने तरह के, अपने ही सर्कल के, काम-धंधे के लोगों से इतर लोगों से मिलना जरुरी है।
शहर में हो, दिल्ली में हो तो थोड़ा बाहर निकलना बहुत जरुरी है। वीकेंड में नये लोगों से मिलना जरुरी है। दिल्ली में हो तो बस्तियों में जाना जरुरी है, लोगों की जिन्दगी देखना जरुरी है, उनकी कहानियों को सुनना जरुरी है। अजनबी लोगों से मिले प्यार आपको अंचभित कर देंगे- फेसबुक पर वो स्नेह खोजे नहीं मिलेगा। वीकेंड में शहर की सीमा से थोड़ा दूर निकल जाईये...खेतों में जाईये, नदी के पास जाकर बैठिये, नये-नये लोगों से मिलिये, फेसबुक वाले दोस्तों से बार-बार मिलने से बचिये।
देखिये जिन्दगी देखने का नजरिया बदल जायेगा। सही-गलत से परे, लेफ्ट-राईट से इतर, मोदी-फोदी से बहुत दूर एक खूबसूरत दुनिया है, उसे भी जानना जरुरी है। उस दुनिया की मुश्किलें हैं उन्हें जानना जरुरी है। आपके लिखे में सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया से प्राप्त ज्ञान है तो दिक्कत है, सिर्फ और सिर्फ किताबी अनुभव है तो दिक्कत है।
बदलिये...बदलिये क्योंकि बदलना जरुरी है। नहीं तो ये पॉपुलर कम्यूनिकेशन के सारे टूल्स आपको बिमार बना रहे हैं।
सोशल मीडिया बहुत जरुरी है, बहुत अहम है, लेकिन ऑफ्टरऑल बैलेंस उससे भी ज्यादा जरुरी है।

Tuesday, May 30, 2017

हिन्दी पत्रकारिता का फेसबुक काल...

साल 2011 की बात है। तब मैं भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में हिन्दी पत्रकारिता का स्टूडेंट था। आईआईएमसी पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान है। उस समय हमारे सिलेबस में वेब पत्रकारिता नाम का एक चैप्टर था, जिसके लिये दस नंबर तय किये गए थे।

हमारे लिये पत्रकारिता का मतलब टीवी और अखबार ही थे। वेबसाइट के लिये पत्रकारिता करने का शायद ही किसी ने सोचा होगा। उसी संस्थान में हमारे एक टीचर थे दिलीप मंडल। दशकों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में सीनियर जगहों पर रह चुके एक वरिष्ठ पत्रकार। मीडिया पर किताब लिखने के लिये कई पुरस्कार से सम्मानित। बाद में आईआईएमसी से निकलकर इंडिया टुडे मैगजीन के मैनेजिंग एडिटर भी बने। दिलीप मंडल का जिक्र इसलिए क्योंकि वे हमें क्लास में एक बात कहा करते थे, वे कहते थे- आज हर कोई पत्रकारिता कर सकता है, आज दस रुपये की पत्रकारिता का जमाना है। उनके कहने का मतलब हुआ करता था कि साईबर कैफे में एक घंटे के दस रूपये लिये जाते थे, और उस कैफे में बैठकर कोई भी फेसबुक या ट्विटर पर अपनी बात, अपनी खबर कह सकता है। अगर खबर में दम होगा तो वो दूर तक चला जायेगा।

मुझे याद है हम उनकी बातों पर यकीन नहीं किया करते थे, मतलब सिर्फ फेसबुक पर पत्रकारिता की बात हमें थोड़ी कम समझ आती थी। वक्त बदला, देश में 3जी क्रांति आयी, विडियो, इन्टरनेट पैक, स्मार्टफोन का तेजी से फैलाव हुआ। आज 2017 है। करीब छह साल का वक्त गुजर चुका है। अब दिलीप सर की बात बिल्कुल सच दिखायी दे रही है।
स्मार्टफोन ने क्रांति ला दिया है, पत्रकारिता की परिभाषा बदल गयी है और इन सबमें सबसे खास बात है कि हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता भी कदमताल कर रहा है या यूं कहिये कि हिन्दी दो कदम आगे चल रही है।
हिन्दी पत्रकारिता के इस दौर के इतिहास को जब भी लिखा जायेगा तो सोशल मीडिया की पत्रकारिता को भी उतनी ही मजबूती से दर्ज किया जायेगा। पेपर, रेडियो, टीवी से होते हुए आज हम सब सोशल मीडिया के इस पत्रकारिता को देख रहे हैँ।

मुख्यधारा की लगभग सभी हिन्दी मीडिया हाउस सोशल मीडिया पर हैं, वे विडियो, टेक्सट्, तस्वीर, ऑडियो सब कर रहे हैं। पहले होता यूं था कि कोई खबर अखबार में आती थी, फिर वहां से टीवी तक पहुंचती थी और फिर उसपर सोशल मीडिया में बहस का सिलसिला चलता था। फिर अखबार की जगह टीवी ने ले ली और आज सोशल मीडिया मुख्यधारा की मीडिया में एक ट्रेंड सेट करने की हैसियत में है।

हिन्दी पत्रकारिता आज अपनी सालगिरह मना रहा है तो यह दर्ज करना जरुरी है कि सोशल मीडिया पर हिन्दी पत्रकारिता ने कितने मठों को लगभग उजाड़ बना दिया है। कई ऐसे सर्वे आ चुके हैं जो बताते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता पर एक खास जाति के लोगों का कब्जा है, या तो संपादकों की तुती बोलती है, या फिर मालिकों की। सिफारिशों पर, भाई-भतीजावाद के आधार पर धड़ल्ले से पत्रकार बनाये जा रहे हैं, नौकरियां बांटी जा रही है, ऐसे में हाशिये के कई सवाल पत्रकारिता से गायब कर दिये जाते रहे। खासकर दलित-पिछड़ों, महिलाओं और मुसलमानों के बारे में खबर करते हुए एक खास तरह का पूर्वाग्रह दिखता रहा है। यही वजह है कि आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर हिन्दी पत्रकारिता बेहद पक्षपाती रिपोर्टिंग करता रहा है, इसी तरह बाबरी विंध्वस के वक्त भी हिन्दी पत्रकारिता के पूर्वाग्रह सामने आये।

लेकिन आज उन मीडिया हाउस पर विश्वसनियता का संकट गहरा हो चला है। दलितों की जंतर-मंतर पर रैली होती है, उसमें जनसैलाब उमड़ता है, फिर भी हिन्दी के संपादक उसे अपने यहां जगह नहीं देते। लेकिन वही रैली फेसबुक के माध्यम से वह लाखों लोगों तक पहुंचने का सामर्थ्य रखता है। यह हिन्दी पत्रकारिता का जनतंत्रीकरण है। आज सबकुछ पब्लिक स्फियर में है। लोग अपनी भाषा में खबर लिख रहे हैं, उन्हें अपनी खबर छपवाने के लिये किसी खास जाति से नहीं होना पड़ता, या किसी खास वर्ग और खास तरीके की चीजें नहीं करनी पड़ती, मुझे कई ऐसे पत्रकार मिलते हैं जो सिर्फ फेसबुक पर लिख रहे हैं, वे अपनी रोजी-रोटी के लिये कोई और काम करते हुए भी अपने भीतर की पत्रकारिता को जिन्दा बचा पा रहे हैं।

कई ऐसे लोग हैं जो सिर्फ फेसबुक पर और हिन्दी में पत्रकारिता करने की वजह से पैसा भी कमा रहे हैं, बाजार ने हिन्दी को इंटरनेट पर विशेष महत्व दिया है, 60 प्रतिशत से ज्यादा लोग इंटरनेट पर अपनी क्षेत्रीय भाषा में लिख-पढ़ रहे हैं। खबरों को जानने के लिये आज किसी अखबार या टीवी का मोहताज नहीं रहना पड़ रहा है, लोग सोशल मीडिया पर अपनी भाषा में खबर लिख-पढ़-देख रहे हैं। आज बस्तर से कोई लाइव कर रहा है, कोई राजस्थान में हुई घटना पर प्रतिक्रिया दे रहा है, मीडिया के ओवी वैन धीरे-धीरे अप्रसांगिक हो रहे हैं।

याद कीजिए रोहित वेमुला की आत्महत्या को। यह सोशल मीडिया ही थी जिसने इस घटना को राष्ट्रीय बना दिया और जब मैं राष्ट्रीय कह रहा हूं तो इसका मतलब है गाँव-गाँव में हिन्दी में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाला वर्ग, न कि सिर्फ वे टीवी चैनल जो दिल्ली की किसी गली की खबर को भी राष्ट्रीय बनाकर पेश करते हैं।
सोशल मीडिया पर चल रही पत्रकारिता का ही नतीजा है कि ऊना में हुए दलितों पर हुए जुल्म के बाद के गुस्से को पूरे देश में फैला दिया जा रहा है। जब तेजबहादुर यादव सेना के भोजन की खराब हालत पर विडियो पोस्ट करता है तो वो भी हिन्दी पत्रकारिता ही कर रहा होता है और यह पत्रकारिता ज्यादा जनसरोकारी है। जनता के करीब है न कि किसी पूंजी और पार्टी का एजेंडा।

हिन्दी पत्रकारिता आज इतने सालों बाद अपने सचमुच के स्वर्ण काल में है और इसका क्रेडिट सोशल मीडिया और इन्टरनेट को जाता है। उस स्मार्टफोन को जाता है जो वहां पहुंचता है जहां चैनलों के कैमरे नहीं पहुंच पा रहे हैं और भोपाल में हुए फर्जी इनकाउंटर को भी एक्सपोज्ड करता है।

हिन्दी पत्रकारिता जनता के हाथ में है। उनके द्वारा संचालित किया जा रहा है। हजारों-लाखों लोग पहली बार अपनी बात कह पा रहे हैं, अपनी खबर दुनिया तक पहुंचा पा रहे हैं। लेकिन इसके कुछ खतरे भी हैं, जिन्हें दर्ज किया जाना जरुरी है। व्हॉट्स एप, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया आज फर्जी खबरों का डस्टबीन बन गया है। ये खबरें लोगों को उकसा रही हैं, भीड़ को हत्यारा बना रही हैं, कोई फिल्टर नहीं है जहां से इन खबरों को रोका जा सके। एक सभ्य समाज के बतौर हमें सोशल मीडिया के हिंसक भीड़तंत्र वाली पत्रकारिता से भी बचना होगा, उसके खतरे से अपने आसपास लोगों को आगाह करना होगा, फर्जी, अफवाह फैलाने वाली खबरों को रोकना होगा। एक समाज के रूप में हमारी यह परीक्षा का भी समय है। टीवी चैनलों ने हिन्दी पत्रकारिता में हिंसा और डर के जो बीज बोए थे, उसकी फसल सोशल मीडिया पर भी लहराने लगी है। इसपर लगाम लगाना जरुरी है।

नहीं तो एक बेहतरीन उम्मीद अँधेरे में बदलता चला जायेगा। सोशल मीडिया मुख्यधारा की मीडिया बन चुकी है, अब इसका किस जिम्मेदारी से हम इस्तेमाल करते हैं तय हमें ही करना है। आप सबको हिन्दी पत्रकारिता दिवस की शुभकामाएँ। अपने अंदर के पत्रकार को जिन्दा रखिये, सतर्क रखिये और खूब लिखिये..


हर सही के पक्ष में रिपोर्टर बनने की क्षमता हम सबमें बराबर है। पत्रकारिता कोई जन्मजात प्रतिभा नहीं।

Sunday, February 26, 2017

बुखार के दिन

बुखार जैसे दिन बीत रहे हैं. छूकर देखा तो सच में बुखार ही था. मन भी थका और शरीर भी अब थकने लगा है. गहरी अकेली शाम, कमरे में शाम की गहरी रौशनी आ रही है. खिड़की पे पर्दे डाल दिये. शाम की ये वाली रौशनी डराती है. डराती नहीं शायद खाली और शून्य को लिये आती है. आती नहीं जा रही होती है.

ऐसे बुखार के दिनों में अकेले होना कम ही पसंद होता है. निगाह दरवाजे पर टकटकी लगाये ताकता रहता है. किसी के आ जाने, किसी के हालचाल पूछ भर लेने से लगता है सब ठीक हो जायेगा. दोपहर से टालता रहा, लेकिन दवा लेने जाना ही पड़ा. मेडिकल स्टोर तक आना-जाना बुखार में चलते जाना...बहुत दूर निकल गया...फिर ख्याल आया स्टोर पीछे ही रह गया शायद.

बुखार में सबकुछ अकेले करना...खैर, लापरवाही खुद के लिये ...खैर..

ये सन्नाटा, ये बीचबीच में गुर्राहट भरी आवाज लिये उतरने को बेताब हवाई जहाज, दोपहर छत पर धूप में लेटा बुखार के जाने का इंतजार किया..निर्मल वर्मा को फिर से पढ़ने की कोशिश की- एक चिथड़ा सुख.
नहीं पढ़ा. सुबह से तीन-चार कहानियां मंटो की पढ़ी. दिल बहलता रहा. इंतजार भी बना रहा.....

दोपहर कुछ दोस्त रहे...फिर चले गये..फिर शाम और अब रात...बुखार में इंतजार रहता है..

करीब करीब दिन भर ही फोन बंद रखा..मुझे अब भी सुखद आश्चर्य होता है जब लोग फोन करते हैं, मिलने को बुलाते हैं. सबकुछ से खुद को काटने के बावजूद लोगों का स्नेह देख कई बार खुद पर गुस्सा भी आता है...

बहरहाल बुखार है तो हालचाल लेने वाले का इंतजार भी है..कल तक शायद गायब हो जाये..इंतजार भी बुखार भी..

उम्मीद वो बची रहेगी...

Saturday, February 25, 2017

कठिन दिन

वे दिन अजीब हो चले थे। वो खुद को लेकर इतना सेल्फ डाउट में चला गया था कि उसके आसपास के लोग भी बड़े आराम से उसे हवाबाज कहने लगे थे। ये ऐसे लोग थे जिनके सामने सबसे ज्यादा ओरिजिनल बने रहने की कोशिश की गयी थी। ये लोग उन चुनिंदा लोगों में बचे थे जिनके लिये अब भी मोह कहीं न कहीं अटका रह गया था।
खैर, वो बार बार सबसे दूर, हो जाने की चाहते हुए भी हो नहीं पा रहा था।
कठिन दिन थे।

Thursday, February 23, 2017

भीड़ में ज्यादा अकेलापन

भीड़ में ज्यादा अकेलापन लगता है। जाने पहचाने चेहरे उस अकेलेपन को और गहरा करते चलते हैं।
डर, हाँ वही लगने लगता है।
कितना झूठ और अँधेरा है आसपास। लोग कहते हैं ख़ुशी रहो, खुश दिखो,
लेकिन सुख वो कहाँ गुम रहता है इन दिनों !

Wednesday, February 22, 2017

दुःख के सफर मे अकेले चलना है

आप एक सफर में होते हैं- दुःख के सफर में।
सफर में और भी लोग चल रहे होते हैं- उसी दुःख के सफर में।
सड़कों पर चलते हुए, छोटी नदी में तैरते हुए कोई और भी आपके साथ चला आता है- आप उस दुःख में साथ डूबते-उतराते चले जाते हैं।
लेकिन फिर एक वक़्त आता है, एक बिंदु जहां जाकर साथ वाले का दुःख चला जाता है, दुःख की नदी से वो किनारे लग जाता है, आप बस उसे देख भर सकते हैं किनारे लगते हुए- आपको अच्छा भी लगता है कोई तो किनारे लगा, किनारे लगने वाला भी थोड़ी देर तक आपको तैरते जाते देखता है, फिर लौट जाता है-
आप चलते जाते हैं, दुःख के सफर में- बिलकुल अकेला।

Saturday, February 18, 2017

Diary entry Feb 18

आज दिन भर रेख्ता में रहा। भीड़ में जाने-पहचाने लोगों से बचता हुआ, चुपचाप किसी कोने में बैठ लोगों को जूमआउट होकर देखने की कोशिश की...
फिर एक ख्याल आया मैं लोगों से कट रहा हूं, वैसे ही लोग भी तो मुझसे कट रहे होंगे...ज्यादातर बार हम अपने भ्रम में जीते हैं.
हमें लगता है हमें दुनिया से बचना है, जबकि सच्चाई होती है कि दुनिया में हमारा अपना ही कोई अस्तित्व नहीं..हम एक तिनका भी नहीं..

फिर ...

क्या हम लिखने के लोभ में चीजों को रोमेंटिसाइज कर देते हैं...ओवर रोमेंटिसाइज.. रियलिज्म से दूर..किसी ने कहा शॉ को पढ़ो निर्मल वर्मा को छोड़ो..शॉ चीजों को डिरोमेंटिसाइज करते हैं..
क्या सच में सारी समस्याओं की जड़ वही लिखने का मोह तो नहीं है..डर लगने लगा कहीं हम लिखने के मोह में खुद को ही खत्म न कर लें..
वैसे सही भी है दुनियादारी की नजर में देखो तो खुद के जीवन में कोई एक बिन्दू नहीं है जहां अभाव हो..अकेला रहना खुद का चुना है- सो उसपर भी बहुत शिकायत नहीं की जा सकती।
फिर ये दुख, ये खालीपन है क्या...
और अगर कोई भरा सा कुछ है तो वो क्या है...क्या है जिसे भरा सा कहा जाये...
लेकिन फिर लगता है हम शायद ही उतने रियलिस्टिक हो पायें..क्या खालीपन को भरने के लिये , अँधेरे में रौशनी के लिये रियल हो जाने की कोशिश बहुत उपरी हल जैसा नहीं...

कई बार लगता है दुनिया की तरफ देखना चाहिए....दुनिया के दुख में शामिल होना चाहिए...या तो अपना दुख कम हो जायेगा...या वो उसमें घुलमिल कर और बड़ा हो जायेगा..
लेकिन कुछ तो होगा..कुछ तो होगा जिसे महसूस किया जा सकेगा..
महसूस न किये जाने की फीलिंग भयानक है...फिलहाल सबकुछ उस अँधेरे के हवाले...जहां उजली रौशनी भी कुछ नहीं दिखा पा रही...