Thursday, August 15, 2019

कैसी आजादी?

दिन ऐसे ही बीता। चारों तरफ आजादी मुबारक के संदेश लिये। बार-बार ध्यान कश्मीर से आने वाली खबरों की तरफ। लगभग सारे ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया है और यहां तक कि 11 साल के बच्चों को भी।

पूरे कश्मीर को बंद कर दिया गया है। लोग घरों से नहीं निकल पा रहे हैं। लेकिन फिर भी कहा जा रहा है कि सब अच्छा है। कश्मीर के लोग खुश हैं।

अब अपनी आजादी को लेकर, संवैधानिक अधिकारों को लेकर सच में डाउट सा महसूस हो रहा है। आजादी की बात करने वालों को, न्याय की बात करने वालों को, हक मांगने वालों को डराया जा रहा है। सही को सही कहने वालों पर हमले हो रहे हैं। न्याय को राष्ट्र के नाम पर कूचलने की सामूहिक मंजूरी मिल गयी है।

आप प्रिविलेज हैं तो ये लिख लेना, बोल लेना, विरोध जता लेने का जो भ्रम है वो बस बचा हुआ है। जिसे आज न कल टूटना ही है।

Sunday, June 23, 2019

सुबह सुबह की बात है..

सुबह जगा तो। गर्मी कम थी। लगा धूप ने थोड़ी आज नरमी बरती है। चाय बनाया। माँ भी है। मैं मेज पर बैठे-बैठे ये लिख रहा हूं तो वो बॉलकनी में बैठी चाय पी रही है।

कमरे औऱ बॉलकनी को एक पतला पीला पर्दा बांटता है। मां ने पीली साड़ी पहनी है। काली छिट का। माँ को आये कुछ दिन हुए। वो लगातार फोन पर है। उससे लोग छूटते ही नहीं। मैं सोचता हूं।

कमरे में गांधी भजन। लता मंगेश्कर की आवाज में। अल्ला तेरो नाम। फिर किसी ने वैष्णव जन को ते कहिये गाया।

कितना सूकून है। मैं बेड पर लेटे लेटे सामने देखता हूं। आज गमलों में पानी माँ ही देगी। मैं मटन बनाऊंगा। ये अकेले रहने की आदत इतनी अच्छी भी नहीं है। मैं सोचता हूं।

कितना सारा टू-डू लिस्ट की पर्ची मेज के सामने टंगी है। लेकिन कोई हड़बड़ी नहीं। कोई एनजाईटी नहीं। न बाहर, न मन में। बस यही।

Monday, June 17, 2019

मासूमियत का...

कुछ लोग होते हैं बेहद मासूम

इतने मासूम कि अपनी मासूमियत से उन्हें घृणा होने लगे

लेकिन दूसरे उसे समझते हैं ढ़ोगा।

बहुत लोगों को तो ये यकीन ही नहीं हो पाता कि इस दुनिया में मासूम लोग भी हैं।

कई बार ही लगता है मासूमियत का आचार बनाकर इस गरमी में उसे सूखने के लिये छत पर छोड़ आना चाहिए।
गर्मी कितनी है इन दिनों..मतलब पिछले हफ्ते तो ऐसे बीते, कट रहे हों जैसे।

फिर दो दिन से बारिश न होने और आकाश के बादलों को देखकर मुस्कुराने में बीते

............................................

बहुत ज्यादा अंदर से आउटरेज का फील करना बहुत बुरा भी नहीं है, या है बुरा पता नहीं।

कितना कुछ दिमाग में ही है हमारे। अगर उसको कहने लग जाओ तो ज्यादातर चीजें कितनी आसान हो जायेंगी।

नींद के मामले में मैं थोड़ा कच्चा हूं

नींद और मेरा रिश्ता। मेरे साथ रहने वाले मुझसे रश्क करते हैं। उन्हें लगता है मैं नींद का लकी आदमी हूं। बात सच भी है। मैं पांच सेकंड या दस सेकंड के भीतर सो जाता हूं।

बहुत सारे वक्त में ऐसा लगा है लोगों को कि मैं उनकी बात नहीं सुन रहा, या कि मैं बहाना करके नींद में चला जाता हूं। जबकि नींद बहुत तेजी से आती है मुझे।

लेकिन मैं ये भी एक्सपिरियेंस करता हूं कि नींद की एक सीमा है। एक हद। उस हद तक अगर मैं जग जाउं तो फिर मुझे इनसोमैनिक होने से कोई नहीं रोक सकता।
नींद को जीत लेता हूं। उस एक हद को पार करते ही। लेकिन ऐसा बहुत कम ही हो पाता है।

दुर्भाग्य है कि ज्यादातर मामलों में शायद मैं जब अकेले होता हूं तभी ये जीत होती है। बहुत अकेले होने पर ही।

---------------------------------------------------------------------

क्या मैं 
बहुत बेचैनी
मुझे लगता है
मैं इंट्रोवर्ट हूं
ऐसा लोग भी कहते हैं मुझसे
मैं बात ही नहीं करता
मुझे इस बारे में पढ़ना चाहिए
कभी सोचा ही नहीं ऐसा कुछ
कभी किसी ने बताया भी तो नहीं
-------------------------------------
बेचैनी का भी हल निकलेगा।
मैं बहुत लिख नहीं पाता तो इसलिए कि अब मुझे कुछ नया लिखना है
और नया लिखने के लिये 
नये अनुभव बेहद जरुरी हैं।

शहर के भीतर 
या शहर से काफी दूर


Thursday, April 25, 2019

हमेशा वॉक ओवर दे देना

हमेशा से यही होता आया है। स्पेस देना। फिर आराम से सामने वाले को वॉक ओवर दे देना।

दूसरों को। दूसरों पर भरोसा करना। और हर बार भरोसे को तुड़वा लेना। हर बार खुद को रिस्क में डालना।


किसी किसी रोज लगता है जिन्दगी के सारे तनाव को एक कागज पर लिखकर कहीं दूर डस्टबीन में डाल आऊँ और फिर फ्रेश लिस्ट बनाऊं। सारे नये सपने। चाहतें। ललक। सबकुछ को एक सादे कागज पर फिर से क्रमवार सजाऊं।

सारी यादें, सारी वर्तमान की उलझने। सारी दिक्कतें। सारी परेशानियों को कह दूं - बॉस बहुत हो गया। अब गुड बाय करते हैं आपको। मन को हारते देखना हर रोज ही, कितना बुरा है। कितना उदास है हर चीज का क्षणिक होना। स्नेह का न होना। सबकुछ व्यवस्थित होने का एक्ट करते रहना।

टुक टुक दुनिया को खिसकते देखना और अपने पैर का एक ही जगह जम जाना।

आईये जी। कुछ परेशानियों का चटनी बनाते हैं। कुछ को करते हैं विदा। चलते हैं नयी उम्मीद की तरफ। देखने का साहस करते हैं पहाड़। रौंदते है पुरानी कसैली यादें।

कब तक दुख ही लिखा जाता रहेगा? कब तक उदासियों के फुटनोट्स दर्ज किये जाते रहेंगे? कब तक सबकुछ अच्छा बने रहने की उम्मीद की जाती रहेगी? कब तक जिन्दा रहने की कोशिश में घुटता जाता रहेगा? कब तक?



Tuesday, February 19, 2019

भरोसा नहीं होना

एक कमाल की बात है। आजतक कोई एक ऐसा नहीं मिला जिसके सामने अपने मन की गांठ खोल पाउं।

बचपन से। कई बार सोचा किसी के साथ इस गांठ को खोला जाये। लेकिन सालों साल बीतते रहे और वो हो नहीं पाया। इस एक गांठ ने लोगों छूटवाये। इस एक गांठ ने पूरा का पूरा गांव उजाड़ा। इस गांठ ने किसी चीज को अपना न होने दिया।

लेकिन अब लगता है धीरे-धीरे उस गांठ के खुलने का वक्त आया है।

Monday, February 18, 2019

पराये शहर में

रातभर कबीर को सुनते रहने के बाद की सुबह। फरवरी की सुबह। सर्दी में बारिश थोड़ी सी उदासी लेकर गिरता है। मन सोचता है। क्या एकदिन ऐसा आता है जब पराये शहर में रहते हुए हम अपने घर को बिल्कुल भूल जाते हैं?

कि सालों साल दूसरे शहर में जीते हुए हमें याद नहीं रहता हम कहां से आय़े थे..हमारा अपना शहर या गांव का रंग कैसा था..


उस खेत को भूल जाते हैं जहां पहली बार छिपकर बीड़ी पी थी या कि उस गली को जहां जोर से चिल्लाकर प्रेम को स्वीकार किया था। या उस नदी को जहां बैठकर कवितायें पढ़ी थीं और प्रेम को करीब से देखा था।


या कि उस शहर को जहां सबसे ज्यादा तपी हुई जिन्दगी देखी और सारी खुश खबरें भी वहीं सुनी। ये याद रहता है कि खेत में मटर तोड़ते वक्त ओस से पैरों में मिट्टी लग जाती है- एकदम कीचड़ जैसा।

यहां इस पराये शहर में तो हर दिन मेला है। फिर वो अक्टूबर याद आता है? पुजा और मेला का दिन?

शायद नहीं।

अच्छा मुझे लगता है ...खैर जाने दो।

मन क्या चाहता है तु बतायेगा कभी।
मैं हवा में बात करने लगा था। औऱ अब जब ये लिख रहा हूं तो आँखे बेंद कर ली हैं। आंख बंद कर टाइपिंग किये जा रहा हूं। ये क्या कोई टैलेंट है या फिर बीमारी। बीमार औऱ गुलाम। इन की बोर्डस का।


कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...