Monday, August 20, 2018

अचानक मन का उदास हो जाना

आज शाम अचानक लड़के का मन उदास हुआ। ऐसा कई शामों में होता है कि लड़के को उसकी याद आती है और वो उदास हो जाता है। लड़के के ख्याल में तो अक्सर वो रहती है, लेकिन मन का उदास होना थोड़ा कम सा गया है।
अब वो उदास होता भी है तो थोड़ा कहने से बचता है। बिल्कूल बचता है। उसने लड़की से कहा था कि वो सारे पुल खत्म कर देगा जो उसतक पहुंचती हो और कहना भी क्या। लड़का लगभग चुप ही रहता है। दुनिया के नक्शे में उसे कोई खड़ा नहीं मिलता जिससे वो मन का कह सके, दरअसल उसके मन में कुछ वैसा रुका भी नहीं है। कुछ भी नहीं।

वो खुद को हर रोज दिलासा देता है कि वो अब तस्सली में है। अब वो दिलासा ही उसका सच बन गया है।

ऐसा होता है अक्सर जब आप लंबे समय तक खुद को दिलासा में रखते हैं। तो फिर सब गढ़मढ़ हो जाता है। दिलासा, सच, झूठ, याद और आँख का भीगना।

सबकुछ कितना सामान्य है। लड़के के जीवन में। किसी का आना, किसी का जाना। किसी का न होना। सबकुछ एक जैसा ही लगने लगा है।

वो याद करता है वे दिन। बीते दिन। उसे याद नहीं आता ज्यादा कुछ। वे दिन याद करता हुआ लड़का छूटे हुए दिनों पर ही पहुंच जाता है। जूलाई से जून और फिर जून से अगस्त। इसबार तो उसे हद ही घटा। अगस्त को भूल बैठा।

मौसम की पहली बारिश।

लड़का जोर लगाकार बारिश में भीगने की कोशिश करता है। जोर लगाकर ही अब वो हर कुछ करने की कोशिश में रहता है। जोर लगाकर हँसता है, जोर लगाकर खुश होता है, जोर लगाकर खाता है, जोर लगाकर मिलता है, जोर लगाकर रौशनी की तरफ दौड़ता है। लेकिन कभी अगर जोर लगाकर चिल्लाता है तो चिल्ला नहीं पाता, एकबार उसने जोर लगाकर रोने की कोशिश की, और जोर-जोर से हँसने लगा।




Thursday, August 16, 2018

सांप्रदायिक राजनीति के सबसे छुपे और घातक चेहरे थे अटल बिहारी वाजपेयी, अलविदा।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मरने की खबर के बाद देशभर में उनके प्रशंसक शोक में डूबे हैं। वाजपेयी की एक खास बात थी कि उन्हें कट्टर हिन्दू राजनीति करने वाले तो पसंद करते ही थे, वे आजीवन कट्टर धार्मिक राजनीति को बढ़ावा देने वाली राजनीति के साथ ही खड़े रहे। लेकिन फिर भी देश के उदारवादी और सेक्यूलर तबके में भी उनकी लोकप्रियता बनी रही।

वाजपेयी को कई चीजों के लिये याद किया जायेगा। उनके मरने के पहले से ही सोशल मीडिया से लेकर बड़े-बड़े मीडिया हाउस तक हर कोई उन्हें महान नेता बनाने में तुले हुए हैं। ऐसे वक्त में इतिहास को पलटना जरुरी हो जाता है। उन अध्यायों को देखना जरुरी हो जाता है जिससे अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का संपूर्ण मूल्यांकन हो सके।

हालांकि हमारे देश में मरने के बाद बुरे आदमी के बारे में भी अच्छा-अच्छा ही बोलने का रिवाज है। लेकिन अगर बात किसी पूर्व प्रधानमंत्री की हो, देश के इतिहास में दर्ज एक महत्वपूर्ण नेता की हो तो मुझे लगता है कि अगर उसका पूरा मूल्यांकन किया जाना जरुरी है, नहीं तो न वो सिर्फ इतिहास के साथ बल्कि आने वाले भविष्य के लिये नाइंसाफी ही होगी।

अमूमन देश का उदारवादी तबका अटल बिहारी वाजपेयी को सेक्यूलर और कट्टरपंथ से मुक्त नेता मानते हैं। मैं भी सालों तक वाजपेयी को महान नेता मानता रहा लेकिन इतिहास कुछ और ही बताता है। वो बताता है कि 14 मई 1970 को जनसंघ के सासंद के रूप में सदन में बोलते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मुस्लिम हर दंगे और सांप्रदायिक तनाव के जिम्मेदार हैं। वे कहते हैं कि ‘दंगा शुरू क्यों होता है? मैं सदन से मांग करता हूं कि वो इसपर विचार करे। मैं किसी परिणाम पर नहीं पहुंचा हूं। कुछ मुस्लिम दंगा शुरू करते हैं यह जानते हुए कि उनकी जिन्दगी और संपत्ति खतरे में है। ऐसा लगता है कि मुस्लिमों ने सोच लिया है कि भारत में उनके लिये जगह नहीं है, उनका कोई अभिभावक नहीं है, इसलिए जीने से अच्छा है कि मर जाया जाये। दूसरी वजह हो सकती है कि कुछ मुस्लिम पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं, तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण वजह जो दिखता है कि मुस्लिम नेता मुस्लिमों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से नहीं जोड़ने देना चाहते।’

जाहिर है जो वाजपेयी संसद में बोल रहे थे ये विचारधारा और मत आजतक उनके संगठन आऱएसएस के लोग बोलते रहते हैं।

सन् 1983 में भी, अटल बिहारी वाजपेयी ने असम में चुनावी हिंसा और विदेशियों के बाहर करने के मुद्दे पर विवादास्पद बयान दिया था। याद रहे कि ये वही वक्त था जब असम में खासकर नेली में हजारों मुस्लिमों को मार दिया गया था। बाद में 28 मई 1996 को इन्द्रजीत गुप्ता ने संसद में उस विवादित भाषण के हिस्से को पढ़ा था जिसमें वाजपेयी कहते हैं- ‘ विदेशी यहां आये और सरकार ने कुछ नहीं किया। अगर वे असम के बदले पंजाब में आये होते तो लोग उन्हें काट कर वापिस फेंक देते’।

अपने कुप्रसिद्ध गोवा भाषण में अटल वाजपेयी कहते हैं, जहां जहां मुसलमान हैं, घुलमिलकर नहीं रहते हैं। इतना ही नहीं मुस्लिम विरोध में आगे कहते हैं, दूसरों से घुलना मिलना नहीं चाहते। शांतिपूर्ण तरीके से प्रचार करने के बजाय आतंकवाद से डरा-धमका कर अपने मत का प्रचार करना चाहते हैं।
वे धमकी भरे स्वर में कहते हैं हमने उन्हें (मुस्लिम और क्रिश्चन) को अपना धर्म फॉलो करने दिया है।
वाजपेयी यहीं नहीं रुकते और कहते हैं, हर जगह जहां मुस्लिम बहुत संख्या में रहते हैं, उनकी चिंता है कि कहीं इस्लाम उग्र रूप ना ले ले।
वो मुसलमामों पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते हुए कहते हैं, मुस्लिम लगातार सांप्रदायिक होते जा रहे हैं।

मई 1995 में पांचजन्य में लिखे आर्टिकल में वाजपेयी आरएसएस की तारीफ करते हुए कहते हैं कि ‘संघ को हिन्दुओं को इकट्ठा कर, मजबूत हिन्दू समाज बनाना चाहिए।’
वाजपेयी की 1998 में बनी सरकार के बाद लागातार देशभर में क्रिश्चन समुदाय पर जिस तरह हमले बढे थे उसे भी नहीं भूला जा सकता है।

हालांकि कुछ लिबरल लोग वाजपेयी को सांप्रदायिक नहीं मानते। उनका तर्क होता है कि उन्होंने गुजरात दंगों के वक्त तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से इस्तीफ़ा मांग लिया था। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत है कि उसी गुजरात दंगे में हजारों मुस्लिमों की हत्या कर दी गयी थी, महिलाओं के साथ बालात्कार हुए थे और राज्य सरकार कानून व्यवस्था को लागू करने में असफल रही थी। कई मंत्रियों और बीजेपी के नेताओं पर दंगा करवाने का आरोप लगा, चार्जशीट दाखिल हुए थी। इतना सब होने के बावजूद वाजपेयी ने नरेंद्र मोदी की सरकार को हटाने का साहस नहीं किया। वहां के स्थिति को सामान्य बनाने के लिये छह महीने के लिये भी राष्ट्रपति शासन नहीं लगा सके। उल्टे कुछ ही दिनों बाद गोवा में अपने भाषण में मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलते नजर आये।

ठीक ऐसा ही अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढ़हाने के समय भी वाजपेयी ने किया। उन्होंने मस्जिद गिराने से पहले ‘जमीन को समतल’ करने वाला विवादित भाषण दिया और फिर दिल्ली आकर अपने ही पार्टी के खिलाफ धरने पर बैठ गए। राजनीति को करीब से जानने वाले इसे वाजपेयी की नाटकियता मानते हैं। बीजेपी को सत्ता में आना था और वो जानती थी कि अपनी कट्टर छवि के साथ वो सत्ता में कभी नहीं आ पायेगी। इसलिए उसे वाजपेयी का उदारवादी चेहरा चाहिए था जो मध्यवर्ग के बड़े हिस्से में अपनी पैठ बना सके और ऐसा हुआ भी।

गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि के लोगों ने भी वाजपेयी को खूब पसंद किया। उन्हें उदारवादी माना।

अटल बिहारी वाजपेयी को इसलिए भी याद रखा जायेगा क्योंकि उन्होंने धर्म की कट्टर राजनीति को पूंजीपतियों के साथ जोड़ा। उनके प्रधानमंत्री रहते ही देश में विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया, कई सारे सरकारी उपक्रम को बेचकर उसे निजी हाथों में दिया गया और चुनावी राजनीति में शाइनिंग इंडिया जैसा प्रोपगेंडा शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो आजकल हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी के रास्ते ही आगे बढ़ रहे हैं। हिन्दुत्व का एजेंडा छिपाकर दिखाने के लिये विकास की बात कर रहे हैं।

हालांकि अटल जी को भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ती के प्रयास के लिये भी याद किया जायेगा। भले वो प्रयास काफी असफल रहा।

फिलहाल इस लेख को अटल बिहार वाजपेयी की आत्मा को शांति मिलने की कामना के साथ खत्म करता हूं।

Monday, July 9, 2018

सबकुछ तसल्ली की राह पर है...

सारी कोशिशें तसल्ली की राह पर हैं..
कुछ यादें हैं, जिन्हें भूलने का चाह कर भी मन नहीं होता। वो फ्लैशबैक में जबरदस्ती भी जाती रहती हैं। जैसे एक याद पटना के गंगा किनारे का। दो लड़के बैठे हैं। दूर रोशनी में गांधी सेतू जगमगा रहा है। दोनों लड़के उस शाम में बस उस बड़े से पुल को देखने बैठे हैं। एक लड़का शहर छोड़ कर जाने वाला है। पुल पर चलने वाली गाड़ियों की रोशनी एकसाथ चलते हुए रौशनियों का नदी सा बनता दिखता है।

एक लड़का है जिसके लिये दूसरा पैसे बचाकर शहर के मंहगे रेस्तरां में जाता है। दोनों वहां बैठकर खाते हैं। अजीब सा सुख महसूस करते हैं। दुख है लड़का चला जायेगा शहर से हमेशा के लिये। दो साल बाद दूसरे लड़के को भी शहर छोड़ना ही था।

क्या पता था एक जगह वे फिर से मिलेंगे। वे मिले। वो लड़का था तो जिन्दगी में एक निश्चिंतता थी। सबकुछ उसके कंधे पर छोड़कर पड़े रहने का भरोसा था।

ताजुब्ब होता है एक वक्त में जिसके लिये जान देने सी हालत रहती है, उसे दुबारा लौटकर आवाज क्यों नहीं लगा पाते हैं हम।

आजकल कुछ लिखता नहीं, क्योंकि जब भी लिखने बैठो, पुरानी यादें ही बचती हैं। नयी यादों का तमाम कोशिशों के बावजूद न बन पाना....कितना जीवन को कठिन और कठोर बना देता है।

खैर,

Wednesday, June 6, 2018

हारे हुए प्रेमी

हारे हुए प्रेमी 
रखने लगते हैं प्रेम का हिसाब किताब 
देखते हैं हर रोज़ ही 
एक बुरा सपना
और आधी रात ही खूल जाती है 
नींद


सपने में भी 
वे हार रहे होते हैं 
प्रेम !!


क्या हारे हुए प्रेमियों से भी 

बनती है थोड़ी सी दुनिया ?

Friday, May 4, 2018

पुल का खोजते रहना

आज फेसबुक पर स्क्रॉल करते हुए दिव्या, स्मारिका और मिकी के प्रोफाइल पर चला गया। वो होता है न कि कहीं पहुंचना आप चाह रहे होते हैं तो वहां तक पहुंचने के लिये कई सेतु खोजने की कोशिश करते हैं।

पुराने दिनों में लौटने का पुल। कैसे कैसे लोग बदल गए, कैसे लोगों की जिन्दगी में बहुत आगे चली गयी।

बस हम रुके रहे। वहां पुराने मोहल्ले में। गंगा के किनारे कविताएँ पढ़ते हुए। पीछे साईकिल चोरी हो गयी है।

अच्छा वो समोसे की दुकान बंद हो गयी है। गांधी मैदान वाले लिट्टी के ठेले अब ज्यादा तड़क-भड़क भरे हो गए हैं। लेकिन खैर,


Monday, April 16, 2018

प्रिय महराज जी याद आ रही है

प्रिय महाराज जी!
बड़े महाराज की शादी है। आज शाम से ही वो आपको याद कर रहा है। आप होते तो क्या होता पर बात करते हुए वो रोने लगा है।
बात सच भी है। आप होते तो कित्ता पहले से तैयारी शुरू हो जाती। अभी तो शादी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा। ख़ुशी कहीं गुम है। यक़ीन मानिए बढ़ा चढ़ा कर नहीं कह रहा।

आप  होते तो आधी ज़िम्मेदारी आपकी होती, और मैं खुलकर हँस पाता। आप होते तो...

बुरा लग रहा है कि मेरी वजह से कितने लोग अलग हो गए, जो बेहद क़रीब रहे कभी।

आपकी याद आती है।  कभी कभी बहुत जयदा। सोचता रहता हूँ लिखूँगा कभी लेकिन पता है आपतक़ ये लिखा कभी नहीं पहुँच पाएगा, जैसे आपके नम्बर तक मेरा हाथ नहीं पहुँच पाता।

आप होते तो ...

हम गंगा किनारे बैठे रह जाते तो कितना अच्छा था, हम यो बाइक्स से पटना की सड़क ही नापते तो कितना अच्छा था।
हम आपके क्रिकेट खेलते हुए झीड़क़ी को सुन लेते तो अच्छा था, कितना कुछ है लेकिन फ़िलहाल उसपर कोई बात नहीं करूँगा।

फ़िलहाल आपको बहुत याद, प्यार तो आप अब भी हैं, कभी गले लगकर ख़ूब रोना है महाराज जी!
शायद कभी!

Thursday, April 12, 2018

सपने में आना...

(कुछ दिनों से मैं शैली में कुछ कहानियां लिख रहा हूं.. उसी सीरिज की एक कहानी आज ब्लॉग पर भी लगा रहा हूं। कहानी को काल्पनिक ही समझने में सहूलियत होगी :) )
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अक्सर जो लोग हमसे दूर चले जाते हैं, जिनसे कभी मिलना नहीं होता, जो कभी बेहद करीब रहे थेः वही लोग सपने में आते हैं।
जैसे तुम अक्सर ही सपने में आते हो. तुम्हारा जाना उस सपने का केन्द्र बिन्दू है। उसी के आसपास पूरा सपना बुना रहता है। मसलन कल रात जब तुम सपने में आये तो जाने का समय तय था। मैं हड़बड़ी में था। उस आने को लेकर उहाोपोह था। मैं चाहता था तुम कुछ ज्यादा ही देर रुको। लेकिन वो भी तुम्हारे साथ था। तुम्हें ले जाने की जिद्द लिये।

मैं जल्दी जल्दी में अपने जरुरी काम निपटाने की पुरानी आदत का शिकार था। तुम्हारे होने पर ही कितनी जरुरी काम निपटाया करता था। उस समय मुझे याद आया बहुत दिनों से टूथब्रश नहीं ली है। मैं तुम्हारे साथ जनरल स्टोर जाना चाहता था, ट्रूथब्रश लेने। लेकिन तुम्हारे जाने का समय तय था। लेकिन मैं तुम्हारे होते हुए अपने इस जरुरी काम को निपटा लेना चाहता था।

कुछ देर में हम किसी ग्रोसरी की दुकान पर थे। मैं ट्रूथब्रश ली, तुमने लेट होने की बात कही, उसने तुम्हें घूरा, और फिर तुम निकल गए।
मुझे बहुत तेज प्यास लगी थी। मैं वहीं पानी खोजने लगा। पसीने से अचानक लथपथ हो गया। जगा तो देखा पंखे की हवा से ठंड लग रही है।
मैंने पानी पीने का ख्याल छोड़ दिया।

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...