Wednesday, June 6, 2018

हारे हुए प्रेमी

हारे हुए प्रेमी 
रखने लगते हैं प्रेम का हिसाब किताब 
देखते हैं हर रोज़ ही 
एक बुरा सपना
और आधी रात ही खूल जाती है 
नींद


सपने में भी 
वे हार रहे होते हैं 
प्रेम !!


क्या हारे हुए प्रेमियों से भी 

बनती है थोड़ी सी दुनिया ?

Friday, May 4, 2018

पुल का खोजते रहना

आज फेसबुक पर स्क्रॉल करते हुए दिव्या, स्मारिका और मिकी के प्रोफाइल पर चला गया। वो होता है न कि कहीं पहुंचना आप चाह रहे होते हैं तो वहां तक पहुंचने के लिये कई सेतु खोजने की कोशिश करते हैं।

पुराने दिनों में लौटने का पुल। कैसे कैसे लोग बदल गए, कैसे लोगों की जिन्दगी में बहुत आगे चली गयी।

बस हम रुके रहे। वहां पुराने मोहल्ले में। गंगा के किनारे कविताएँ पढ़ते हुए। पीछे साईकिल चोरी हो गयी है।

अच्छा वो समोसे की दुकान बंद हो गयी है। गांधी मैदान वाले लिट्टी के ठेले अब ज्यादा तड़क-भड़क भरे हो गए हैं। लेकिन खैर,


Monday, April 16, 2018

प्रिय महराज जी याद आ रही है

प्रिय महाराज जी!
बड़े महाराज की शादी है। आज शाम से ही वो आपको याद कर रहा है। आप होते तो क्या होता पर बात करते हुए वो रोने लगा है।
बात सच भी है। आप होते तो कित्ता पहले से तैयारी शुरू हो जाती। अभी तो शादी जैसा कुछ लग ही नहीं रहा। ख़ुशी कहीं गुम है। यक़ीन मानिए बढ़ा चढ़ा कर नहीं कह रहा।

आप  होते तो आधी ज़िम्मेदारी आपकी होती, और मैं खुलकर हँस पाता। आप होते तो...

बुरा लग रहा है कि मेरी वजह से कितने लोग अलग हो गए, जो बेहद क़रीब रहे कभी।

आपकी याद आती है।  कभी कभी बहुत जयदा। सोचता रहता हूँ लिखूँगा कभी लेकिन पता है आपतक़ ये लिखा कभी नहीं पहुँच पाएगा, जैसे आपके नम्बर तक मेरा हाथ नहीं पहुँच पाता।

आप होते तो ...

हम गंगा किनारे बैठे रह जाते तो कितना अच्छा था, हम यो बाइक्स से पटना की सड़क ही नापते तो कितना अच्छा था।
हम आपके क्रिकेट खेलते हुए झीड़क़ी को सुन लेते तो अच्छा था, कितना कुछ है लेकिन फ़िलहाल उसपर कोई बात नहीं करूँगा।

फ़िलहाल आपको बहुत याद, प्यार तो आप अब भी हैं, कभी गले लगकर ख़ूब रोना है महाराज जी!
शायद कभी!

Thursday, April 12, 2018

सपने में आना...

(कुछ दिनों से मैं शैली में कुछ कहानियां लिख रहा हूं.. उसी सीरिज की एक कहानी आज ब्लॉग पर भी लगा रहा हूं। कहानी को काल्पनिक ही समझने में सहूलियत होगी :) )
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अक्सर जो लोग हमसे दूर चले जाते हैं, जिनसे कभी मिलना नहीं होता, जो कभी बेहद करीब रहे थेः वही लोग सपने में आते हैं।
जैसे तुम अक्सर ही सपने में आते हो. तुम्हारा जाना उस सपने का केन्द्र बिन्दू है। उसी के आसपास पूरा सपना बुना रहता है। मसलन कल रात जब तुम सपने में आये तो जाने का समय तय था। मैं हड़बड़ी में था। उस आने को लेकर उहाोपोह था। मैं चाहता था तुम कुछ ज्यादा ही देर रुको। लेकिन वो भी तुम्हारे साथ था। तुम्हें ले जाने की जिद्द लिये।

मैं जल्दी जल्दी में अपने जरुरी काम निपटाने की पुरानी आदत का शिकार था। तुम्हारे होने पर ही कितनी जरुरी काम निपटाया करता था। उस समय मुझे याद आया बहुत दिनों से टूथब्रश नहीं ली है। मैं तुम्हारे साथ जनरल स्टोर जाना चाहता था, ट्रूथब्रश लेने। लेकिन तुम्हारे जाने का समय तय था। लेकिन मैं तुम्हारे होते हुए अपने इस जरुरी काम को निपटा लेना चाहता था।

कुछ देर में हम किसी ग्रोसरी की दुकान पर थे। मैं ट्रूथब्रश ली, तुमने लेट होने की बात कही, उसने तुम्हें घूरा, और फिर तुम निकल गए।
मुझे बहुत तेज प्यास लगी थी। मैं वहीं पानी खोजने लगा। पसीने से अचानक लथपथ हो गया। जगा तो देखा पंखे की हवा से ठंड लग रही है।
मैंने पानी पीने का ख्याल छोड़ दिया।

Thursday, February 22, 2018

तस्वीरों का किया कीजै..

तस्वीरें आती रहती हैं। याद बनकर। कभी मेट्रो की। कभी किसी मेले की। कभी किसी कमरे की। कभी किसी कैफे की। कभी पहाड़ों की। कभी गंगा किनारे की। तस्वीरें आती रहती हैं लौट-लौट कर। बस नहीं लौटता तो.....
वे दिन..

कभी-कभी सोचता हूं डिलीट क्यों नहीं करता। तस्वीरें, यादें और जिन्दगी सबकुछ को।

तस्वीरें आती रहती हैं
कभी पैरों के जोड़े बनकर
कभी माथे में चिपकी बड़ी बिन्दी बनकर
कभी कान से लटकता झूमका
कभी जयपुर का लंहगा
कभी आँचल रंगीन

तस्वीरें आती रहती हैं
कभी मंडी हाउस की
उँगलियों में फँसी सिगरेट की
रंग महोत्सव की

उस घर की।
कभी किसी जंगल की, कभी गाँव की
तस्वीरें आती रहती हैं
गजरे की और दो कप साथ के चाय की।

शर्माये से चेहरे की
ढ़ेर सारे फूलों की
एकदूसरे को मुंह चिढ़ाने की
पीली रौशनी और केक खाने को बाया बड़ा सा मुंह


तस्वीरें आती रहती हैं...पुराने पुराने गलियों की
नावों की, बनारस की

भोपाल की, साईकिल की..
जेएनयू की, ढ़ाबे की, मिठायी की
ट्रेन की, पानी की, झरने की,

पुराने जैकेट की, सिंगरौली की...


और

तस्वीरें आती रहती हैं,
नये लोगों की...

बस वो नहीं आते, जिनका आना तय था।

कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या

आज जाने की जिद्द न करो
यूं ही पहलू में बैठे रहो

रातभर ही तुम याद आये। रात भर ही हम मरते रहें। रातभर ही लूटते रहे। रातभर बस बातें न हो सकीं। रातभर तुम्हें लिख न सका।

रातभर रहा खूब सारा वक्त। रातभर डरता रहा। एक घर था। हवेली जैसा। किराया काफी कम। हमने ले लिया। तुम डरते रहे। मैं हिम्मत करके जगा रहा।

हमदोनों बैठे रहे। मैंने तुम्हें रोके रखा। जान जाता रहा। तुम लौटे ही नहीं। बात इतनी सी है कि तुम...


Monday, February 19, 2018

सुख़न के साथी, संघर्षों में गुम गए

सब कुछ बड़ा हो गया था। वो ख़ुद भी। मौसम भी और जीवन भी । सुख हाँ सुख ही था दुनियादारी के सारे ही सुख।
सुख तो था लेकिन भरोसा न था। बिना भरोसा का सुख और साथ सब मिट्टी।

तुम थे तो संघर्ष था। ख़ूब सारे संघर्ष। दुःख और अभाव भी। लेकिन तुम बचे रहे दुःख की , उदासी की सारी नदी में, उम्मीद के सागर में।
तुम एक तिनका थे और तिनके पर ही था कितना सारा भरोसा।

अब के सुख में कई साथी दौड़े चले आते हैं लेकिन संघर्ष है नहीं , तो भरोसा भी नहीं।
तो सबकुछ अधूरा पड़ा है।

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...