Tuesday, October 2, 2018

people come and go...dont worry about them

लोग आयेंगे-जायेंगे...

उनके बारे में सोच-सोच कर
उनकी यादों में मर-मर कर क्या ही जीना ...

एक लंबी जिन्दगी में सात साल कितना कम है
उससे भी कम है चार साल
और उससे कहीं कम साल भर
और भी कम दो महीने
दो दिन
दो घंटे...


लेकिन इसी बीच लोग आते हैं
इतने दिनों के लिये भी
और लगता है जैसे पूरी जिन्दगी पर उनका हो  अधिकार

और फिर जब जाते हैं तो
अपने साथ ले जाते हैं
उतनेउतने समय भर का हिस्सा

मानो
जिन्दगी का हिस्सा न हो

हो शरीर के मांस का कोई लोथड़ा...


मुझे आश्चर्य होता है

कि ऐसे किसी का हिस्सा बनकर
कि ऐसे अपना हिस्सा खोकर

भी

लोग चुपचाप जिये चले जाते हैं...

सच में लोग आते हैं जाते हैं

उनकी चिंता करने का कोई मतलब नहीं

Sunday, September 23, 2018

भूखे की डायरी

- तुम्हारे जाने के बाद लग रहा है मैं एक ब्रेक पर हूँ।
- मुझे इस ब्रेक की जरूरत थी
- लगभग ज्यादा से ज्यादा अकेले रहने की कोशिश करता हूँ।
- अभी दो दिन पहले भूख से रोने लगा
- मैं समझ नहीं पाता भूख का ििइंतजाम मैं क्यों नहीं कर पाता
- अच्छा भी लग रहा है और एक खालीपन भी
- लेकिन ये खालीपन बेचैन नहीं कर रहा
- कभी कभी तो पूरा दिन बिस्किट खा कर रह जा रहा हूँ
- दफ्तर में क्यों रणनीतिक नहीं हो पाता
- प्रोफेशनल स्पेस में विद्रोह और भावुक होना आत्मघाती है
- फिर भी हो जा रहा हूँ
- बंगलोर जा रहा, शायद वहां थोड़ा और तसल्ली से रह पाऊँ
- मैं न एक्टिविज्म कर रहा और न जर्नलिज्म

  • - इस सच को दिल लेकिन मान नहीं पा रहा।

Wednesday, September 19, 2018

थर्ड क्लास लोग


इस मोहल्ले का सबसे थर्ड क्लास ढ़ाबा है। नाम है पंजाबी ढ़ाबा। लेकिन वहां काम करने वाले सब के सब बिहारी। वहां खाने वाला आदमी सब भी बिहारी। थर्ड क्लास लोग। जो सस्ता और वाहियात ही खाते रहते हैं। पानी भी ये लोग यही पीते हैं, सप्लाई वाला। इसी पानी का दाल है, उसी को रोटी में मिला-मिला खा रहे हैं। बिमार भी नहीं पड़ते। एकदम पत्थर के बने हैं।

बारह-बारह घंटे जी तोड़ कामचोरी करके आते हैं। थकते भी नहीं हैं। बैठकर जियो के थर्ड क्लास 15 सौ रुपये वाले फोन में विडियो देख रहे हैं। इतना छोटा डिस्पले में अपनी छोटी-छोटी आँखे गड़ाये ये लड़का 15 साल का भी है कि नहीं। देश में तो 18 साल पहले से सब पढ़े, सब बढ़े अभियान चला, लेकिन ये तो पक्का स्कूल नहीं गया लगता है। देखो तो कैसे मोबाईल में भोजपुरी गीत देख रहा है। सर में तेल चुपड़ कर बैठा है। देश में क्या हो रहा, कोई खबर ही नहीं। फ्रीडम ऑफ स्पीच, डिसेंट, यूनिवर्सिटी पर हमला, एक्विस्टो पर हमला, मंदिर, मस्जिद, गाय, गोबर किसी चीज की चिंता ही नहीं है इसे।

अपने गरीबी और गाँव से भागकर यहां चला आया है। शहर की छाती पर बैठकर अपना हिस्सा मांग रहा है। बेवकूफ कहीं का। शहर हिस्से में देता क्या है। वो आठ बाई दस का कमरा। जिसमें पांच लोग एक साथ सोते हैं। या शिफ्ट में सोने जाते हैं।
ये लोग धरती पर हैं क्यो। क्यों नहीं कहीं और चले जाते हैं। शहर की चकाचौंध। वातानुकूलित हवा। तेज रफ्तार। हंसी-ठहाके। कहीं तो फिट नहीं बैठते ये। इनको तो होना ही नहीं चाहिये।
और मैं यहां क्या कर रहा हूं। ये खाना बनाने वाली नौकरानी भी न। हर हफ्ते छूट्टी चाहती है। अरे, छूट्टी, वीकॉफ, वीकेंड हम पढे-लिखे, मीडिल क्लास वालों के लिये है या इनके लिये। हमने लड़ी है लड़ाई आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मन के काम का। इन नौकरों को, इन मजदूरों को। इनको तो चौबिस घंटे काम करना चाहिए। अच्छा कम से कम अठारह घंटे और सात दिन तो करना ही चाहिए। लेकिन नहीं, उसमें भी इन्हें बिमार पड़ जाना है। गाँव अपने परिवार के पास भाग जाना है।

ढ़ाबे में एक झूमता हुआ तीसरा थर्ड क्लास मजदूर आया है। दारु क्यों पीते हैं ये लोग। ड्रिंक करने का सलीका होता है। बड़ी-बड़ी पार्टियों में, बड़े-बड़े पब में बैठकर दारु पीना एक बात है, लेकिन ये लोग। ये डिजर्व नहीं करते दारु पीना। ना, ना। ये गरीब हैं क्योंकि ये दारु पीते हैं। अच्छा दारु बस उनको पीना चाहिए जो नाले के भीतर घुसकर सीवर की सफाई करते हैं। बदबूदार काम है। दारु पीये बिना होगा नहीं। गैस से मर भी जाते हैं तो पता नहीं चलता इन्हें। बस लाश बाहर आती है।
खैर, देश में क्लीन इंडिया कैंपेन चकाचक चल रहा है। 530 करोड़ तो सिर्फ एडवरटिजमेंट में खर्च हुए सरकार के। बहुत खर्च हो रहा है क्लीन इंडिया पर। अब सीवर सफाई का काम तो मशीन से नहीं करवा सकते न। बहुत खर्च आयेगा उसमें।

मन भन्ना गया। गरीबों को देखकर। गरीबी पाप है। पिछले जन्म में जो पाप करता है इस जन्म का गरीब है।
अच्छा हम चलते हैं। किसी कैफे से चाय का फोटो इंस्टाग्राम पर पोस्ट करेंगे। मन भन्ना गया।

Monday, September 17, 2018

तुमने खोया है कभी ?

एकबार

तुर्की के प्रेम कवि जमाल सुरैया ने अपनी कविता में पूछा,
"तुमने अपने पिता को खोया कभी?
मैंने खोया है एक दफा और मैं अंधा हो गया"

मैंने भी खोया है
अपने पिता को
अपने दोस्त को
अपने प्रेम को
अपनी यादों को

लेकिन मैं तय नहीं कर पाता कि किसे खोने का दुख जिन्दगी भर रहेगा
किसे खोने के बाद मैंने खुद को अँधा महसूस किया,

मैंने अपने पितो को खोया
लेकिन
मैं भूखा नहीं मरा,

मैंने अपने दोस्तों को खोया
लेकिन
मैं अकेला नहीं हुआ ।

मैंने अपने प्रेम को खोया
लेकिन
मेरा प्रेम नहीं मरा

मैंने बहुत सारी यादों को खोया
लेकिन
स्मृतिविहीन नहीं हुआ ।।

हां, थका जरुर।

हर खोने के बाद
थोड़ा सा ज्यादा ही
थका।
क्या तुम कभी किसी के खोने से थके कभी?

Monday, August 20, 2018

अचानक मन का उदास हो जाना

आज शाम अचानक लड़के का मन उदास हुआ। ऐसा कई शामों में होता है कि लड़के को उसकी याद आती है और वो उदास हो जाता है। लड़के के ख्याल में तो अक्सर वो रहती है, लेकिन मन का उदास होना थोड़ा कम सा गया है।
अब वो उदास होता भी है तो थोड़ा कहने से बचता है। बिल्कूल बचता है। उसने लड़की से कहा था कि वो सारे पुल खत्म कर देगा जो उसतक पहुंचती हो और कहना भी क्या। लड़का लगभग चुप ही रहता है। दुनिया के नक्शे में उसे कोई खड़ा नहीं मिलता जिससे वो मन का कह सके, दरअसल उसके मन में कुछ वैसा रुका भी नहीं है। कुछ भी नहीं।

वो खुद को हर रोज दिलासा देता है कि वो अब तस्सली में है। अब वो दिलासा ही उसका सच बन गया है।

ऐसा होता है अक्सर जब आप लंबे समय तक खुद को दिलासा में रखते हैं। तो फिर सब गढ़मढ़ हो जाता है। दिलासा, सच, झूठ, याद और आँख का भीगना।

सबकुछ कितना सामान्य है। लड़के के जीवन में। किसी का आना, किसी का जाना। किसी का न होना। सबकुछ एक जैसा ही लगने लगा है।

वो याद करता है वे दिन। बीते दिन। उसे याद नहीं आता ज्यादा कुछ। वे दिन याद करता हुआ लड़का छूटे हुए दिनों पर ही पहुंच जाता है। जूलाई से जून और फिर जून से अगस्त। इसबार तो उसे हद ही घटा। अगस्त को भूल बैठा।

मौसम की पहली बारिश।

लड़का जोर लगाकार बारिश में भीगने की कोशिश करता है। जोर लगाकर ही अब वो हर कुछ करने की कोशिश में रहता है। जोर लगाकर हँसता है, जोर लगाकर खुश होता है, जोर लगाकर खाता है, जोर लगाकर मिलता है, जोर लगाकर रौशनी की तरफ दौड़ता है। लेकिन कभी अगर जोर लगाकर चिल्लाता है तो चिल्ला नहीं पाता, एकबार उसने जोर लगाकर रोने की कोशिश की, और जोर-जोर से हँसने लगा।




Thursday, August 16, 2018

सांप्रदायिक राजनीति के सबसे छुपे और घातक चेहरे थे अटल बिहारी वाजपेयी, अलविदा।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मरने की खबर के बाद देशभर में उनके प्रशंसक शोक में डूबे हैं। वाजपेयी की एक खास बात थी कि उन्हें कट्टर हिन्दू राजनीति करने वाले तो पसंद करते ही थे, वे आजीवन कट्टर धार्मिक राजनीति को बढ़ावा देने वाली राजनीति के साथ ही खड़े रहे। लेकिन फिर भी देश के उदारवादी और सेक्यूलर तबके में भी उनकी लोकप्रियता बनी रही।

वाजपेयी को कई चीजों के लिये याद किया जायेगा। उनके मरने के पहले से ही सोशल मीडिया से लेकर बड़े-बड़े मीडिया हाउस तक हर कोई उन्हें महान नेता बनाने में तुले हुए हैं। ऐसे वक्त में इतिहास को पलटना जरुरी हो जाता है। उन अध्यायों को देखना जरुरी हो जाता है जिससे अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का संपूर्ण मूल्यांकन हो सके।

हालांकि हमारे देश में मरने के बाद बुरे आदमी के बारे में भी अच्छा-अच्छा ही बोलने का रिवाज है। लेकिन अगर बात किसी पूर्व प्रधानमंत्री की हो, देश के इतिहास में दर्ज एक महत्वपूर्ण नेता की हो तो मुझे लगता है कि अगर उसका पूरा मूल्यांकन किया जाना जरुरी है, नहीं तो न वो सिर्फ इतिहास के साथ बल्कि आने वाले भविष्य के लिये नाइंसाफी ही होगी।

अमूमन देश का उदारवादी तबका अटल बिहारी वाजपेयी को सेक्यूलर और कट्टरपंथ से मुक्त नेता मानते हैं। मैं भी सालों तक वाजपेयी को महान नेता मानता रहा लेकिन इतिहास कुछ और ही बताता है। वो बताता है कि 14 मई 1970 को जनसंघ के सासंद के रूप में सदन में बोलते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मुस्लिम हर दंगे और सांप्रदायिक तनाव के जिम्मेदार हैं। वे कहते हैं कि ‘दंगा शुरू क्यों होता है? मैं सदन से मांग करता हूं कि वो इसपर विचार करे। मैं किसी परिणाम पर नहीं पहुंचा हूं। कुछ मुस्लिम दंगा शुरू करते हैं यह जानते हुए कि उनकी जिन्दगी और संपत्ति खतरे में है। ऐसा लगता है कि मुस्लिमों ने सोच लिया है कि भारत में उनके लिये जगह नहीं है, उनका कोई अभिभावक नहीं है, इसलिए जीने से अच्छा है कि मर जाया जाये। दूसरी वजह हो सकती है कि कुछ मुस्लिम पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं, तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण वजह जो दिखता है कि मुस्लिम नेता मुस्लिमों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से नहीं जोड़ने देना चाहते।’

जाहिर है जो वाजपेयी संसद में बोल रहे थे ये विचारधारा और मत आजतक उनके संगठन आऱएसएस के लोग बोलते रहते हैं।

सन् 1983 में भी, अटल बिहारी वाजपेयी ने असम में चुनावी हिंसा और विदेशियों के बाहर करने के मुद्दे पर विवादास्पद बयान दिया था। याद रहे कि ये वही वक्त था जब असम में खासकर नेली में हजारों मुस्लिमों को मार दिया गया था। बाद में 28 मई 1996 को इन्द्रजीत गुप्ता ने संसद में उस विवादित भाषण के हिस्से को पढ़ा था जिसमें वाजपेयी कहते हैं- ‘ विदेशी यहां आये और सरकार ने कुछ नहीं किया। अगर वे असम के बदले पंजाब में आये होते तो लोग उन्हें काट कर वापिस फेंक देते’।

अपने कुप्रसिद्ध गोवा भाषण में अटल वाजपेयी कहते हैं, जहां जहां मुसलमान हैं, घुलमिलकर नहीं रहते हैं। इतना ही नहीं मुस्लिम विरोध में आगे कहते हैं, दूसरों से घुलना मिलना नहीं चाहते। शांतिपूर्ण तरीके से प्रचार करने के बजाय आतंकवाद से डरा-धमका कर अपने मत का प्रचार करना चाहते हैं।
वे धमकी भरे स्वर में कहते हैं हमने उन्हें (मुस्लिम और क्रिश्चन) को अपना धर्म फॉलो करने दिया है।
वाजपेयी यहीं नहीं रुकते और कहते हैं, हर जगह जहां मुस्लिम बहुत संख्या में रहते हैं, उनकी चिंता है कि कहीं इस्लाम उग्र रूप ना ले ले।
वो मुसलमामों पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते हुए कहते हैं, मुस्लिम लगातार सांप्रदायिक होते जा रहे हैं।

मई 1995 में पांचजन्य में लिखे आर्टिकल में वाजपेयी आरएसएस की तारीफ करते हुए कहते हैं कि ‘संघ को हिन्दुओं को इकट्ठा कर, मजबूत हिन्दू समाज बनाना चाहिए।’
वाजपेयी की 1998 में बनी सरकार के बाद लागातार देशभर में क्रिश्चन समुदाय पर जिस तरह हमले बढे थे उसे भी नहीं भूला जा सकता है।

हालांकि कुछ लिबरल लोग वाजपेयी को सांप्रदायिक नहीं मानते। उनका तर्क होता है कि उन्होंने गुजरात दंगों के वक्त तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से इस्तीफ़ा मांग लिया था। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत है कि उसी गुजरात दंगे में हजारों मुस्लिमों की हत्या कर दी गयी थी, महिलाओं के साथ बालात्कार हुए थे और राज्य सरकार कानून व्यवस्था को लागू करने में असफल रही थी। कई मंत्रियों और बीजेपी के नेताओं पर दंगा करवाने का आरोप लगा, चार्जशीट दाखिल हुए थी। इतना सब होने के बावजूद वाजपेयी ने नरेंद्र मोदी की सरकार को हटाने का साहस नहीं किया। वहां के स्थिति को सामान्य बनाने के लिये छह महीने के लिये भी राष्ट्रपति शासन नहीं लगा सके। उल्टे कुछ ही दिनों बाद गोवा में अपने भाषण में मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलते नजर आये।

ठीक ऐसा ही अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढ़हाने के समय भी वाजपेयी ने किया। उन्होंने मस्जिद गिराने से पहले ‘जमीन को समतल’ करने वाला विवादित भाषण दिया और फिर दिल्ली आकर अपने ही पार्टी के खिलाफ धरने पर बैठ गए। राजनीति को करीब से जानने वाले इसे वाजपेयी की नाटकियता मानते हैं। बीजेपी को सत्ता में आना था और वो जानती थी कि अपनी कट्टर छवि के साथ वो सत्ता में कभी नहीं आ पायेगी। इसलिए उसे वाजपेयी का उदारवादी चेहरा चाहिए था जो मध्यवर्ग के बड़े हिस्से में अपनी पैठ बना सके और ऐसा हुआ भी।

गैर-भाजपाई पृष्ठभूमि के लोगों ने भी वाजपेयी को खूब पसंद किया। उन्हें उदारवादी माना।

अटल बिहारी वाजपेयी को इसलिए भी याद रखा जायेगा क्योंकि उन्होंने धर्म की कट्टर राजनीति को पूंजीपतियों के साथ जोड़ा। उनके प्रधानमंत्री रहते ही देश में विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया, कई सारे सरकारी उपक्रम को बेचकर उसे निजी हाथों में दिया गया और चुनावी राजनीति में शाइनिंग इंडिया जैसा प्रोपगेंडा शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो आजकल हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी के रास्ते ही आगे बढ़ रहे हैं। हिन्दुत्व का एजेंडा छिपाकर दिखाने के लिये विकास की बात कर रहे हैं।

हालांकि अटल जी को भारत-पाकिस्तान के बीच दोस्ती के प्रयास के लिये भी याद किया जायेगा। भले वो प्रयास काफी असफल रहा।

फिलहाल इस लेख को अटल बिहार वाजपेयी की आत्मा को शांति मिलने की कामना के साथ खत्म करता हूं।

Monday, July 9, 2018

सबकुछ तसल्ली की राह पर है...

सारी कोशिशें तसल्ली की राह पर हैं..
कुछ यादें हैं, जिन्हें भूलने का चाह कर भी मन नहीं होता। वो फ्लैशबैक में जबरदस्ती भी जाती रहती हैं। जैसे एक याद पटना के गंगा किनारे का। दो लड़के बैठे हैं। दूर रोशनी में गांधी सेतू जगमगा रहा है। दोनों लड़के उस शाम में बस उस बड़े से पुल को देखने बैठे हैं। एक लड़का शहर छोड़ कर जाने वाला है। पुल पर चलने वाली गाड़ियों की रोशनी एकसाथ चलते हुए रौशनियों का नदी सा बनता दिखता है।

एक लड़का है जिसके लिये दूसरा पैसे बचाकर शहर के मंहगे रेस्तरां में जाता है। दोनों वहां बैठकर खाते हैं। अजीब सा सुख महसूस करते हैं। दुख है लड़का चला जायेगा शहर से हमेशा के लिये। दो साल बाद दूसरे लड़के को भी शहर छोड़ना ही था।

क्या पता था एक जगह वे फिर से मिलेंगे। वे मिले। वो लड़का था तो जिन्दगी में एक निश्चिंतता थी। सबकुछ उसके कंधे पर छोड़कर पड़े रहने का भरोसा था।

ताजुब्ब होता है एक वक्त में जिसके लिये जान देने सी हालत रहती है, उसे दुबारा लौटकर आवाज क्यों नहीं लगा पाते हैं हम।

आजकल कुछ लिखता नहीं, क्योंकि जब भी लिखने बैठो, पुरानी यादें ही बचती हैं। नयी यादों का तमाम कोशिशों के बावजूद न बन पाना....कितना जीवन को कठिन और कठोर बना देता है।

खैर,

कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...