Monday, February 19, 2018

सुख़न के साथी, संघर्षों में गुम गए

सब कुछ बड़ा हो गया था। वो ख़ुद भी। मौसम भी और जीवन भी । सुख हाँ सुख ही था दुनियादारी के सारे ही सुख।
सुख तो था लेकिन भरोसा न था। बिना भरोसा का सुख और साथ सब मिट्टी।

तुम थे तो संघर्ष था। ख़ूब सारे संघर्ष। दुःख और अभाव भी। लेकिन तुम बचे रहे दुःख की , उदासी की सारी नदी में, उम्मीद के सागर में।
तुम एक तिनका थे और तिनके पर ही था कितना सारा भरोसा।

अब के सुख में कई साथी दौड़े चले आते हैं लेकिन संघर्ष है नहीं , तो भरोसा भी नहीं।
तो सबकुछ अधूरा पड़ा है।

Thursday, February 15, 2018

प्रेम की तितलियां और सुअर सा चेहरा

पहले वो सामान्य था। सामान्य से थोड़ा बेहतर ही। बिल्कुल बिल्लियों को तरह। उसकी आँखे थी। और मूंछ भी बिल्लियों की तरह उगे थे। बिल्लियों की तरह ही चंचल था। बिल्लियों की तरह ही घर की रसोई से दुध चुरा लिया करता था। और भागता रहता था।

फिर एक जूलाई की बात है। करीब करीब दो साल पहले वाले जूलाई। उस साल शादियां खूब हुई थीं। शादियों में उसका आना जाना भी हुआ था। कुर्ते खरीदे गए थे। खुश खुश में खूब नाचा गया था।
फिर वो थककर सो गया। उसकी नींद खुली तो वो एक बड़े शहर में था। बीच सड़क पर लेटा हुआ था। उसने झटपट अपनी नींद को विदा किया और सामने लिखे सुलभ शौचालय की तरफ भागा।

वहां एक गंदा सा पुराना सा आईना रखा था। आईने में उसने खुद को देखा। वो देखता क्या है कि उसका चेहरा अपनी जगह से गायब है। वहां चेहरे की जगह सुअर सा कसैला मुंह लिये कोई खड़ा है। उसने अपने हाथ टटोले, पैर को आगे-पीछे किया। नहीं वही था। वही और उसी का चेहरा बिल्लियों सा नहीं रह गया था। सुअर हो चुका था। फिर उसने जैसे-तैसे एक गंदी-फटी-मटमैली जगह तलाशी। वहां बहुत सारी उल्टियां थी।

जब वो बिल्ली था तो एक चिड़िया उसकी दोस्त हुआ करती थी। सुअर वाला चेहरा लेकर उसने सोचा पहले चिड़िया के पास चला जाये। लेकिन फिर उसकी हिम्मत नहीं हुई। उसने सुअर वाले चेहरे को लटकाया। उसके दिमाग में भी सुअर की गंध भरने लगी थी। वो अब सुअर था।

उसने सुअरों जैसा करना शुरू कर दिया। उसने सुअर जैसा ही चुमा। सुअर जैसा ही भागदौड़ मचायी। लोग उसके सुअरपने को देखते हुए भागने लगे।

वो काफी अकेला पड़ गय़ा। लेकिन सुअरपने को नहीं छोड़ा।
अब क्या...

एकदिन एक तितली उस सुअर की पीठ पर आकर बैठ गयी। सुअर के पेट में भी तितलियां चलने लगीं।
सुअर को अपने चिड़ियां दोस्त की याद आयी।
तितली पीठ पर बैठी रही। तमाम डर, आशंकाओं और चिंताओं के बावजूद।

Tuesday, February 13, 2018

ज़िंदगी का नशे में डूब मरना

आसान रहा ज़िंदगी को नशे में डूबते देखना और वजह किसी और को बता देना।
आसान समझता रहा तुम्हारा रोना। कि किसी बटन का दबाने जितना ही। ज़िंदगी को जितना सोचो, बस बीते हुए कल की याद आना।
ये सोचना कि क्यूँ ! और उस बड़े से क्यूँ का यूँ ही डूब मरना।
ज़िंदगी सिल्वीअ और वर्जिन्या के बीच झूलता रहा। लोग अपने हमसफ़र तय कर आगे बढ़ते रहे।
सिल्वीअ तुम कहाँ रह गए। क्या सच में किसी रोज़ दवा खाकर मर गए। या मैंने मारा।
वर्जिन्या भी तो मर रही है हर रोज़ थोड़ा थोड़ा।
बस बचा रह गया मैं पूरा पूरा - हर रोज़ नशे में होश खोता।
चिट्ठियाँ भेजी जाती रहीं। कोई सिरा पकड़ में न आ सका। डाइअरी की एंटरियाँ ठीक शहर में सर्दी शुरू होने से पहले बंद कर दी गयीं।
सर्दियाँ अब जाने को है । प्यार का महीना बीत रहा। लेकिन क्या मज़ाल कि एक पन्ने पर भी कुछ लिखा जा सका हो।

और ये दोस्त ये बुलबुले। ये अर्नस्ट ये बूकाउस्की। ये थे भी कि ख़ाली था भ्रम पाश के होने का, जिसने कहा था ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना।
जबकि उसे कहना था सबसे ख़तरनाक होता है प्रेम का न रह पाना और उससे ज़्यादा उसका न हो पाना और उससे भी ज़्यादा उसे न कर पाना।

भाक साला ज़िंदगी!!

प्यार मुझसे जो किया तो कितना खोया तुमने.....

हवा कनकनी है। फरवरी है और पेड़ पत्तों के बावजूद उदास लटके हैं। ठंड न जाने का नाम ले रही है और न रहने का। याद का भी यही हाल है। जमा है। हर रोज बीच बीच में आता रहता है।
मौसम के मुताबिक उसे अब यहां नहीं होना चाहिए। दुनियादारी भी यही कहती है। मौसम बदलता रहता है। हर किसी को उसके आगे आगे तैयारी करनी पड़ती है।
लेकिन मन कहां मानता है। थोड़ा सा जलाता है. थोड़ा सा प्रतिशोघ की आग से क्षणिक सुख तलाश लेता है। लेकिन फिर लौट आता है वहीं।

कितना भी कर लो जतन आगे नहीं बढ़ पा रहे हम। ईशारों इशारों में बात करने की आदत।
प्यार जो तुमने मुझसे क्या किया पाया...
प्यार जो मुझसे किया तो क्या पाओगे के बीच हम कहीं अटके रह गए।
आँसू भी नहीं निकलते अब जोर जोर से। क्योंकि मौसम को तो बदलना है। हवा में कुछ कुछ बुदबुदाना है। जो दुश्मन समझे मुझे, उसे भी मेरे हिस्से का प्यार मिले..

आमीन आमीन आमीन

Friday, February 9, 2018

प्रेम न कर पाना ही प्रे और म है...

प्रेम को न भूल सकना ही प्रेम है। इतना ही नहीं प्रेम को न कर पाना भी तो प्रेम ही है। और हर रोज जो ख्याल में आये, उसके बारे में लिख न सकना भी प्रेम है।
और जिसे लिख न पाया जा सके और सिर्फ याद ही याद हो...वो भी प्रेम ही है।
और जब जिसे लिखना चाहो और न लिख सको, और जिसे कहना चाहो उसे कह न सको, या उसके बारे में न कह सको तो उस प्रेम में कुछ भी न लिख पाना भी प्रेम ही है।
न कह सको तो चुपचाप सहो...भी प्रेम ही है। याद आये भी और उसे भूलाने की कोशिश में जुटे रह जाना भी प्रेम ही है।
और कुछ न समझ आ सकना भी एक तरह का प्रेम है। शब्दों को भूलना, जीवन का एक ही मकसद न लिख पाने की स्थिति को पाना भी प्रेम ही है, या है प्रतिशोघ।
प्रेम तक जाने वाले सारे पुलों को तोड़ लेना भी प्रेम है। और जहां हो वहां न रह पाना और वापिस न लौट पाना दोनों प्रेम ही है।
जहां हो वहां रह सकना भी प्रेम हो सकता है, बस उसे स्वीकार करने की हिम्मत न भर पाना ही प्रेम है।

प्रेम के इस महीने में एक प्रेम को याद करते हुए, दूसरे प्रेम को जीते हुए...प्रेम न कर पाने का अफसोस लिये...प्रेम के जिन्दाबाद बने रहने का नारा लगाना ही प्रेम है।
आमीन

Friday, November 24, 2017

सोनम गुप्ता नहीं, जिन्दगी बेवफा है...

सुनो
आसान है, किसी सोनम गुप्ता को बेवफा बता देना और अपने रास्ते हो चलना। लेकिन नहीं, वक्त ज्यों ज्यों बीत रहा है समझ में आ रहा है कोई सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है, कोई लड़की प्रेम में सबकुछ हो सकती है लेकिन बेवफा नहीं होती..
वो तो ये स्साली जिन्दगी है जो बेवफाई पर उतर आती है। जिन्दगी ही धोखे देती है, जिन्दगी ही बनाकर निकल जाती है..
मैं तय नहीं कर पाता कई बार, क्या वो सचमुच जिन्दगी थी. या फिर सिर्फ एक लड़की।
लड़की जो प्रेम में डूबी रही...और प्रेम में ही डूब गयी...

कोई दरवाजा तो होगा न...
कोई कविता भी हो सकती है भला
या कोई कहानी
कि कहानी को एक वाक्य में यूं कह दूं...
कि अब तुम याद नहीं आती..

है तो सही झूठ ही
लेकिन झूठ जिन्दगी है और जिन्दगी बेवफा है...

हवा में तैरते हुए सबकुछ कितना सुन्दर है..कितना आसान

सुनो....सुनो...सुनो
कुछ नया शुरू किया है..नये से प्रेम है मुझे, जैसे तुम्हें था मुझसे प्रेम। था कि नहीं...
याद है कि नहीं...
अलविदा

Thursday, November 9, 2017

खुद में गुम होना, बुलंद होना है...

अक्सर मैं खुद को दोषी मानता रहा। हर रिश्ते में, हर दोस्ती में खुद को कम आंकता रहा। मन अजीब से अपराधबोध से ग्रस्त रहा..

धीरे-धीरे वो कमजोर भी पड़ने लगा..लेकिन अब दूसरों की गलतियों को, क्रूरताओं को देख समझ पा रहा हूं..
जाने-अनजाने मैंने खूब सारे लोगों को अपनी जिन्दगी में स्पेस दिया..वे आये, बड़े मजे से रहे और गये तो एक हिस्सा मेरे भीतर का भी लेते गए..

आज भी ऐसे लोग आते रहते हैं, लेकिन मन अब ऊबने लगा है..इन लोगों से और खुद से भी...
मन बहुत गुस्से में है..
गुस्सा है तो एक ताकत भी है...ताकत ये कि अब बस...
दुनिया को स्पेस देना बंद, कोई ईंट फेंके तो उसे जाकर पत्थर तो नहीं मारूंगा..लेकिन दूर से मिडल फिंगर जरुर दिखाउंगा..

और अपने रास्ते आगे बढ़ जाउंगा...


कुछ चीजों का लौटना नहीं होता....

 क्या ऐसे भी बुदबुदाया जा सकता है?  कुछ जो न कहा जा सके,  जो रहे हमेशा ही चलता भीतर  एक हाथ भर की दूरी पर रहने वाली बातें, उन बातों को याद क...